रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 10, मार्च, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

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भाषान्तर

 

मूल शीर्षक - भाषे यावुदु निम्मदु , भाषा -कन्नड , कवियत्री श्रीमती सीता छप्पर, धारवाड

कौन सी भाषा

पंख पसार कर उडने वाले खग
बोलने वाला तोता, कोयल,
औ चिडियाँ छोटी-छोटी
मै न समझूँ
भाषा तुम्हारी

कूहू- कूहु, चिम-चिम
ट्यूवी-ट्यूवी कहते हो
कहीं से भी पूछे प्रश्न
उत्तर पा ही जाते हो

बिना लिपि की भाषा में
हर सू तुम्हारी है ध्वनि
गूँज सुनाई है देती
सुनकर सबा भी है झूमती

संतृप्ति का संगीत
त्म्हारी आवाज़ में
संतोष का सुख
तुम्हारी बातों में

बिना अक्शर के
तुम्हारी भाषा का
अर्थ समझाओगे क्या...?
अपने साथ संवाद हेतु
मुझे बुलाओगे क्या ...?
◌◌◌

मूल शीर्षक -आ मने यल्ली मौनविदे - द्वारा सीता छप्पर

खामोशी की कहानी
उस घर में
खामोशी है छाई
पर क्यों.....?
क्या यूँही....
नहीं .....
खामोशी के नेपथ्य में
है एक कहानी

पालने के पास हैं बिखरे
गीता के फटे पन्ने
चूल्हे के चारों ओर
चिंदी-चिंदी बन
फैला मासूम आँचल

पिछवाडे आँगन
पुरानी चटाई पर
दो पीढी के बीच की
अपूर्ण कहानी है पडी

अगले आँगन
खिलखिलाती हँसी
जिंदा लाश है बनी

घडे के बदले
कुयें की गडारी न खींचों
सोलह साल की तरूणी पर
अनगिनत नाखूनों के
निशान देखो

खामोशी की यही
है कहानी
◌◌◌


मूल शीर्षक -- मण्णु, मर मत्तु बळ्ळी   सीता छप्पर

माटी, तरू और बेल
बलखाती हुई बेल
माटी से बोली
 
रख लो जडों को
मैं तो ऊपर चली
छोड दो मुझको
मुझे आज़ादी लगती भली

तरू से वह बोली
मैं नन्ही बेल
चाहूँ समान अधिकार
माँगू तुमसे सहकार

फल-फूलों से भरित
वॄक्श की ऊँचाई तक,
 
शोभायमान
आकाश राज ने पूछा
 
प्रश्न
कहो नन्हीं बेल
समानता की चाह
कैसे हुई तुमको प्राप्त

बेल मुस्कुरा कर बोली
माटी ने दी आज़ादी  और
तरू बना मेरा सहकारी
◌◌◌


मूल शीर्षक --सप्तपदि तुलिद मेले,   द्वारा--- सीता छप्पर

सप्तपदी के बाद
उठे मेरे कदन धीरे-धीरे
सप्तपदी के बाद
शायद बिछिया की
चुभन है साथ

बाँहे मेरी झूले नहीं
कल की भाँति आज़ाद
कि चूडियों से भरे हैं हाथ

सिर मेरा गर्व से
तने नहीं आज
शायद, मंगल सूत्र का भार
बना है इसका राज

आँचल कहे, मैं तुम्हारा
दुपट्टा नहीं
जो उड-ऊड जाए
लगा है एक पिन
बगल में मेरे

ताळी* कहे हँसकर
यूँन डोलो
मैं तुम्हारा नकली
पदक नहीं जो
जहाँ-तहाँ पडा रहूँ
सोना हूँ, भारी हूँ
जरा संभलो

इतने में आवाज़ दे
हल्दी और कुंकुंम
तुम्हारी बिंदी नहीं हूँ मैं
जो एक दिन में
झड जाऊँ
पोंछो भी,धोओ भी
तो भी दाग छोड जाऊँ

ताळी* (दक्षिण में मंगल सूत्र के साथ एक तावीज सा लगा होता है जिसे ही विवाह में पहनाया जाता है और महत्वपूर्ण होता है )
◌◌◌


मूल शीर्षक --दीपावळी --द्वारा-- श्री दत्तात्रेय रा.हानगल्ल पाँडीचेरी

दीपावली
प्रत्येक हृदय, एक-एक प्रणती
रोशन है सभी में एकात्म ज्योति
सभी चेहरे हैं मुसकाते, सभी से है प्रीत
समरस का है संगीत अनुभाव और गीत

दीपावली में उपहार,आभूषण, वस्त्रादि
नव चेतनोत्साह और मिष्टानादि
उर उत्साहित ,आज पराया कोई नहीं
आत्मीयता का है संबंध अपने हैं सभी

