
प्रवेशांक, जून, 2006

सृजनगाथा
रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन
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गांधी जी से हताश हुआ.... – बालाशौरि रेड्डी
(डॉ. बालाशौरि रेड्डी पर पीएचडी कर रही हैं डॉ. ऋचा राय । उन्होंने डॉ. रेड्डी के साथ ‘सृजनगाथा’ के लिए लम्बी बातचीत की जिसमें उनके जीवन के विभिन्न पहलू सामने आए हैं । बच्चों में किसी समय लोकप्रिय रही बाल पत्रिका चंदामामा के वर्षों संपादक रहे डॉ. बालाशौरि रेड्डी ने कल आज और कल बाल साहित्य की स्थिति पर बेबाक जवाब दिए हैं । प्रस्तुत है डॉ. ऋचा राय की उनके साथ बातचीत)
– रेड्डी जी आप अपना संक्षिप्त परिचय दीजिए और साथ ही कोई प्रेरक घटना जिसने आपके जीवन को मोड़ दिया हो ?
मेरा जन्म आन्ध्र प्रदेश के कड़प्पा, जिला गोलालगुडूर गांव में 1जूलाई 1928 को एक मध्य वित्त कृषक परिवार में हुआ था । मेरी माता का स्वर्गवास मेरी चार वर्ष की ऊम्र में हो गया । मेरे पिताजी से अनुरोध किया गया, ज़ोर डाला गया कि वे मेरी मौसी के साथ विवाह करे । लेकिन मेरे पिताश्री ने यह विचार कर कि सौतेली माँ का व्यवहार न मालूम कैसा होगा, दूसरा विवाह न करके भरी जवानी में जो त्याग किया इस कारण मेरी नज़र में पिताजी मेरे लिए भीष्ण पितामह से भी महान प्रतीत होते हैं । उहोंने मुझे बड़े ही लाड़ प्यार से पाला । मेरी दादी का वातसल्य मुझे भरपूर प्राप्त हुआ और नानी-चाचियों का भी । यह मेरे लिए अविस्मरणीय घटना है ।
दूसरी घटना 21 जनवरी 1946 की है । महात्मा गांधी दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास की रजत जयंती का उद्घाटन करने पधारे थे । समारोह के पश्चात कई लोग महात्मा गांधी से हस्ताक्षर ले रहे थे । मेरे मन में भी विचार आया कि मैं भी उनके हस्ताक्षर ले लूं । वे बारिस्टर हैं, अंगरेज़ी में हस्ताक्षर देंगे । मैं घर जाकर बता सकूँगा कि मैंने महात्मा गांधीजी के दर्शन किए हैं । उसका प्रमाण ये हस्ताक्षर हैं और मैं कागज़ को फ्रेम में जड़वा कर अपने घर की दीवार पर लटका दूँगा । यदि कोई शिक्षित मेरे घर आए तो मैं उसको बता सकूँगा । परंतु हस्ताक्षर के लिए महात्मा गांधीजी ने पाँच रुपए माँगे, जो वे हरिजन फण्ड के लिए वसूल कर रहे थे । मुझे लगा कि पाँच रूपए हस्ताक्षर के लिए ज्यादा हैं, किंतु बगल में खड़े खादीधारी सज्जन ने कहा कि महात्मा जी के हस्ताक्षर पाँच रुपए नहीं, सौ रुपए के बराबर हैं । मैंने महात्माजी के हाथ पाँच रुपए के साथ कागज़ का एक टुकड़ा धर दिया और सोचने लगा कि अंगरेजी में हस्ताक्षर देंगे । उनकी लिखावट सुंदर होगी । परंतु मैंने देखा कि उन्होंने हिंदी में ‘मो.क.गांधी’ लिख दिया था । मैं हताश हुआ । गांव जाकर किसी से कहूं कि ये महात्मा गांधी के हस्ताक्षर हैं तो कोई विश्वास नहीं करेगा क्योंकि मेरे गांव में उस समय तक हिंदी जानने वाला कोई नहीं था ।
गांधी जी ने अपने अभिभाषण में कहा था – “बहुत जल्द हिंदुस्तान आज़ाद होने जा रहा है । आज़ाद हिंदुस्तान की राष्ट्रभाषा हिंदी होगी । इसलिए मैं महिलाओं और युवकों से अपील करता हूँ कि आप लोग अभी से हिंदी सीखना शुरू करो, ताकि हिंदुस्तान के आज़ाद होते ही जनता की भाषा में शासन का काम होगा ।” यह गांधी जी का सपना था । परंतु स्वाधीनता के पश्चात आधी शती पूरी होने जा रही है, किंतु उनका सपना साकार न हो पाया । यह कैसे दुर्भाग्य की बात है! इसी से प्रेरणा पाकर मैंने हिंदी सीखी और हिंदी ने मेरे जीवन की धारा मोड़ दी और वही हिंदी मेरी जीवन-यात्रा का पाथेय बनी ।
– चंदामामा बाल पत्रिका के कितने वर्षों तक आप संपादक रहे और बाल पत्रिका के संपादक के रूप में कुछ खट्टे मीठे अनुभव होंग, उस पर प्रकाश डालिए ?
