रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 10, मार्च, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

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माह के छंदकार-मनोज सोनकर

 मनोज सोनकर के दोहे

-1-

ख़ुशी बड़ी रूठी चले, माने ना वह बात

छिटकी जाए हाथ आ, देती जाए मात ।

 

ख़ुशी नहीं है पालतू, द्वार बदलती जाय

ललचाती सबको फिरे, सुंदर नाज़ुक गात ।

 

खुशी समेटे जो हंसे, कुछ लमहे कुछ मास

आज फिरें रोते हुए, सहते उसके दांत ।

 

ख़ुशी जिन्हें ठुकरा चली, दूजों को ले साथ

लौट उन्हें दुलरा धरे, दे हाथों में हाथ ।

 

ख़ुशी बड़ी सनकी लगे, बिना बुलाए आय

तोड़े चले यक़ीन वह, करती जाए घात ।

 ◌◌◌

 

-2-

 डूब-डूब सूरज उगे, मन बस डूबा जाय

इधर-उधर भटका फिरे, चैन कहीं ना पाय ।

 

पांखी तो उड़ते चले, अपने-अपने गाँव

आँखें अब थकने लगी, लौट कोई न आय ।

 

गहरी नीली झील है, ठहरी भूरी शाम

घायल-सी लहरें पड़ी, हवा उन्हें सहलाय ।

 

हर मौसम गाता फिरा, जब तक थे वे साथ

हवा तो सांरगी हुई, अब कोई ना गाय ।

 

बेला है फूली बहुत, फूली बहुत धधाय

गंध नशीली ना लगे, उन बिन नहीं सुहाय ।

◌◌◌

 

-3-

तसवीरें उभरी खड़ीं, धरे हुए दीवार

कुछ तो चहकी लगे हैं, कुछ की आँखों धार ।

 

स़नकी कोई एक था, आज़ादी का भक्त

गोली खाकर मरा वह, भरा हुआ बाज़ार ।

 

गोरी छोरी एक थी, चूड़ी की शौकीन

गले में बांहें डालती, कभी न माने हार ।

 

विधवा कोई एक थी, रोटी को मोहताज़

किसी तरह सांसें चलीं, दामन में बस खार ।

 

कोई इक मगरूर था, शरबत जैसी आँख

ख़त मीठे लिखता चले, चूके ना इतवार ।

◌◌◌

oमनोज सोनकर

     599/3, शर्मा निवास

        जामेजमशेद रोड, मुंबई

   महाराष्ट्र - 400019

 

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जरूरी नहीं कि आज़ादी और बराबरी के लिए जान खतरे में डाली जाए - कमलेश्वर

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