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प्रवेशांक, जून, 2006

सृजनगाथा
रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन
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कहानी
आखिर क्या मजबूरी थी !
के. पी. सक्सेना 'दूसरे'
मेरा मन उचट गया। सारा नशा हिरन हो गया। यद्यपि मैंने उसे आभास नहीं होने दिया कि मैंने लड़के को देख लिया है। पर अब मुझे एक पल भी वहाँ रुकना बहुत भारी लगने लगा।
शायद उसने मेरी मनःस्थिति भाँप ली थी। अतः मेरे “चलता हूँ, फिर मिलेंगे” कहने पर “अच्छा, पर इस तरह नहीं” कहा और हौले से अपनी गिरफ्त ढीली कर दी।
वह दरवाजे तक छोड़ने नहीं आई। बरामदे में अंधेरा था। आगे लान भी अंधेरे में डूबा हुआ था। मैंने मेन गेट धीरे से खोला और बाहर निकल आया। खुली हवा में एक लम्बी, गहरी साँस ली और मेन रोड पकड़ ली। कुछ दूर सीधे चलने के बाद पीछे मुड़ कर देखा तो चौथा बँगला बाहर से अब भी अंधेरे में ही डूबा हुआ था। हाँ ! अंदर वाले कमरे की धीमी रोशनी अवश्य रोशनदान से निकलने का प्रयास कर रही थी।
लगभग एक सप्ताह बाद मनोहर मिला। वह कहीं बाहर चला गया था। हम दोनों समान रूप से उतावले थे कहने-सुनने के लिए। मैंने उसे डांटते हुए कहा, “क्यों, मुझे अकेला छोड़कर भाग गये थे।”
“नहीं, बड़े भाई, बात कुछ जँच नहीं रही थी, सो मैं बढ़ लिया। लेकिन आप के लिए मैं सब सेट कर आया था। कोई ऐसी-वैसी बात तो नहीं हुई ना ? चलो कछु हमारे बतावे काजे हो तो बता दो। मन नई मान रौ।” मूड में आने के बाद वह अपनी बुंदेली में शुरू हो जाता था।
मैंने आगे का हाल कमेंट्रेटर की भाँति सुनाकर पूछा – “यार वो लड़का...”
“वो तो उसी का लड़का है।” मनोहर बड़े सहज ढंग से बोला।
“क्या ?” मुझे यकीन नहीं आया।
“हाँ बड़े भाई। वो उसी का लड़का है और सैनिक स्कूल में पढ़ता है। छुट्टियों में यहाँ आता है। पर, साब, वोए सब मालुम है।”
“तुम बकते हो।”
“नई साब, मोये तो गोपाल ने बताओ हे। वो काये खों झूठ बोले हे। कच्छू मत पूछो साब, पैंसन के काजे...” उसने बुरा सा मुँह बनाया।
मनोहर की बात मुझे अच्छी नहीं लगी। मैंने कहा, “नहीं, ऐसी बात तो नहीं लगती। अब मैंने ही उसे कोई पैसा नहीं दिया और न उसने माँगा।” मैं जानता था कि यह सुनते ही वह एकदम चौंक जाएगा।
“पैसे ! वो तो मैं गोपाल को पहले ही पकड़ा आया था। दो सौ, खाने-पीने के और...” वह फिर उसी सहजता से बोला।
अब चौंकने की बारी मेरी थी। मेरी सोच को बड़ा धक्का लगा और मैं अनमना हो गया।
इस घटना को गुजरे एक माह होने को आया लेकिन शायद ही कोई ऐसा दिन बीता हो कि उसकी याद न आई हो। किसी बहाने सही, अब मेरी उत्सुकता इस बात को लेकर और बढ़ गई थी कि आखिर वह क्या कारण है कि जिसके लिए वह यह सब करती है ? मेरा लेखक मन गोपाल को तलाशने लगा, लेकिन वह भी न जाने कहाँ गायब हो गया था।
एक दिन मुझे याद आया कि उसने कहा था कि वह संडे के दिन गोपाल के रिक्शे में पिक्चर देखने आती है। मैं अगले संडे शाम का शो शुरू होने के आधे घंटे पहले वहाँ पहुँच गया। रिक्शा स्टैण्ड में गोपाल को ढूँढा, पर वह नहीं मिला। मन बहुत उद्विग्न हो रहा था कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करुँ। दिलो-दिमाग से उसका चेहरा हटने का नाम ही नहीं ले रहा था। सोचा रूम मे जाकर तो और बोरियत होगी। स्टेशन का एक चक्कर लगाया जाय, शायद कुछ मन बहले। रेल्वे क्रॉसिंग के आगे जहाँ से शार्ट कट शुरू होता था, मैं मुड़ते-मुड़ते अचानक मेर रोड की ओर चल पड़ा। शायद यह मेरे दिल का चोर था, क्योंकि मेन रोड में उसका बँगला पड़ता था।
जब बँगला तीन चार क्वार्टर आगे रह गया तो जाने क्यों दिल की धड़कन तेज हो गयी और चाल धीमी। बँगला उस दिन की तरह आज भी अंधेरे में डूबा हुआ था और अंदर वाले कमरे से धीमी-धीमी रोशनी बाहर की ओर फिसल रही थी। अचानक मेरे पैर उस गेट के सामने रुके और यंत्रचलित सा हाथ घंटी बजाने को उठ गया। कुछ पलों में ही वो गहरे कत्थई सलवार सूट में खुले बाल लिए दरवाजे में हाजिर हो गयी।
मैंने मुसकरा कर नमस्ते की। जवाब में उसने बगैर किसी उत्साह के सिर्फ सिर हिला दिया, जिससे मेरा सारा जोश ठंडा हो गया।
“अभी मैं खाना बना रही हूँ, आप फिर कभी आइएगा।” उसने बड़े ठंडेपन से कहा और मेरे मुड़ते ही दरवाजा लगा लिया। मुझे लगा कि मैं एकदम नंगा हो गया हूँ। सोचा, जितनी जल्दी इस इलाके से निकल जाऊँ अच्छा रहे लेकिन पैर ऐसे भारी हो गये थे जैसे उन पर मनों बोझ हो। रास्ते में कोई रिक्शा नहीं मिला। किसी तरह कमरे में पहुँचा और बगैर कपड़े बदले बिस्तर पर लुढ़क गया। सुबह देर से आँख खुली। सिर भारी था। लेकिन नौ बजे की क्लास थी सो जल्दी-जल्दी तैयार हो गया। कॉलेज दूर न था। अतः पैदल ही जाता था। अभी होटल से कुछ दूर ही निकला होऊँगा कि पीछे से एक रिक्शा आकर बगल में रुक गया। देखा तो गोपाल था। मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। जिसे ढूँढते-ढूँढते थक गया वह मेरे सामने स्वयं आ गया।
मैं कुछ बोलने को ही था कि वही बोला –
“साब, एक मिनट सुनेंगे।”
“हाँ-हाँ, बोलो, मैं खुद तुम्हे ही खोज रहा था।”
“आप कल वहाँ गये थे ?”
“हां, क्यों ? तुम्हें...”
“आइंदा आप वहाँ नहीं जाएंगे, बगैर मेरे।”
“लेकिन...”
“लेकिन वेकिन कुछ नहीं। हमने के दई बस।” उसकी भृकुटि जरा टेढ़ी हो गयी थी।
वह दिन और आज का दिन अभी तक मेरी जिज्ञासा शांत नहीं हुई कि आखिर वह क्या मजबूरी थी....।
समाधान मिला तो अगली कहानी में मिलेंगे।
समाप्त