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प्रवेशांक, जून, 2006

 

 

 

सृजनगाथा  

रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

 

 

 

 

 

                   

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

कहानी

आखिर क्या मजबूरी थी !

के. पी. सक्सेना 'दूसरे'

हालाँकि इस बात को तीस वर्ष बीत चुके होंगे किन्तु याद आते ही सारी बातें टी.वी. सीरियल की भाँति सामने आने लगती हैं। यह जानते हुए भी कि जिस पात्र की मैं आज चर्चा करने जा रहा हूँ शायद इस समय वह अपने नाती-पोतों के पोतड़े धो रही होगी या पता नहीं संसार में है भी या नहीं, पर बात मैं ज्यों की त्यों आपके सामने रखूँगा, केवल नाम काल्पनिक होंगे, ये मेरा वायदा रहा।

 

आप टोक सकते हैं कि इतने वर्षों बाद ऐसी क्या आन पड़ी जो मैं किसी के कपड़े उतारने के लिए उतावला हो गया (जी हाँ, ठीक ही शब्दो का इस्तेमाल हो गया इसे कपड़ा उतारना ही तो कहेंगे), तो इसका मुख्य कारण है कि इन तीस वर्षों में अक्सर मुझे यह प्रश्न अक्सर कचोटता रहा कि आखिर उसकी क्या मजबूरी थी जो...। आज चूँकि मेरी ट्रेन उसी स्टेशन से गुजर रही है, जहाँ इस वाकये का जन्म हुआ था, मैं उसे पहली बार आपके समक्ष उदघाटित करने जा रहा हूँ इस आशा के साथ की हो सकता है कि कहीं यह उसके पढ़ने में आ जाय और वह तरस खा कर मेरे प्रश्न का समाधान कर दे ! यकीन मानिए कि अगर खुदा न खास्ता ऐसा हो पाया तो एक कहानी फिर लिखूँगा।

 

चलिए बात को ज्यादा न खींचकर मैं एक ही एपीसोड में इसे आप तक पहुँचाने का प्रयास करता हूँ। उन दिनों मेरी पोस्टिंग इस कस्बेनुमा तहसील के एकमात्र कॉलेज में हुई, तो मुझे जरा भी नहीं सुहाया था। बस्ती में मनोरंजन के नाम पर केवल एक सिनेमा-घर था, जिसमें पिताजी के जमाने की हीरोइनों की पिक्चर ही अक्सर देखने को मिलतीं। आबादी इतनी कि एक घन्टे में यदि आप एक कोने से दूसरे कोने को पैदल नापें तो बहुत संभव है कि वही चेहरे आपको दुबारा, तिबारा देखने को मिल जाएँ। हाँ, स्टेशन अलबत्ता जंक्शन होने की वजह से गुलज़ार रहता था, जहाँ इस बस्ती के नौजवान प्रायः टाइम-पास करने या आँख सेंकने के लिए दिन में कई बार चक्कर लगाया करते थे।

 

मैं अकेला होने के कारण एक होटल में कमरा लेकर रहने लगा था, ताकि दुनियाभर की गृहस्थी संबंधी झंझटों से मुक्त रह सकूँ। चूँकि यह इस बस्ती का इकलौता होटल था, जो माहवारी पर कमरे देता था, मेरे जैसे कई नौकरीपेशा लोगों की यह शरणस्थली थी। अतः अच्छी कंपनी बन गई थी। कॉलेज के बाद अक्सर हमारी महफ़िल जम जाती और गपशप करते-करते टाइम कट जाया करता। छुट्टियों के दिन तो यह आलम सुबह से ही शुरू हो जाता, जिसका एक बड़ा फायदा यह था कि लोग परदेश में एकाकी होने की मनहूसियत से बचे रहते और एक-दूसरे का दुःख-सुख बाँट लिया करते थे।

 

उस दिन भी अवकाश था। बरसात का मौसम रात से पानी जो शुरू हुआ तो रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था। शायद दो-तीन दिन की लगातार छुट्टियाँ थी इसलिए फोर्स्ड बैचलर घर चले गए थे और होटल सूनसान था। मैंने सुबह नौ बजे बिस्तर छोड़ा। लेकिन करूँगा क्या यह सोचकर मुँह धोकर फिर बिस्तर में घुस गया। पड़े-पड़े दो-तीन चाय पी डाली और दोनों दैनिक पेपर चाट डाले। आवश्यकता है से लेकर बवासीरके इलाज तक का कालम पढ़ डाला, लेकिन समय अजगर हो गया था, सरक ही नहीं रहा था। हारकर खाना खाया और एक उपन्यास लेकर फिर बिस्तर में घुस गया। जाने कब नींद आ गयी।

 

जब नींद खुली तो चार बज रहे थे, तभी मनोहर आ गया। उसे देखकर मैंने राहत की साँस ली और चाय मंगाई। बाहर का हाल पूछने पर उसने बताया कि अभी थोड़ी देर पहले ही बरसात थमी है। घर में बोर हो रहा था, इसलिए मेरे पास टाइम पास करने चला आया।

 

मनोहर स्थानीय व्यक्ति था। नौकरी न मिलने के कारण कुछ ही समय पहले ठेकेदारी शुरू की थी। स्वभाव का अच्छा था लेकिन लिखा-पढ़ी में कमजोर था। अक्सर मेरे पास आ जाया करता था, कभी बिल चेक कराने तो कभी कोई लेटर लिखवाने। कोई वैधानिक अड़चन आने पर भी कभी-कभी वह मुझसे सलाह लिया करता था और इसीलिए वह मुझे अक्सर बड़ा भाई कहकर संबोधित किया करता। उसकी एक आदत यह भी थी कि हम जब कहीं खाने-पीने बैठते, वह मुझे कभी खर्च नहीं करने देता था, शायद इसी बहाने मुझे उपकृत करना चाहता हो, उसे समय-समय पर दी गयी सलाहों की एवज में।

क्रमशः

                                                                                    1,2,3,4,5