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प्रवेशांक, जून, 2006

सृजनगाथा
रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन
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कहानी
आखिर क्या मजबूरी थी !
के. पी. सक्सेना 'दूसरे'
“नहीं कुछ खास नहीं।” मैं सकपका या।
“जानती हूँ, आपको पैसे ज्यादा लग रहे हैं। लेकिन हमें एक स्टैण्डर्ड बनाकर रखना पड़ता है नहीं तो कोई भी ऐरा-गैरा मुँह उठाए चला आएगा और फिर खर्चे भी तो लगे हैं। अब यह रिक्शा वाला ही ले लो। भरोसे का बना रहे, अतः इसे भी सम्हालना पड़ता है। छोटी सी बस्ती है... सब देखना पड़ता है। अब आप जैसे लोग भी ऐसा सोचेंगे तो...” बात अधूरी छोड़कर वह मेरी ओर एक भेद भरी नज़र डालते हुए अंदर चली गयी।
मैं बड़ी दुविधा में पड़ गया। दस मिनट हो गये न मनोहर आया और न ही वह बाहर आई। मुझे भी थोड़ा-थोड़ा नशा होने लगा था और उसका बार-बार अंदर जाना भी जाने क्यों मुझे आशंकित सा कर रहा था। अब मैंने सोचा की अगली ‘होनी’ से बेहतर है चुपचाप निकल लूँ। मैंने गिलास में पड़ी व्हिस्की हलक से उतारी और खड़ा हो गया। दो कदम आगे ही अंदर की ओर खुलने वाला दूसरा दरवाजा था, जिसका पर्दा आधा खुला हुआ था। उस कमरे में रोशनी धीमी थी, फिर भी इतना दिख गया कि वह वहाँ दीवार से सटे पलंग पर अधलेटी है। यूँ ही बगैर कुछ कहे चले जाना असभ्यता होगी। अतः मैं उसके कमरे में पलंग के पास खड़ा होकर शब्द टटोलने लगा, क्योंकि वह उनींदी सी मेरी ओर ही देखे जा रही थी।
“मनोहर अब तक आया नहीं। आए तो कह देना कि मुझे कुछ जरूरी काम था इसलिए चला गया।” बड़ी मुश्किल से इतना कहकर मैं ज्योंही आगे बढ़ने को हुआ, “वो नहीं आयेगा।” कहकर उसने मेरा हाथ हौले से अपनी ओर खींचा। मैं चूँकि इस स्थिति के लिए तैयार न था और कुछ अल्कोहल का असर भी था, भरभरा कर उसके ऊपर गिर पड़ा। वो हँसने लगी। फिर बोली, “मैंने उसे बहाने से चलता कर दिया, क्योंकि मुझे उसके बात करने का तरीका कुछ जँचा नहीं।”
“और मैं ?” मैंने उठने का प्रयास नहीं किया।
“आप ! आप तो बस आप हैं। यकीन मानेंगे, मेरे इस कमरे तक कभी कोई यूँ ही नहीं आता।”
“बेकार की बात है। हम यूँ ही आ गये कि नहीं ?”
“यही तो... मुझे पता था तुम यही कहोगे। अच्छा बताओ, पिछले रविवार को तुम शाम को पिक्चर देखने गये थे ?” मैंने याद कर कहा – “हाँ, लेकिन तुम्हें कैसे पता ?”
“बस उसी दिन मैंने तुम्हें देखा था। देखा क्या, गोपाल ने दिखाया था।”
“गोपाल कौन ?”
“अरे वही रिक्शे वाला। जब मन उचटता है तो गोपाल को बुलाकर सिनेमा देखने चल देती हूँ, और करूँ भी क्या ? उसी ने बताया कि आप हाल में ही आये हैं। कॉलेज में पढ़ाते हैं और अकेले रहते हैं।”
“और इसीलिए तुम्हें मुझ पर तरस आ गया।” मैंने चुहल की।
उसने थोड़ा शरमाते हुए मेरे सीने में अपना मुँह छिपा लिया। हम कुछ क्षणों तक इसी तरह पड़े रहे। फिर वह अपनी दोनों कुहनियों पर शरीर का सारा बोझ डालते हुए चेहरा मेरे बिल्कुल पास लाकर बोली, “इस छोटी सी बस्ती के इस बंद-बंद कमरे में मेरा दम घुटता है। मेरे साथ बाहर चलोगे ?”
“बाहर ? बाहर कहाँ ?” मैं चौंका।
“कहीं भी... जबलपुर या...। जबलपुर ही चलते हैं। भेड़ाघाट घूमेंगे। पूर्णमासी के दिन, रात में वहाँ बहुत अच्छा लगता है। सब कुछ मेरी तरफ से। मैं, फर्स्ट क्लास कूपे में अपनी बुकिंग ले लूँगी, फिर उसमें कोई नहीं आएगा। तुम बस ऐन टाइम में स्टेशन पर आ जाना, मैं सब सम्हाल लूँगी। मेरी मौसी रहती है, गार्ड साहब जानते हैं, इसलिए उनकी कोई चिंता नहीं।”
बातों में मुझे रस आने लगा था, मगर घड़ी आठ बजा रही थी। न चाहते हुए भी मैं बोला, “अच्छा अब चलते हैं।”
“चले जाना। अभी तो प्रोग्राम बनाना शुरू किया है। अच्छा थोड़ा और रुको मैं तुम्हारे लिए एक ड्रिंक बनाती हूँ, उसे लेकर चले जाना।”
लौटी तो उसके दोनों हाथों में गिलास थे। आकर, धम्म से पलंग पर इस तरह बैठी कि मुझे रोमांच हो आया। वह एक गिलास मुझे देकर दूसरा स्वयं सिप करने लगी थी।
“इज़ इट फॉर रोड ?” मैंने हँस कर पूछा तो उसने धीरे से नकारात्मक सर हिलाकर उसे मेरे सीने में टिका दिया।
इस कमरे में कम रोशनी का कारण था इकलौता टेबल लैम्प, जो दीवार की ओर मुँह करके रखा गया था। इस कमरे में दो और दरवाजे थे। एक अंदर की ओर और दूसरा शायद सीधे बाहर बरामदे में खुलता था। नशा जो उतार पर आ रहा था, इस पैग के बाद फिर शूट कर गया। वह अपना ड्रिंक खत्म कर सीधी लेट गयी। उसके देह की गर्मी अब मुझे बर्दाश्त नहीं हो रही थी। अब मेरी इच्छा भी उसे आलिंगन में लेने की होने लगी। मैं इसके लिए ज्यों ही उसके ऊपर झुका तभी... मुझे ऐसा लगा कि कमरे में कोई दबे पाँव आया है। मैंने अपनी गर्दन घुमाकर शंका का समाधान करना चाहा तो उसने मेरा चेहरा अपने सीने में धँसा दिया।
चेहरा थोड़ा तिरछा दबा होने के कारण मेरी एक आँख खुली थी। मैंने देखा कि एक दस-ग्यारह साल का बालक सर झुकाए कमरे से गुज़र रहा था। कमरे में धीमी रोशनी के कारण कोई आकृति साफ नज़र नहीं आ रही थी।
क्रमशः