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प्रवेशांक, जून, 2006

सृजनगाथा
रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन
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कहानी
आखिर क्या मजबूरी थी !
के. पी. सक्सेना 'दूसरे'
अब मैंने उसे जरा गौर से देखा। औसत कद, खुलता हुआ रंग, बदन में हल्की सी चर्बी की शुरूआत, मेकअप से सँवारा हुआ चेहरा, उम्र कोई पैंतीस-छत्तीस के आसपास। साधारण नाक नक्श के बावजूद वह प्रथमदृष्टया किसी का भी ध्यान खींचने में सक्षम लगी।
हम लोग धीरे-धीरे सहज होने लगे थे। मनोहर स्थानीय होने के कारण उसके बारे में शायद थोड़ा बहुत जानता था। अतः बातचीत उसी ने आरंभ की,
“गार्ड साहब नहीं हैं क्या ?”
“वो रहते ही कब हैं ! जब देखो तब, लाइन पर।”
“आपकी तो अब आदत पड़ चुकी होगी।”
“हाँ... ना भी पड़ी हो तो क्या !”
“अकेली बोर हो जाती होंगी।”
“कभी-कभी तो बहुत बोर होती हूँ और कभी-कभी आप जैसा कोई भला मानस आ जाता है तो थोड़ा टाइम पास हो जाता है।” वह मुसकरायी।
“आप इतने चुप क्यों हैं ?”
“जरा संकोची हैं और कोई बात नहीं।” मनोहर ने मेरा पक्ष लिया।
“साहब कब तक लौटेंगे ?” मैंने अपना मौन तोड़ा।
“अभी चार बजे की मेल लेकर गये हैं, रात को लौटने से रहे।” वह फिर मुसकरायी।
मैं कुछ चुटीली बात कहने को था कि बाहर कोई आहट सुनाई दी। मेरी सकपकाहट भाँपकर मनोहर ने धीरे से मेरा हाथ दबाया। वह मैं देखती हूँ कहकर उठ गई। लौटी तो मनोहर से बोली, “वो आया है।” और एक पैकेट लेकर अंदर की ओर चली गयी।
मनोहर बाहर की ओर गया और थोड़ी देर में वापस आ गया।
“एक हरा पत्ता मांगा है।” मनोहर फुसफुसाया। सौ के नोट को उधर हरा पत्ता कहने का चलन था।
“चल उठ।” मैंने उसका हाथ पकड़ा।
“चले चलेंगे बड़े भाई, अब आ ही गये हैं तो थोड़ा, कलर तो देख लें।” यह उसका तकिया कलाम था। जब भी मूड में आता, एक-दो बार अवश्य दोहराता।
इस बार वह जब आई तो उसकी ट्रे में काजू, नमकीन, गिलास और जग के अलावा एक व्हिस्की की बाटल भी थी। उसने सब टेबल पर लगाया और “आप लोग शुरु करें” कह कर अंदर चली गयी। मनोहर व्हिस्की की बाटल उठाते हुए बोला – “चलो बड़े भाई, पहले थोड़ा नारमल होते हैं, फिर कलर देखेंगे।”
मैंने उसे रोकते हुए अंदर की ओर इशारा किया। मनोहर समझ कर रुक गया। थोड़ी देर बाद वो आई और हमें यूँ ही बैठा देखकर बोली, “अरे आपने अभी तक शुरू नहीं किया ! भई सोडा तो घर में नहीं है।”
“बात सोडे की नहीं, दरअसल हम आपका इंतजार कर रहे थे।”
“नहीं-नहीं, आप दोनों लीजिए।” वह बोली।
मुझे लगा कि उसकी इंकार में ज्यादा दम नहीं है, इसलिए मनुहार से बोला, “कोई बात नहीं, बैठिए तो सही। वैसे दो-चार बूँद से कोई प्राब्लम नहीं होगी। आपके गिलास में बस कंपनी के ही सही, थोड़ा सा डाल लें।” जवाब में जब वह चुप रही तो मनोहर ने तीनों गिलास में पैग बना दिये, जिसे अनदेखा किये रही। लेकिन जब चीयर्स के लिए गिलास उठाए गये तो उसने टकराने के लिए यह कहकर मना कर दिया कि “नहीं, नहीं हमें यह अच्छा नहीं लगता।” हमने भी ज़िद नहीं की।
हल्की-फुल्की बातें चल निकलीं। बस्ती, बस्ती के लोग वगैरह-वगैरह। अब हम लोग सामान्य मित्रों जैसी बातें करने लगे थे। थोड़ी देर में सुरूर आने लगा तो मनोहर अचानक बोला, “और सब तो ठीक है मैडम, पर आपने कुछ जादइ मांग रही हो।”
“देखिये, अब इस मूड में ऐसी बातें मत करिए। कुछ ज्यादा नहीं है।”
“ज्यादा तो है। वो तो देवे के बारे को समझ में आत है। अब देखो, तुमाओ आदमी हमें इते ले लाओ। हम आ भी गए, कच्छू तो खयाल करो।” ऐसा लगा मनोहर सौदेबाजी पर उतर आया है। उसका तीसरा पैग समाप्ति पर था, मेरा दूसरा और उन्होंने पहला खत्म कर गिलास हटा दिया था।
“आपने ठीक कहा कि हमारा आदमी ही आपको ले के आया है। उसे ऐसा ही निर्देश है कोई ऐसा-वैसा आदमी इस दरवाजे तक नहीं आना चाहिए।” उसने बड़ी चतुराई से हमें चने में चढ़ा कर अपनी वाणिज्यिक बुद्धि का परिचय दिया।
मनोहर को शायद तलब लगी हो अतः वह सिगरेट लेकर आता हूँ कहकर बाहर निकल गया। अब वह मनोहर की जगह में बैठ गयी। मनोहर और मैं एक ही सोफे में बैठे थे। इसलिए अब मेरे और उसके बीच न के बराबर दूरी थी। अलकोहल अपना असर दिखा रही थी, लेकिन जाने क्यों मेरे दिमाग में भी रह-हकर यह बात आ रही थी कि वास्तव में सौ रुपये बहुत होते हैं। मैं कुछ कहने की सोच ही रहा था कि उसने मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर धीरे से दबाया और बोली, “इतना क्या सोच रहे हैं ?”
क्रमशः.....