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मुहब्बत की नज़र पहचानने को
बूतों को पूजता है हमनफ़स क्या
ये पत्थर तुझपे खावेंगे तरस क्या ।
मुहब्बत की नज़र पहचानने को
है सारी उम्र कम, इक दो बरस क्या ।
पहुँचने को तो पहुँचे आस्मा तक
दिलों तक भी हुई है दस्तरस क्या ।
धुआं उठने लगा है तीलियों से
चमन के साथ जलता है कफ़स क्या ।
भटक कर रह गए जो कारवां से
ये उनसे पूछ है बांगे-जरस क्या ।
है कोई मसलहत दरवेश वरना
तिरी ज़जीरे क्या, तेरा कफ़स
oमाणिक
वर्मा
माणिक भवन, पावर हाउस के पीछे
हरदा, मध्यप्रदेश
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