जीवन मंदिर में देव-देव के लिए
कार्तिक मास में जले जीव ज्योति
प्रकाशित है चहुँ ओर, दूर हुआ मन का तमस
सजी है नभ सी आज यह धरती
◌◌◌


मूल शीर्षक-- कवन ---द्वारा ---दत्तात्रेय रा. हानगल

कविता
पुष्प, वृक्ष औ लता के सपन
खिले जब ऊषा करे आलिंगन
कविता, कवि के नन्हें-नन्हें शिशु
अनुकम्पा के छींटों से खोले नयन

हृदय अंतराल में प्रेम, तोतली शब्दों का शोर
अक्षरो से अपरिचित, शिशु का यत्न
अव्यक्त की अभिव्यक्ति नव जीवन की शक्ति
बन जाए कविता जैसे हो दिव्य रत्न

बना कर हॄदय बुध्दि को ही पालनहार
जैसे लीला में मगन श्री कृष्ण
जब एक सत्य की किरण, जीवन करे रोशन
बन जाए कविता, सॄष्टि का कण-कण

कवि के मन के ,सुन्दर सपनों के
रस सॄष्टि, ही हैं गीत
नृत्य का ,संगीत का
समरसता का है नीड
◌◌◌

मूल शीर्षक--- कवियनिन उयिल --द्वारा--- अमृत गणेशन पाँडीचेरी

कवि की वसीयत
एक दिन
सबके समान
मेरा भी दिन आएगा
चीख चिल्ला कर बिलख कर
आँसू बहाएगा

नींद आती है
सो ले
सपने भी सजा ले
पर
आँसू न छलका
तुम्हारे मन में
मेरा मन है बसा
अर्थी तू चाहे सजा
वसीयत बना
फूल बरसा
दुःख में दिन काट
पर
दुःख का नकली मुखौटा
चेहरे पर न चढा
कुछ भी
 
मैंने तुम्हारे लिए
नहीं है बनाया
एक घर या कभी भ्रमण
एक पेटी गहने
एक खोखा पैसे
कुछ भी नहीं
फिर भी
तुम्हारी जिन्दगी के
दुःखो से भरी
चादर को
प्यार के पैबंद लगाकर
मैंने है सिया
याद रखना
तुम्हारी याद को
सपनों  में हक़ीकत में
सहेज कर
है सींचा
कभी सूख न पाएगा
मेरी जिन्दगी तुम्हीं से
सार्थक है हुई
और मेरी मौत भी
तुम्हीं से
अर्थ्गर्भित है बनी
◌◌◌


मूल शीर्षक ---वेंडूं--- अमृत गणेशन

मांग
तुमने मुझे देखा नहीं
कोई बात नहीं
कोई बोल-चाल नहीं
कोई बात नहीं
एक स्पर्श भी नहीं
खैर जाने दो
पत्रों का सिलसिला भी नहीं
ऐसा ही सही

फिर भी मुझे तैश नहीं
बस चिंता है थोडी सी
कि मुझमें तुम हो
तुझमें मैं हूँ
इसीलिए थोडे से
 
आँसू मुझे देदो
कि मैं भी अब
आँसू बहाना चाहता हूँ
बस थोडा रोना चाहता हूँ
◌◌◌


मूल शीर्षक--- तेरु----अमृत गणेशन

एक राह
एक राह
सुबह सहस्र शीर्षों तैरता
समंदर
अंधेरी रात में
परछाईयों में गुम होता
नीरूप अरूप

एक राह
दिनभर बारिश में डूब
भीगे बदन को
तमस की मौन में
सुखाते हुए

एक राह
गुरखा की दरबारे आम
रोजाना जमती
निशा नीरवता
लम्बी यात्रा पर चलती

एक राह
धरा का श्रींगार
जैसे लहँगे पर
गोटे जरी का तार
◌◌◌


मूल शीर्षक--- वयसाली --- द्वारा ---अमृत गणेशन

वयोवॄध्
घर में
वयोवृध्द की
छत्र छाया
हमेशा है सुहाती

पापा की शर्ट
सेंट की खूशबू
से महकती
पर अम्मा के
चेहरे पर
सरसों है फूटती
भैया के पीठ पर
फुलझडियाँ है चलती
ऐसे में
दद्दू की बातें ही
मलहम सी है लगती

बचपन की दहलीज़ लाँघ
दीदी का यौवन है कसमसाता
भीगी-भीगी नसों वाला
पडोसी लडका है मचलता
प्रेमपत्रों का सिलसिला है चलता
पापा की आँखें है गरजती
दीदी की आँखें हैं बरसती
ऐसे में दादी ही
मीठे बोलो से समझाती

पहली तारीख को
धोती सा लंबा
बज़ट है होता
बीस के आते-आते
लंगोट सा रह जाता
तब शैक्षणिक भ्रमण के लिए
दादा-दादी के अंटी से ही
 
पैसा है निकलता