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प्रवेशांक, जून, 2006
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गांधी जी से हताश हुआ.... – बालाशौरि रेड्डी
– बाल साहित्य की वर्तमान स्थिति क्या है ?
बाल साहित्य की वर्तमान स्थिति तो आप स्वयं जानती और अनुभव करती हैं ।
– स्तरीय बाल पत्रिकाओं की संख्या सीमित हैं, इसका क्या कारण है ?
स्तरीय बाल पत्रिकाओं की प्रसार संख्या घटने का कारण मुख्यतः प्रसार के माध्यम हैं । टीवी, रेडियो, सिनेमा, वीडियो इत्यादि वैज्ञानिक साधनों का प्रत्येक गृह में घुस जाना और बालक बालिकाओं को पाठ्यक्रम तथा गृहकार्य तथा अवांछित आयोजनों में फँसे रहना इनसे बढ़कर माता-पिता व अभिभावकों की व्यस्तता, अपेक्षा तथा कतिपय संदर्भ में उनकी मानसिकता में बदलाव का आना । टीवी पर हल्के-फुल्के मनोरंजक, उत्तेजक और दिल को उठालने वाले कार्यक्रमों का चौबीस घंटे हमला । हमारे देश के कर्णधार इन स्थितियों से भली भाँति वाकिफ हैं । वे अपने बच्चे व भावी पीढ़ी को सुधारना, सँवारना और राष्ट्र के योग्य नागरिक बनाने की रुचि व संकल्प रखते तो बच्चो को सही दिशा की ओर मोड़ सकना असंभव नहीं है । हमेशा हम लोग हालात की आलोचना हर कदम पर आदी हो गए हैं । उनके सुधारने की आवश्यकता पर गंभीरतापूर्वक विचार करने का प्रयत्न नहीं करते । बल्कि में कहूँगा कि हमारे अधिकांश बुजुर्ग केवल निराश हैं । इसे सीरियसली नहीं लेते । यही है बुराइयों की जड़ ।
– वैचारिक पत्रिका के पाठकों की संख्या और स्तर में गिरावट के क्या कारण हैं ?
वैचारिक पत्रिका के पाठकों की संख्या और स्तर में गिरावट का कारण माँग और आपूर्ति वाला सूत्र यानी माँग का अभाव है । दूसरे इनकी रुचि का परिष्कार करके अपनी धारा में ले जाने की स्थितियों की विद्रूपता है ।
– अहिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी की वर्तमान स्थिति पर प्रकाश डालिए ?
अहिंदी भाषी मत कहिए वरन हिंदीतर भाषा कहा कीजिए । इस क्षेत्र में हिंदी की प्रगति यानी प्रचार, अध्ययन, प्रशिक्षण, पत्रकारिता एवं सर्जनात्मक लेखन पर्याप्त संतोषजनक हैं । हिंदी भाषी पत्रकारों व लेखकों तथा शोधकर्ताओं को इसका प्रामाणिक इतिहास प्रस्तुत करना होगा । यह उनका दायित्व बनता है । परंतु मैं देखता हूँ कि हिंदी के चोटी के आलोचक हिंतर भाषी हिंदी रचनाकारों को हिंदी साहित्य के इतिहास में स्थान देना नहीं चाहते । बेचारे ऐसे लेखक आलोचक अपनी पूर्वाग्रह की बीमारी से ग्रस्त हैं । इसका इलाज समय ही कर सकता है । हम केवल अपना कार्य करते जाते हैं । इतिहास रूपी पुस्तक में हमें जगह नहीं मिली तो हमें कोई चिंता नहीं, हाँ, हम पाठकों के दिल में जगह बनाना चाहते हैं, वहाँ जगह नहीं मिली तो निश्चय ही हमारे लिए चिंता करने की बात होगी ।
– संपादक के रूप में आपके पास लम्बा अनुभव है । एक संपादक को किन-किन कठिनाइयों से गुजरना पड़ता है ?
संपादक के दायित्व ऐसे कठिनाइयों के संबंध में मैंने संक्षेप में थोड़ा परिचय दिया है । हाँ जब मैंने संपादक (चंदामामा) का दायित्व भार संभाला था तब प्रारंभ में अपनी रचनाएँ बच्चों को बिठाकर सुनाया करता था । जिस रचना को अधिकांश बच्चे पसंद करते उसी को छापने के लिए दे देता था । क्रमशः मुझे बच्चों की रुचि एवं उनके मनोविज्ञान का थोड़ा बहुत ज्ञान हुआ । फिर क्या था वही मेरी बाल रचनाओं का मानक बना ।
– बाल साहित्य की ओर युवा लेखकों का ध्यान उतना नहीं जाता जितना उपन्यास और कहानी की ओर । इसके पीछे साहित्यकारों की क्या मनोवृत्ति है ?
युवा लेखकों का ध्यान बाल साहित्य की ओर क्यों नहीं जाता, इस संबंध में मैंने अधिक सोचा और विचारा नहीं है । आप उन्हीं लेखकों से पूछिए । बंगाल, महाराष्ट्र, आन्ध्र तथा अन्य दक्षिणी भाषाओं में अल्प संख्या में ही सही युवा लेखक बाल साहित्य सृजन में संलग्न हैं ।
- दक्षिण भारत में हिंदी की सेवा कर रहे प्रमुख व्यक्तियों, संस्थाओं और पत्रिकाओं पर प्रकाश डालिए ?
दक्षिण भारत के हिंदी लेखक, प्रचारक, अनुवादक, भाषा सेवक, संस्थाओं तथा पत्रिकाओं का उल्लेख इस वार्ता में संभव है, क्योंकि इन मुद्दों पर शोध प्रबंध तथा इतिहास भी उपलब्ध हैं । आप मँगवाकर पढ़िए ।...

सृजनगाथा
रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन
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