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प्रवेशांक, जून, 2006
सृजनगाथा
रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन
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डॉ.शोभाकांत झा की रचना
बहुत से अदमी शक्ल-सूरत से आदमी जरूर होते हैं, किंतु अपनी आदत और रोजमर्रे के ऐसे बिन बिके गुलाम होते हैं कि आदमियत को उनके आदमी होने पर शक होने लगता है। न वे सोनहा बिहान को आँखों में भर पाते न परी-सी शाम को।
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प्रख्यात संपादक
राजेन्द्र अवस्थी की कहानी
बचपन के गीत, बचपन के बीतते-बीतते अपने-आप डूब जाते हैं, जैसे सबेरे के सूरज के पहले ही आसमान के तारों को एक-एक कर नीचे समंदर में कूद जाना पड़ता है; मानो कोई ग्वाला उनके पीछे लगा, उन्हें इसके लिए विवश कर रहा है। रसीली क्या करती ? गाड़ी के चक्के की तरह जिंदगी घूम रही है। आदमी उसकी लीक पर खड़ा है। ....
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'सृजनगाथा' बहुआयामी सांस्कृतिक संगठन 'सृजन-सम्मान' की अव्यावसायिक मासिक पत्रिका है ।
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