रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 10, मार्च, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

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 इस अंक में पढिए

।। कविताएँ ।।

 अशोक बाजपेयी प्रयाग शुक्ल

विमल कुमार प्रताव राव कदम

मंजु महिमा अशोक कुमार वशिष्ठ

डॉ. तारा सिंह डॉ. नथमल शर्मा

  सूर्योदय(नये कवि) -  संजय

प्रवासी कवि - इला प्रसाद(अमेरिका)

 

।। छंद ।।

गीतकार

डॉ. इसाक अश्क रामस्नेहीलाल शर्मा

वेदव्यास देवदत्त देव

सुधांशु उपाध्याय माधवी कपूर

माह के छंदकार - मनोज सोनकर

ग़ज़लकार

माणिक वर्मा मधर नज्मी ज़हीर कुरेशी

 

।। भाषांतर ।।

कन्नड की रचनाएं - स्वर्ण ज्योति

 

।। शेष- विशेष ।।

हस्ताक्षर...

 हिन्दी की सरस्वती - निशा सहगल

स्मरण...

विभु कुमार-परितोष चक्रवर्ती

एक शब्द...

भरना - डॉ.गंगाप्रसाद बरसैया 

लोक-आलोक...

निज भाषा छत्तीसगढ़ी - नंदकिशोर शुक्ल

मूल्यांकन...

दिनकर की कविता... - बनवारी लाल

कविताः तीन दशक- रामसेवक सोनी

मीडिया-विमर्श.....

बुश लादेन और गांधीगिरी - संजय द्विवेदी

व्यक्तित्व...

एक ज़िन्दा दिल मित्र - तेजेन्द्र शर्मा

बहुत  कठिन है - प्रेम जनमेजय

विधा-विशेष...

हिन्दी गीतकारों का योगदान - गोविंद पाल

इन दिनों...

नैतिकता नहीं अवसरवादिता के उदाहरण - विश्वनाथ सचदेव

 

लित निबंधों में इस बारः

वसन्त के बिना-धर्मवीर भारती

सन्त आते ही मन कुछ-कुछ बदलने-सा लगता था। धुला-धुला सा, तरोताज़ा, कुछ अनजान जंगली फूलों की महक के बसा हुआ। उन फूलों का कोई नाम होता था। उनकी पहचान भी भूल गयी है। पर बचपन में देखे और बटोरे हुए फूलों की महक कहीं मन में पुराने दर्द की तरह बसी हुई है, जो मौसम आते ही पिरा उठती है।


नहीं चाहिए ऐसा धर्म-अशोक कुमार वशिष्ठ

 

कहानी में इस बारः

दायित्व का एहसास - डॉ. सूरज मृदुल

कॉकटेल - संजय विद्रोही

बांग्ला कहानीःअचानक - विमल मित्र

 

संस्मरण मेः

प्रशासनिक संस्कृति(1)-महेश चंद्र द्विवेदी

 

कथोपकथन मेः

नाट्यलेखक विभु कुमार से

ठाकुर राम साहू की बातचीत

संस्कार मेः

संस्कृति, तकनीक और  कला...‍‍ - रति सक्सेना

 

कृति समीक्षा मेः

कभी यूँ तो भी हो - से. रा. यात्री

अब तो ठंढी हो चली...-ओमप्रकाश विकल

 

।। संपादकीय ।।

दलित साहित्य के बहाने कुछ टीप


जयप्रकाश मानस

पल भर के लिए यह मान लेते हैं कि दलित साहित्य साहित्य की दुनिया में स्वयं को प्रतिष्ठित करने का कुछ लोगों का जरिया नहीं है । यह भी ठीक है कि दलित चेतना सवर्ण मानसिकता और दलित विरोधी गतिविधियों के प्रतिरोध का साहित्य है । और इन प्रतिरोधों से सरोकार का हक भी दलितों को बाकायदा है । और यह भी सच है कि हर दलित लेखक आक्रोश के लिए नहीं रच रहा है । मैं ओमप्रकाश वाल्मीकि के जूठन नामक आत्मकथात्मक उपन्यास का जिक्र करना चाहूँगा जिसे पढकर कोई भी सवर्ण रोये बिना नहीं बच सकता । जानते हैं मूलतः वह चमारों के प्रति करुणा से ओतप्रोत कर देने वाला हिंदी के श्रेष्ठतम उपन्यासों में से एक है । इस उपन्यास में लेखक कहीं भी सीधे सवर्णों को गाली गलौच करता हुआ खड़ा नहीं दिखाई देता परन्तु एक संवेदनशील सवर्ण पाठक भी उसे पढ़कर सवर्ण मानसिकता की कमजोरियों के प्रति आक्रोश से भर बिना नहीं रहता । उसमें दलितों के प्रति रागात्मक अनुराग उत्पन्न होने लगता है । उसे अपने पूर्वजों पर कदाचित् क्षोभ भी होता है । और यही साहित्य का उद्देश्य है । साहित्य कोई फतवा नहीं है कि फलाने को कूट दो । अमूक को समूल नष्ट कर दो.....

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  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, संजीव ठाकुर, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

 
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