रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 10, मार्च, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

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ग़ज़ल

 

पंछियों की जुबान में बोले

हम हमेशा उडान में बोले ।

 

जो तराशे गए वो बतियाए

कितने हीरे खदान में बोले ।

 

भूल कर नदियों की क़ुर्बानी

लोग सागर की शान में बोले ।

 

दंभ दौलत का छिप नहीं पाता
जब वो मंदिर के दान में बोले ।

 

बात सुन ले न दूसरा कोई

इसलिए लोग कान में बोले ।

 

भूल कर भूतकाल के किस्से

हम सदा वर्तमान में बोले ।

 

लोग दंगों के दौर की पीड़ा

खुल के अम्नो-अमान में बोले ।

oज़हीर कुरेशी

समीर कॉटेज, बी-21, सूर्य नगर

शब्द प्रताप आश्रम के पास

ग्वालियर, मध्यप्रदेश - 474012

 

धो के हाथों की हिना पानी में

इक नशा घोल दिया पानी में ।

 

दुश्मने-जां हैं ये तीनों लेकिन

फ़र्क़ है, आग, हवा, पानी में ।

 

हो गयी ज़ीस्त की क़ीमत ज़ाहिर

बुलबुला जब भी उठा पानी में ।

 

तेरी रहमत का हो साया जिस पर

डूब सकता है भला पानी में ।

 

किसी गौहर की हो जो तुमको तलाश

झांक कर देखो ज़रा पानी में ।

 

एक बादल का सहारा लेकर

बरसी घनघोर घटा पानी में ।

 

उनके चेहरे का आईना झल के

ऐसा महसूस हुआ पानी में ।

 

लाख हिकमत से जलाया जाये

बुझ ही जाता है दिया पानी में ।

 

मेरे पीछे ही कोई कूदा है

ऐसा महसूस हुआ पानी में ।

oमधुर नज्मी

काव्यमुखी साहित्य अकादमी,

गोहना, मुहम्मदाबाद, जिला मउ, उ.प्र.

 

मुहब्बत की नज़र पहचानने को

बूतों को पूजता है हमनफ़स क्या

ये पत्थर तुझपे खावेंगे तरस क्या ।

 

मुहब्बत की नज़र पहचानने को

है सारी उम्र कम, इक दो बरस क्या ।

 

पहुँचने को तो पहुँचे आस्मा तक

दिलों तक भी हुई है दस्तरस क्या ।

 

धुआं उठने लगा है तीलियों से

चमन के साथ जलता है कफ़स क्या ।

 

भटक कर रह गए जो कारवां से

ये उनसे पूछ है बांगे-जरस क्या ।

 

है कोई मसलहत दरवेश वरना

तिरी ज़जीरे क्या, तेरा कफ़स

oमाणिक वर्मा

माणिक भवन, पावर हाउस के पीछे

हरदा, मध्यप्रदेश

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रहस्य ही रहस्य को जन्म देता है - कमलेश्वर

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