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प्रवेशांक, जून, 2006
सृजनगाथा
रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन
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संस्कार
समय, समाज और त्वरित लेखन- प्रमोद वर्मा
बिलासपुर-रायपुर सड़क मार्ग पर बिलासपुर से कोई पच्ची किलोमीटर दूर सरल रेखा सी बहती मनियारी नदी के तट पर एक छोटी सी बस्ती है-तालागाँव । खेत-खलिहानों और आसपास बसे झोपड़ों को पार करते आप अचानक ठिठक जाते हैं । आँख मलने लगते हैं । कहीं स्वप्न तो नहीं देख रहे । सामने आप के सचमुच एक स्वप्न-लोक है । सपनों की ही तरह भग्न और बेतरतीब । सच क्या है इन में से – वह जो था या यह जो है ?
सच दोनों हैं – वर्तमान से रंच मात्र भी कम अतीत नहीं । फिलहाल का भला कौन नहीं होता ?
लेकिन प्राणियों में केवल मनुष्य ही तो उसे फलांगने की इच्छा सहित फिलहाल में होता है । इसलिए खास देश-काल का हो कर भी वह दिक्काल का होता है । इतिहास घटनाओं का नहीं वरन् उन घटनाओं को संभव करते मनुष्य –समूह का नाम है । उससे गुज़रते हुए हम अपने संघर्षरत पुरखों का, एक तरह से अन्य देश-काल में अपना ही, साक्षात् कर रहे होते हैं । बावड़ी के भीतर की सीढ़ियाँ आकाश की ओर ही तो खुलती हैं । भीतर से बाहर और बाहर से भीतर कोई और नहीं हमीं हुआ करते हैं । मनुष्य । बेपर को होकर भी जो उड़ सकता है, तब के बंधन में होकर भी जो मनसे उन्मुक्त रहा चला जाता है, जिसकी कल्पना कल्पना की दूरबीन आगे भी देख सकती है और पीछे भी, जो अनुभव-समृद्ध है इसलिए कृतसंकल्प भी । शायद पूर्वापर सम्बन्ध जोड़ पाने की अनपी क्षमता के ही बल पर सृष्टि में कबी असहाय सा विचरता द्विपद अजेय बनता गया ।
खंडहरों में प्रवेश कर हम जैसे स्वयं को ही अपने अतीत में हासिल कसिल करते हैं । ताला के भग्न मंदिर का प्रवेश-द्वार वानस्पतिक उपकरणों से सज्जित है । खगोल-भूगोल में विचरते मानवेत्तर प्रवेश प्राणी रूद्रशिव के अंग-प्रतयंग है । देवता के एक ही विग्रह में पेड़-पौधों पंशु –पक्षियों यहां तक कि कीट-पतंगों को भी समाविष्ट करने वाली कला-चेतना हमारी संशिलष्ट संस्कृति के चरित्र के अनुरूप वैश्विक और समावेशी है । मनुष्य समय की पीठ पर सवार है और मूल्य संस्कृति की पीठ पर ।
समुदाय का अंग बनकर द्विपद मनुष्य हुआ । समुदाय ने अपनी ऐतिहासिक ने अपनी ऐतिहासिक सत्ता साहूहिक सहयोग और परिश्रम से उत्पादित करते हुए हासिल की । उत्पादन बटा तो लोभ पैदा हुआ । सामूहिक श्रम से उपार्जित धन का नियंत्रण अपने हाथ में लेने की इच्छा रखने वाली ताकतें भी समाज से ही पैदा होती हैं । अलग-अलग समुदायों को ऐसी ताक़तें आपस में लड़ाती है । भारी पड़ने वाली ताक़त अपने प्रतिद्वंद्वी को गुलाम बना लेती है ।
भौतिक संपदा के अलावा हर समाज की आध्यात्मिक संपदा भी होती है । इस संस्कृति कहते हैं । इसका भी उत्पादन सदियों के सामूहिक सहयोग और परिश्रम से होता है । संस्कृति जातीय अनुभवों और जीवन-मूल्यों का स्मृति-कोश हैं । ये मूल्य ही किसी समाज की वास्तविक पहचान होते हैं । उपनिवेशवाद की विजय-यात्रा विजित राष्ट्र पर सांस्कतिक प्रभूता के साथ समाप्त होती है ।
