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एकलव्य
हम
एकलव्य
हम
हमें
दान करने हैं
अपने
कटे अँगूठे
सिद्धहस्तता नहीं
जितानी है
कुलीनता
गुरुता के हाथों
में
यह परिचित मलीनता
गुरु-गरिमा से
छले जाएंगे
सूतपुत्र हो
या वनवासी
दीप्ति, दर्प
उल्लास
उन्हीं को
हमें सिर्फ
आश्वासन झूठे
द्यूत दांव पर
यही धरेंगे
रजस्वला कृष्णा
के तन को
और
धर्म की जड़ता के
हाथों बेचेंगे
अपने मन को
एक दिवस फिर
इनकी इच्छा पर
बलि होगीं
अक्षौहिणियाँ
तब गाड़ेंगे
इन्द्रप्रस्थ के
सिंहासन पर
अपने खूंटे
हर क्षण
वही महाभारत
लिप्सायें वे
गर्हित घटनाएं
कर्ण, शकुनि,
दुर्योधन की
दूषित प्रज्ञाएं
धर्म-मूढ़ कुछ
धर्म भीरू
कुछ धर्म विरोधी
हमी दर्द के जाये
भाग्य हमारे फूटे
oरामस्नेहीलाल
शर्मा
86,
तिलक नगर, बाईपास रोड
फ़ीरोज़ाबाद - 283203
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मंत्र
आँसू के
जब भी कोई स्वप्न सजाता
यह जग तब तूफान उठाता
जब-जब लिखे मंत्र आँसू ने
मुस्कानों ने रात जगाई
दर्दों की काली स्याही ने
दिखलाई अपनी चतुराई
जब-जब पत्र भेजता मौसम
सावन तब-तब पता मिटाता
मैंने तो संबंध रचाए
सारे रिश्ते लगे लगाए
कोई भी तो काम न आया
व्यर्थ हुए अपनों के साये
संवेदन कुछ और निखरता
जब भी मैं व्यवधान हटाता
उर में नेह तुम्हारा बाँधे
सपनों के रागों को साधे
उजियारे की लिए कामना
कितने पीड़ा पर्वत लांघे
जितना भी विश्वास बिखरता
उतना ही साहस बढ़ जाता
oदेवदत्त
देव
मातादीन यादव कंपाउंड नं.5
रूम न.3, कुरार विलेज
तानाजी नगर,मालाड,
पूर्व
मुंबई
-94
◌◌◌
आँख
डबडबाई है
फिर से गहराये सुरमई बादल
फिर हवाओं में नमी आयी है
क्या कोई आँख डबडबाई है
कौन गुज़रा करीब होके अभी
किसका साया सा झिलमिलाया है
किसकी आँखे ये शबनमी सी हुईं
किसने आवाज़ दे बुलाया है
जाने वाले ने यह नहीं सोचा
दिल कोई आइने सा टूटेगा
कैसे गुज़रेंगे पहाड़ो से दिन
कैसे दामन ग़मों से छूटेगा
जब कभी हरसिंगार झरते हैं
ऐसा लगता है कोई रोया है
जूही के फूल की भीनी ख़ुशबू
जैसे कोई फेर के मुँह सोया है
ऐ ग़मे ज़िंदगी दुआ है तेरी
कितने दुख सह के लोग जीते हैं
जाने कितने फ़रेब के प्याले
एक दूजे से लेके पीते हैं
नीली होने लगीं रगें अब तो
ये ज़हर कब तलक छिपाएंगे
चाक़ होता है गला अपनों से
कैसे ग़ैरों को यह बताएंगे ।
oमाधवी
कपूर
के-604, रेल विहार, सेक्टर - 4
खारघर, नवी मुंबई
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