रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 10, मार्च, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलविशेषांकसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

गीत

 

जेलों में बंद करो

कलियुग में सतयुग बनकर

जो डोल रहे हैं

ऐसों को पहले जेलों में बंद करो ।

 

पहनाओ हथकड़ियाँ

इनके हाथों में

कील ठोंक दो

पगथलियों में, माथों में

भव्य मंच से गलत-सलत

जो बोल रहे हैं

ऐसों को पहले जेलों में बंद करो ।

 

फिर दो इन्हें सजाएं

काले पानी की

इनकी इस हठधर्मी की

नादानी की

बंद मुट्ठियाँ औरों की

जो खोल रहे हैं

ऐसों को पहले जेलों में बंद करो ।

 

इन ने ही युग का

माहौल

बिगाड़ा है

सरेआम दीनों को खूब

लताड़ा है

सच्चाई का पीट यहाँ

जो ढोल रहे हैं

ऐसों को पहले जेलों में बंद करो ।

 

हवालात ही इनका

सही ठिकाना है

बस इनको इनकी

औक़ात बताना है

ज़हर देश की रग-रग में

जो घोल रहे हैं

ऐसों को पहले जेलों में बंद करो ।

oडॉ. इसाक अश्क

तराना, जिला- उज्जैन

मध्यप्रदेश

◌◌◌

 

बहुत दिनों के बाद

बहुत दिनों के बाद

पेड़ पर सावन आया है

सागर के मन में

लहरों ने जाल बिछाया है।

 

अंजाने में कविता ने

छंदों को पाया है

शब्दों के सन्नाटे में

फिर गीत जगाया है

दूर अकेले चलते-चलते

सब बिसराया है।

ऐसी हवा चली जंगल में

फूलों का साया है ।

 

इधर-उधर सब तरफ

उन्हीं को खोया पाया है

केसर की क्यारी में

सपना फिर मुस्काया है

उनके आँगन में फिर से

उल्लास समाया है ।

वीणा के तारों पर

कोमल राग बजाया है।

 

अभी-अभी तो हमने

सुर को ताल बनाया है

बहुत दिनों के बाद

पेड़ पर सावन आया है ।

oवेदव्यास

7/112, मालवीय नगर

जयपुर, 302017

◌◌◌

 

 

पक्की सड़क 

यह हमारे गाँव की पक्की सड़क

काटती है खेत को

तलवार सी!

 

ईँट के भट्ठे, बगीचे से गुजरती

और बूढ़े ताल से

कुछ गुफ़्तगू करती

चौधरी के द्वार पर

सोई पड़ी लाचार-सी!

 

कसमसाते हैं यहाँ पर आम के बूढे बगीचे

ताल के हैं पास सोये

धान के गीले गलीचे

झूलती सांसें हवा में

हैं लटकती तार-सी!

 

कुएं में ऊँघती रस्सी कुएं को रोज पीती हैं

बहुत गहरे उतर कर वह

फटे पानी को सीती है

हँसी आती तो है, मगर दिखती

बहुत बीमार-सी!

 

जहाँ ये खत्म होती है वहींसे दिन शुरू होते

बहुत देखें हैं इसने रात में

इस गाँव को रोते

टूटकर होती गयी कम रोज यह

आपसी व्यवहार-सी!

oसुधांशु उपाध्याय

देवगंगोत्री, ए-1

पत्रकार कॉलोनी, इलाहाबाद

◌◌◌

 

एकलव्य हम

एकलव्य हम

हमें दान करने हैं

अपने कटे अँगूठे

 

सिद्धहस्तता नहीं

जितानी है कुलीनता

गुरुता के हाथों में

यह परिचित मलीनता

गुरु-गरिमा से

छले जाएंगे

सूतपुत्र हो

या वनवासी

दीप्ति, दर्प उल्लास

उन्हीं को

हमें सिर्फ आश्वासन झूठे

 

द्यूत दांव पर

यही धरेंगे

रजस्वला कृष्णा के तन को

और

धर्म की जड़ता के

हाथों बेचेंगे

अपने मन को

एक दिवस फिर

इनकी इच्छा पर

बलि होगीं अक्षौहिणियाँ

तब गाड़ेंगे

इन्द्रप्रस्थ के सिंहासन पर

अपने खूंटे

 

हर क्षण

वही महाभारत

लिप्सायें वे गर्हित घटनाएं

कर्ण, शकुनि, दुर्योधन की

दूषित प्रज्ञाएं

धर्म-मूढ़ कुछ धर्म भीरू

कुछ धर्म विरोधी

हमी दर्द के जाये

भाग्य हमारे फूटे

oरामस्नेहीलाल शर्मा

86, तिलक नगर, बाईपास रोड

फ़ीरोज़ाबाद - 283203

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मंत्र आँसू के

जब भी कोई स्वप्न सजाता

यह जग तब तूफान उठाता

 

जब-जब लिखे मंत्र आँसू ने

मुस्कानों ने रात जगाई

दर्दों की काली स्याही ने

दिखलाई अपनी चतुराई

जब-जब पत्र भेजता मौसम

सावन तब-तब पता मिटाता

 

मैंने तो संबंध रचाए

सारे रिश्ते लगे लगाए

कोई भी तो काम न आया

व्यर्थ हुए अपनों के साये

संवेदन कुछ और निखरता

जब भी मैं व्यवधान हटाता

 

उर में नेह तुम्हारा बाँधे

सपनों के रागों को साधे

उजियारे की लिए कामना

कितने पीड़ा पर्वत लांघे

जितना भी विश्वास बिखरता

उतना ही साहस बढ़ जाता

oदेवदत्त देव

मातादीन यादव कंपाउंड नं.5

रूम न.3, कुरार विलेज

तानाजी नगर,मालाड, पूर्व

 मुंबई -94

◌◌◌

 

आँख डबडबाई है

फिर से गहराये सुरमई बादल

फिर हवाओं में नमी आयी है

क्या कोई आँख डबडबाई है

 

कौन गुज़रा करीब होके अभी

किसका साया सा झिलमिलाया है

किसकी आँखे ये शबनमी सी हुईं

किसने आवाज़ दे बुलाया है

 

जाने वाले ने यह नहीं सोचा

दिल कोई आइने सा टूटेगा

कैसे गुज़रेंगे पहाड़ो से दिन

कैसे दामन ग़मों से छूटेगा

 

जब कभी हरसिंगार झरते हैं

ऐसा लगता है कोई रोया है

जूही के फूल की भीनी ख़ुशबू

जैसे कोई फेर के मुँह सोया है

 

ऐ ग़मे ज़िंदगी दुआ है तेरी

कितने दुख सह के लोग जीते हैं

जाने कितने फ़रेब के प्याले

एक दूजे से लेके पीते हैं

 

नीली होने लगीं रगें अब तो

ये ज़हर कब तलक छिपाएंगे

चाक़ होता है गला अपनों से

कैसे ग़ैरों को यह बताएंगे ।

oमाधवी कपूर

के-604, रेल विहार, सेक्टर - 4

खारघर, नवी मुंबई

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आपकी प्रतिक्रिया

कुछ कमी तो ईश्वर की व्यवस्था में भी है - कमलेश्वर

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  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, संजीव ठाकुर, कामिनी, प्रगति

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