उत्तर मध्य- काल भारतीय इतिहास के चरम अधःपतन का समय है । ऐसे समय में यहां आयी विदेशी सत्ता को पैर जमाने में खास दिक्कत नहीं हुई । लेकिन जैसे ही उसने भारत के मन के भी उपनिवेशन की प्रक्रिया शुरू की, बूढ़े भारत का सोया तेज जाग उठा । अपने डेढ़ सौ बरस के राज में हर चंद कोशिशों के बावजूद अंग्रेज इस देश की अस्मिता को न मेट सके न बदल ही सके । पराधीन रहकर भी जो मन से ऐसा अनुभव न करे उसे भला कौन बाँध रख सकता है । भारत छोड़ो आंदोलन शुरू होने के पांच ही साल बाद अंग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ा ।
और तब आता है विडंबना का ऐसा दौर जिसकी मिसाल शायद ही कहीं मिले । आज़ाद होत ही हमने उन शस्त्रों को हिंद महासागर में फेंक दिया जिनसे हमने आज़ादी की लड़ाई लड़ी थी । गांधी की हत्या वस्तुतः उन मूलियों की हत्या थी जिनके वे प्रतीक थे । स्वाधीनता-पूर्व और स्वाधीन बारत की राजनीति का चारित्रिक अंतर ध्यान देने थे । स्वाधीनता –पूर्व और स्वादीन भारत की राजनीित का चारित्रिक अंतर ध्यान देने योग्य है । स्वाधीनता की लड़ाई के दौरान जोर संस्कृति-निःसृत मूल्यों पर था जबकि स्वधीन भारत में उसके पर्याय कीमत पर जिसे बाज़ार तय करता है । बड़े बाज़ार से जुड़ना उसके अधीन होना है । उपनिवेश बन कर भी जो भारत मन से गुलाम नहीं हुआ था नव उपनिवेशनवाद के आरक्षित वन में बंधनरहित होकर भी वस्तुतः अपनी स्वतंत्रता सीमित कर चुका है ।
स्वाधीन होने के बाद हमने समता और न्याय पर आधारित समाज-रचना का संकल्प लिया था । तदनुसार विकास की योजनाएं बनाकर उन्हें अमल में लाने की आधी-अधूरी कोशिश भी हुई लेकिन इनका लाभ कमज़ोर वर्ग के बजाय उपरले वर्ग को अधिक मिला । औपनिवेशिक प्रशासिनक तंत्र के माध्यम से जनकल्याणकारी योजनाओं पर अमल करने का नतीजा इसके सिवा और हो भी क्या सकता है । सदियों से चली आ रही अन्यायी रूढ़िवादी व्यवस्था और उसे मज़बूत करने वाली सामाजिक संस्थाओं की जकड़बंदी आज़ादी हासिल करने के लगभग पाँच दशक बाद भी यथावत् है । वोट बैंक के बने रहने के चक्कर में धर्म के मानले में हज़ारों साल की सहिष्णुता और मेलजोल की विरासत नष्ट होती जा रही है । पढ़े-लिखे वर्ग के लोगों को भी पिछले दिनों दूसरे सम्प्रदाय के उपासना –गृह के नष्ट किये जाने पर खुश होते और एक दूसरे को बधाई देते देखा-सुना गया है । समाज-विरोधी ताकतों के हौसले तो अब इतनी बुलंदी पर हैं कि शक होने लगता है कि वही शान चला रहे हैं । प्रतिगामी जनविरोधी ताकतों पर अंकुश लगाने की न तो शासन में क्षमता दिखाई देती न पर्याप्त इच्छा–शक्ति । राजनीति का अपराधीकरण हो गया है । वर्तामान सरकार द्वारा खुले तौर से विकास की पश्चिमी धारणा को स्वीकार कर लेने के बाद तो देश में उपभोक्ता समाज ही बन सका है । समतामूलक समाज नहीं । सामाजिक न्याय की तोतारटंत भी इसीलिए आजकल कम सुनाई देती है । संसार के सारे विकसित देश विकासशील देशों की कीमत पर ही समृद्ध हुए हैं । विकासशील देशों द्वारा भी वही रास्ता अपनाने की कीमत ज़ाहिर है उन्हीं देशों के इत्यादि जन ही चुकायेंगें ।....