मैं तेइस वर्षों तक चंदामामा हिंदी संस्करण का संपादक रहा । इस सुदीर्घ यात्रा में जो खट्टे मीठे अनुभव हुए हैं, उनकी तो एक लम्बी फेहरिस्त है । उनकी विशद् चर्चा करना संभव नहीं है । हाँ, हमने इस बात का पूरा ध्यान रखा कि पत्रिका की सामग्री हम जिस आयु वर्ग तथा जिस रूचि वाले पाठक वर्ग को परोस रहे हैं, वह सुरुचिपूर्ण हो, मनोरंजक हो और साथ ही ज्ञानवर्धक भी हो । हमने एक ओर जहाँ पंचतंत्र, हितोपदेश, जातक कथाएँ, पुराण, इतिहास, विज्ञान तथा काव्य कथाएँ दी हैं, साथ ही सामाजिक कहानियों के साथ इतिहास, समस्या, चित्रकथा, पहेलियाँ, चित्र प्रतियोगिताएं इत्यादि अन्य स्तंभ भी रखे ।
आप उसकी पाठिका रही हों तो सामग्री के संबंध में मुझे बताने की आवश्यकता नहीं है । धारावाहिक उपन्यासों ने तो हिंदी पाठक जगत में उत्साह, जिज्ञासा और प्रेरणा जागृत की । इसका प्रबल प्रमाण चंदामामा की लोकप्रियता एवं प्रसार संख्या में तेजी से हुई प्रगति मानी जा सकती है ।
दक्षिण से जिन स्थितियों में चंदामामा 12 भाषाओं में निरंतर 1946 तथा 1947 से प्रकाशित होता रहा है, इसका अपना एक अनोखा इतिहास है । पाठक वर्ग में मुख्यतः अभिभावको ने चंदामामा को खूब सराहा । खुले दिल से सराहना भी की । किन्तु कुछ पूर्वाग्रह से पीड़ित हिंदी के संपादक तथा अधकचरा ज्ञान रखने वाले तथा बाल मनोविज्ञान से सर्वदा अपरिचित लेखक यदा-कदा जब भी मौका मिला चंदामामा की नीति पर आक्षेप करने और उसकी सामग्री को पौराणिक एवं परीकथाओं तक सीमित मानकर व्यंग्य बाण संधान कर संतुष्ट होते रहे । ऐसे संदर्भ बाल साहित्य तथा बाल पत्रिकाओं के संपादकों की संगोष्ठियों में आते रहे । परंतु हमने कभी इन हितैषी रचनाकारों के आक्षेपों का प्रतिवाद किया और न हमने अपनी गति बदली । आपको पता ही होगा कि प्रत्येक पत्रिका की अपनी अलग नीति होती है । नीति निर्धारण पत्रिका के प्रकाशक-संपादक करते हैं । यदि आलोचना से घबराकर हम अपनी नीति बदलते जाते हैं तो किसी पत्रिका की कोई नीति होगी और न लक्ष्य होगा । हम भी उन्हें बदलने देंगे ।...


