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प्रवेशांक, जून, 2006

सृजनगाथा  

रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

बचपन

 

इस अंक में- 

बाल गीत- शंभूलाल शर्मा वसंत  

लोककथा- प्रगति रथ

बालकहानी- डॉ. मालती शर्मा  

प्रेरक प्रसंग- उपेन्द्रनाथ अश्क

 

लोककथा...

 

बुढ़िया और उसके चार बेटे

 

      एक थी बुढ़िया। उसके चार बेटे थे। एक का नाम था हमर, दूसरे का तमर, तीसरे का सारिंगा और चौथे का गनी।

 

      गांव में नौटंकी वाले अपना खेल दिखाने आए। बहुत खेल दिखाते थे। लड़कों ने कहा, ‘‘ मां, मां! आज तो हमें नौटंकी देखने जाना है।’’

 

      बुढ़िया बोली, ‘‘जाओ, जल्दी ही घर आ जाना। मेरे मन में तो आज-कल चोरों का डर बना रहता है। लेकिन कोई फिकर की बात नहीं । तुम खेल देख आओ।’’

 

      इधर लड़कों नौटंकी देखने चले गए और उधर कुद ही देर बाद घर में चोर घुसे। चोरों ने तो सबकुछ समेटना शुरू किया। काले-गोरे बैल खोल लिये। भूरी-भगोरी भैंस ले ली। घर में जो भी चीज़ हाथ लगी, सो सब समेट ली। घर का सारा माल-मत्ता लेकर चोर तो चल दिए। उन्हें जाते देख बुढ़िया ने दुखभरी आवाज़ में कहा, ‘‘ले जाओ। तुम्हारे बाप का माल है, तो तुम ले जाओ। मेरे लड़के अभी लौटने ही वाले हैं। अगर वे नौटंकी देखने न गए होते, तो यहीं तुमसे अच्छी तरह निपट लेते।’’ 

 

सुनकर एक चोर ने कहा, ‘‘क्यों न इस बुढ़िया को भी हम अपने साथ ले जायं? फिर कौन हमारा पीछा करेगा?’’

चोरों ने बुढ़िया को एक गठरी में बांध लिया। एक चोर ने गठरी अपने सिर पर उठा ली। दूसरे चोर माल लेकर चलते बने।

 

      गठरी वाले चोर ने कहा, ‘‘तुम सब बहुत दूर-दूर पहुंच जाओ। मैं बुढ़िया को सिर पर रखकर नौटंकी के खेल में नाचने-कूदने का एक खेल अपना भी दिखा दूंगा। बुढ़िया के लड़के खेल देखने में लगे रहेंगे, इसलिए वे तो देर से ही अपने घर पहुंच पायंगे।’’

 

      दूसरे चोर तो आगे बढ़ गए। पर गठरी वाला चोर बुढ़िया की गठरी को अपने सिर पर रखकर नौटंकी वालों के खेल में शामिल हो गया, और सबके साथ वह भी नाचने-कूदने लगा। लोग बोले, ‘‘यह कोई नया खिलाड़ी, नई वेश-भूषा में आया है।’’

 

      बुढ़िया के चारों बेटे एक खटिया पर बैठे थे, सो वे वहीं बैठे रहे। बोले, ‘‘यह नया खेल देखकर ही चलेंगे। देर तो हो गई। मां हमारी बाट भी देख रही होगी। पर देर में थोड़ी देर और सही।’’

 

      चोर खिलाड़ी नाचता जाता, तालियां बजाता और सबको हंसाता। इसी बीच बुढ़िया ने गठरी के अन्दर से झांककर चारों ओर अपनी निगाह दौड़ाई। उसने देखा, उसके बेटे खटिया पर बैठे हैं। बुढ़िया गठरी में से बोली:

 

उठो बेटो हमर-तमर

उठो पूत सारिंगा।

आधे ढोर गनी गए।

आधे ढोर गनी गए।

थै-थै-थै-थै, ता-ता-थै-थै-थै।

 

       सिर पर रखी गठरी में से बुढ़िया को बोलते सुना, तो चोर खिलाड़ी परेशान हो उठा। मन-ही-मन बोला—‘बुरे फंसे! इस बुढ़िया ने तो सारा खेल ही बिगाड़ दिया।बुढ़िया की बात लोग सुन न सकें, इसके लिए चोर चिल्ला-चिल्लाकर बोलने लगा:

तुम सच कहती हो।

सच कहती हो।

माल तुम्हारा गया कच्छ।

माल तुम्हारा गया कच्छ।

 

  इतना कहकर चोर ने अपने सिर पर रखी गठरी उठाई और उसे ज़ोर से ज़मीन पर पटक कर वहां से भाग निकला।

 

इसी बीच सबलोग गठरी के आपसपास इकट्ठा हो गए। गठरी खेली, तो अन्दर से बुढ़िया निकली! बुढ़िया ने चारों की सारी बात कह सुनाई। सुनते ही हमर-तम, सारिंगा और गनी चारों भाई चारों दिशाओं में दौड़ गए। उन्होंने चोरों को पकड़ लिया और चोरी गया सारा माल भी वे अपने साथ ले आए।

 

        बुढ़िया ने छह महीनों तक खाट पर पड़े-पड़े हलुआ खाया। लेकिन उसका चोरी गया सारा माल तो सही सलामत मिल ही गया।

 प्रस्तुतिः प्रगति रथ

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

                                                                           

 

 

 

                                         

                                                                      

 

                                                                        

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Text Box: ●संपादकः जयप्रकाश मानस ●संपादक मंडलः राम पटवा,संतोष रंजन, डॉ.सुधीर शर्मा, आदेश ठाकुर ●तकनीकप्रशांत रथ