सृजनगाथा  

रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

 

 

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अंक-2. जुलाई 2006

 

 

Text Box: इस अंक के रचनाकार - प्रभाकर श्रोत्रिय  विजय कुमार देव

संस्कार

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

   

 

 

 

 

साहित्य के एकांगी प्रवक्ता और उत्सुक पीढ़ी का असमंजस

विजय कुमार देव

 

आज असमंजस में वे हैं जो साहित्य को जानना चाहते हैं, जिन्होंने जान लिया उनकी मान्यताएं भी रुढ़ और दृढ़-सी हो गई हैं । साहित्य क्या है ? इस पर बहुत कुछ, लिखा कहा गया है ।

 

कविता क्या है ?’ निबंध में आचार्य रामचंद्र शुक्ल बहुत गहराई तक विवेचन करते हैं। हमारे यहां काव्य को ही साहित्य कहा गया है। मोटे तौर पर इसी मान्यता के आसपास जब साहित्य-जगत में प्रवेश के लिए उत्सुक पीढ़ी अपने समय के लेखकों के पास जाती है और यह सवाल पूछती है कि परिवर्तन के साथ साहित्य के मापदंड भी बदलते हैं या नहीं ? बदलते हैं, तो आज साहित्य की कोई प्रतिनिधि या लगभग आदर्श परिभाषा उसके पास होनी चाहिये ।

 

हमारे अग्रज आखिरकार हमें फिर संस्कृत आचार्यो की साहित्य के बारे में दी गई मान्यताओं के पास ले जाते हैं जहां पर कोई शब्द को काव्य कहते हैं, कोई अर्थ को और कोई आनंद देने वाली कृति को । जब अपने समय के लेखकों की मान्यताओं का वह परीक्षण करती है तो पाती है कि स्थिति बहुत आगे नहीं है । जैसे संस्कृत आचार्य एक छोर पकड़कर कह रहे थे, प्रकारान्तर से चालाकी से ये भी वही कह रहे हैं । पूरा सच कोई भी नहीं बता पा रहा है । सब आपस में टकरा रहे हैं । भटकन यहीं से शुरू होती है और उत्सुक पीढ़ी पाश्चात्य शास्त्र अध्ययन की ओर उन्मुख होती है ।

 

वहाँ उसे पता चलता है कि जो कुछ अंश तक उन्हें परोसा गया उसमें आधा संस्कृत आचार्य का और आधा पाश्चात्य से उधार लिया हुआ था । पाश्चात्य शास्त्र भी उसे पूरा सच नहीं बता पाते । वहां कोई कला, कला के लिए या कला जीवन के लिए जैसे द्वन्द्व में हैं । अपने देश, काल के संदर्भ में साहित्य के प्रसंग में उसकी समस्या का मौलिक समाधान उसे नहीं मिल पाता । इस स्थिति  का जानकार होने के बाद उसे लगने लगता है कि जैसे हमारे अग्रज कभी कला, सौंदर्य, आधुनिकता, वैज्ञानिकता, प्रकृति, ईश्वर, प्रगतिशीलता, भौतिकता में से किसी एक को पकड़कर जीवन की अभिव्यक्ति का कमाल करते रहे हैं, तो किसी एक को उन्हें भी अब पकड़ लेना चाहिए । शायद इसी से साहित्य का सच सामने आ जाए । अंततः एक स्थिति में यह पीढ़ी भी किश्त-दर-किश्त उसी जड़ता की गुहा में प्रविष्ट करती हुई एक  समय पर साहित्य की एकांगी प्रवक्ता हो जाती है ।

 

     आखिर पूरा सच क्या है ? इस सच को कौन रचता है ? इसकी परिधि क्या है, आयाम क्या है ? इस प्रश्न का समुचित उत्तर जाने बिना न तो साहित्य का सच प्रकट होता है, न साहित्य की आलोचना का । विद्वानों से क्षमा सहित मुझे यह कहना है कि उत्सुकजनों के सामने साहित्य के नाम पर पहले पाठ्यक्रम आते हैं फिर आता है बाज़ार ! जो कुछ हासिल होता है उसमें एक तो चिकने पृष्ठों पर सस्ती फिसलन भरी कृतियां जो मनोरंजन करती हैं, मनोरंजन साहित्य की एकक विशेषता हो सकती है लेकिन सिर्फ मनोरंजन साहित्य की एक विशेषता हो सकती है लेकिन सिर्फ मनोरंजन साहित्य नहीं हो सकता । इसके सर्वाधिक पाठक मिलते हैं, यानी सिर्फ पाठक संख्या भी साहित्य की कसौटी नहीं हो सकती । इससे ऊबा हुआ वर्ग उन लेखकों की किताबों के पास पहुंचता है, जो शिष्ट ढंग से आनंदित करती हैं, एक तरह से उनमें पाठक का मन रमता है लेकिन सिर्फ तात्कालिक आनंद के उसमें स्थायी उपलब्धि नहीं होती ।

 

क्या कोरा आनंद साहित्य है ? पाठक फिर यथास्थिति के वर्णन वाली पत्रकारिता की विधा के आसपास लिखी किताबें ढूंढ़ता है, लेकिन यहाँ सिर्फ यथास्थिति का वर्णन मिलता है और सिर्फ यथास्थिति का रूप भी साहित्य नही है। चिंतन और विचार की तलाश में पाठक कुछ भारी किताबें उठाता है और उसमें सिर्फ एक खास विचार का प्रतिपादन दृष्टिगोचर होता है । इन सबमें किसी में भाषा का किसी में कथ्य का और किसी में शिल्प का प्रभाव मिलता है ।

 

     मित्रों, इतनी लंबी यात्रा में एक जिंदगी कम पड़ती है । थका हुआ पाठक तब भी यह निष्कर्ष नहीं निकाल पाता कि साहित्य क्या है ? क्या मनोरंजन, आनंद, यथास्थिति चित्रण, विचार या भाषा, कथ्य, शिल्प में से किसी एक की उपस्थिति भी साहित्य हो सकता है ? क्या जीवन को सिर्फ मनुष्य के संदर्भ में ही स्वीकार किया जाएगा ? यहीं से साहित्य में दार्शनिक जिज्ञासाओं का जन्म होता है और किसी विचार को जन्म लेने में एक शताब्दी भी कम पड़ जाती है । तो मित्रों, जब मनुष्य अपने में पूर्ण नहीं है तो साहित्य कैसे पूर्णता को प्राप्त कर सकता है लेकिन लगभग आदर्श या प्रतिनिधि मान्यता का अभाव मौलिक चिन्तन की दरिद्रता का परिचायक है।

 

साहित्य के विधायक त्तवों की अनुपस्थिति वाला तथाकथित साहित्य दीर्घकालीन नहीं हो सकता । यदि साहित्य में विचार आवश्यक है तो उसकी एक लय भी जरूरी है जिसमें उसे गुना-बूना जा सके । त्याज्य का यदि खंडन आवश्यक है तो मंडित योग्य का तर्क भी आवश्यक है । न तो सिर्फ विद्रोह और न ही अंधभावुकता की अभिव्यिक्ति साहित्य है । साहित्य में जो सहित का भाव है वह संवेदन, अनुभूति अनुभव से गुजरकर समष्टि के धरातल पर अभिव्यक्त होकर सम्प्रेषित होने पर ही सार्थकता पाता है। कोरी शब्द क्रीड़ा, अर्थ विलासिता मात्र भावुक विद्रोह है । जिसका संसार जितना छोटा होगा उसका साहित्य उससे बड़ा भला कैसे होगा।

 

क्रमशः

 

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