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प्रवेशांक, जून, 2006

सृजनगाथा
रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन
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कहानी
आखिर क्या मजबूरी थी !
के. पी. सक्सेना 'दूसरे'
चाय पीकर हम लोग बाहर घूमने निकल पड़े। सड़क पर बहुत चिपचिप थी, लेकिन भीनी-भीनी हवा चलने के कारण मौसम बड़ा खुशगवार लग रहा था। रूटीन के अनुसार छु्ट्टी के दिन अगर शाम को हम लोग घूमने निकलते तो लगभग यह तय रहता था कि सिनेमा चौक से होते हुए रेल्वे स्टेशन तक जाएंगे, एक दो मैगजीन खरीदेंगे, ट्रेन का वक्त हुआ तो प्लेटफार्म के एक-दो चक्कर लगाएंगे और चाय-साय पीकर वापस हो लेंगे। कभी-कभी कोई बहाना मिल गया या किसी की जेब ज्यादा उछलती नज़र आई तो पास के ढाबे में जाकर थोड़ा मौज-मस्ती कर ली और खाना खाकर अपने-अपने दड़बे में।
लगभग इसी स्वाभाविक क्रम में हम स्टेशन की ओर बढ़ रहे थे कि सिनेमा चौक पर एक रिक्शेवाले ने सलाम ठोंका। मैंने सोचा कि सवारी पाने की लालच में वह ऐसा कर रहा है। लेकिन वह तो मनोहर का परिचित निकला। वह मनोहर को एक ओर ले जाकर बात करने लगा। थोड़ी देर तक मैं चुप रहा, लेकिन जब देर होती दिखी तो मैंने उनकी ओर गौर किया। मुझे लगा कि मनोहर किसी बात के लिए मना कर रहा है और बार-बार वह उसका हाथ पकड़कर कुछ मनुहार सा कर रहा है।
“क्यों जिद कर रहा है भाई, कोई और सवारी देख ले।” मैं उसकी ओर देखकर बोला।
“वो बात नहीं है ।” मनोहर बोला।
“फिर क्या बात है ?” मेरे यह पूछने पर वह बात टालने की गरज से उससे बोला, “अच्छा चल स्टेशन तक छोड़ दे।”
मैं कुछ समझा नहीं। स्टेशन तो हम कभी रिक्शे से नहीं आते थे। फिर भी मनोहर की इच्छा देखकर बैठ गया। बस्ती से स्टेशन जाने के दो मार्ग थे। एक शार्टकट, जिससे प्रायः पैदल यात्री आया-जाया करते थे और दूसरा मुख्य मार्ग जो रेल्वे कॉलोनी से होकर गुजरता था। चूँकि हम लोग रिक्शे में थे, स्वाभाविक है कि रिक्शा कॉलोनी से होकर जाएगा। इसलिए मैंने मनोहर की ओर प्रश्नवाचक निगाह उठाई। वह धीरे से कान में फुसफुसाया, “बड़े भाई, दरअसल ये रिक्शेवाला हमें मनोरंजन के लिए एक जगह ले जाना चाहता है।”
“क्या बकवास करते हो।”
“वही तो। मैं भी इससे यही कह रहा था, पर मानता ही नहीं। कहता है बस एक बार मिल लो। कोई ऐसी-वैसी जगह नहीं है, देखकर तबियत खुश हो जाएगी। वह आपको भी जानता हैकि आप कॉलेज में पढ़ाते हैं।” बोलते-बोलते एक क्षण को मनोहर मेरी प्रतिक्रिया देखने को रूका।
“मैं इस पचड़े में नहीं पड़ता। तुझे जाना है तो जा।” मैंने रिक्शेवाले को रिक्शा किनारे लगाने को कहा।
मनोहर ने मुझे उतरने न दिया। वह रिक्शेवाले से बोला, “अच्छा चलो, स्टेशन तो चलो।” रिक्शा बड़े अनमने ढंग से आगे बढ़ा और स्टेशन के मेन गेट पर लाकर खड़ा कर दिया। मनोहर पैसे देने लगा तो मैं सिगरेट लेने के लिए आगे की ओर बढ़ गया। सिगरेट लेने के बाद पलट कर देखा तो वह अभी भीमनोहर के पीछे लगा हुआ दिखा। जाने क्यों मुझे लगा कि मनोहर की भी थोड़ी इच्छा है, किन्तु मेरे कारण संकोच में है। अब मैं आप लोगों से सच बताऊँ, तो क्यूरोसिटी मेरी भी बढ़ गयी थी। कभी-कभार दोस्तों के संग गाना-वाना सुनने तक का मेरा अनुभव था, लेकिन उसे आगे नहीं। बस इसीलिए दुविधा थी। तभी मनोहर मेरे पास आकर बोला –
“उसका कहना है कि एक बार हम मिल भर लें मिलने में कोई खतरा नहीं – कोई खर्चा नहीं। बात नहीं जमी तो तो वह वापस यहीं छोड़ देगा। हाँ, ये आदमी भरोसे का है और हमसे कोई चाल नहीं चलेगा, इतना मैं जानता हूँ लेकिन मेरी मर्जी के बिना आपके नहीं है ये आप जान लो।”
यह सोचकर कि ऐसा भी एक अनुभव अपने जीवन में जोड़ा जाय, मैंने मनोहर पर मानो एक एहसान करते हुए कहा, मैंने मनोहर पर मानों एक एहसान करते हुए कहा, “चलो, अब तुम्हारा दिल नहीं तोड़ता, लेकिन ज्यादा देर रुकूँगा नहीं। तुम उससे कह दो कि पास ही कहीं खड़ा रहेगा और मुझे तुरंत होटल छोड़ देगा।”
ऐसा लगा कि मेरी बात मनोहर को मनमाफिक लगी। उसने रिक्शावाले को इशारा किया जो शायद अपनी अनुभवी आँखों से ताड़ चुका था कि तीर निशाने में लग चुका है। रिक्शा फिर रेल्वे कॉलोनी की ओर बढ़ने लगा और एक दो चौराहे से घूमता हुआ एक जगह सड़क के किनारे खड़ा हो गया। सड़क के एक ओर रेल्वे अधिकारियों के एवं दूसरी ओर स्टाफ के क्वार्टर्स लाइन से बने हुए थे। आगे चलकर बड़ा सा मैदान था, जिसके पीछे कुछ झुग्गी-झोंपड़ी। मैं समझ गया कि अब यह किसी गली मे घुस कर किसी झोपड़पट्टी में जाएगा। मैं उसे जाता देखता रहा। लेकिन यह क्या, उसने तो सामने वाले बंगले की घन्टी बजा दी। मैं चौंका और मनोहर की ओर प्रश्नवाचक निगाह दौड़ाई।
क्रमशः

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