सृजनगाथा  

रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

 

Text Box: इस अंक के रचनाकार - प्रभाकर श्रोत्रिय  विजय कुमार देव

 

 

E-mail:Srijangatha@gmail.com

अंक-2. जुलाई 2006

 

 

 

 

संस्कार

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

   

 

 

 

 

कविता का कथ्यः अंतदृष्टि और जगत-दृष्टि

*प्रभाकर श्रोत्रिय

       

        मनुष्य की मुक्ति के लिए संघर्ष करने वाली कविता को आप जंजीरों में पकड़ दे- तो वह कविता कैसे रह सकती है । आप उससे क्या हासिल कर सकेंगे ? सामान्यतः भी व्यक्ति को जो कहना है अगर उस पर दबाब डालकर वही बात कहलाई जाए तो उतनी दृढता और अभिमान से नहीं कह पाएगा । फिर, कविता तो संवेगों की दुनिया का नाज़ुक मामला है । वह अंतःप्रेरणा से लिखी जाती है, दबाब से नहीं । दबाव से तो कविता महज़ औपचारिकता में ब्दील हो जाती है । यहाँ तक कि अगर कवियों की कोई पीढ़ी की पीढ़ी स्वयं काव्य-रीति या बाह्य अनुशासन की गिरफ्त में आ जाती है तो कथ्य और शिल्प दोनों में आवृतियाँ होने लगती है । और कविता का मौलिक तेज, आंतरिक संपन्नता और काव्य-गुण उससे छुटने लगते हैं । हिन्दी की रीति कविता के साथ ही नहीं, प्रगतिशील कविता और उन तमाम कविताओं के साथ यह गुज़र चुका है वह वाद-बध्द होकर लिखी गई हैं । प्रतिरोध तो कविता का स्वभाव ही है । इसलिए ऊर्जस्वित कविता न सिर्फ व्यवस्था से विद्रोह करती है बल्कि वह दबाव से विद्रोह भी करती है, फिर यह दबाव विचारों का हो या वादों का ।

 

      कविता अपने ढंग से आंतरिक परिवर्तन का एक अस्त्र भी है, अतः हर समय कवितास्त्र का होना ज़रूरी है, क्योंकि कोई भी परिवर्तन अंततः परिवर्तन विरोधी हो जाता है और नये सिरे से परिवर्तन की ज़रूरत आ पड़ती है । इसलिए परिवर्तन की अदम्य आकांक्षा, विद्रोह और ऊर्जा कविता की गत्यात्मकता का नित्य लक्षण है । इसलिए वह उन चीज़ों से नहीं बंध सकती जो ऐसे व़क्त उसे बेड़ियाँ पहनाएं और उसके काव्य-विवेक को अपने तात्कालिक निहित आशयों से प्रभावित करें । वह उन तमाम चीज़ों को काट कर फेंक देना चाहता है जो उसके मनुष्याभिमुख संसार की रचना में बाधक हैं- फिर भले ही वह आदर्श हो या प्रकाश-

 

तो मैं तुम्हें फिर यह खंजर देता हूँ

मुझे नहीं उस प्रकाश को ही काट कर निकाल दो

जो तुम्हारे चारों ओर लिपटा मर गया है

(विजयदेवनारायण शाही, मछलीघर, पृष्ठ 17)

 

 

            परन्तु यथार्थ कवि के लिए एकायामी नहीं होता । अगर कविता जीवन से समग्र साक्षात्कार करती है तो वह पाती है कि संसार वैविध्य बिखरा है । यथार्थ जगत में असंख्य रूप, संबंध, अभिप्राय, प्रेरणा व्याप्त है । आधुनिक कविता को इस वैविध्य की ज़रूरत किसी वायवीय संसार के लिए नहीं, वास्तविक दुनिया के लिए है । मुक्तिबोध ने लिखा हैः

 

      आजकल हम ऐसे कवियों की ज़रूरत महसूस होती है जो मानवीय जीवन की एकता के साथ ही, उसके वैविध्य से भी अत्यंत निकटता से परिचित हों, जो वैविध्य को हवा में उड़ाकर अरूप आकाश में मुक्त न फिरें, किंतु वैविध्य के संघर्षात्मक संसर्ग से उत्पन्न मानवीय मनोभावों की उत्कटता में अपने को लीन करते हुए उसी एकता के दर्शन करावें, अर्थात् वह मानवता के अधिक निकट रहें ।

 

         मुक्तिबोध का सुझाव सृजनात्मक और मानवीय मनोभावों दोनों दृष्टियों से बहुत महत्व का है । जीवन की अत्यंत निकटता और मानवीय मनोभावों की उत्कटता को जब तक रचनाकार आत्मसात नहीं कर पाता, वह जीवन के संघर्षपूर्ण वैविध्य से अछूता ही रह जाता है । जिस समाज की हम बात करते हैं- वह दरअसल असंख्य समस्याओं का पुंज है । मनुष्य का मन क्या अनेक ग्रंथियों, मनस्तापों, किस्म-किस्म के अनुभवों संवेदनों, का समुद्र नहीं है ? विकल्प, संशय, उद्वेग, कुंठा, मनस्ताप, रिक्तता, आत्म-द्वंद्व, आस्था, आग्रह, आशंका, करुणा, प्रेम, क्षोभ, प्रतिरोध, मोह, दैन्य जैसे असंख्य शेड्स मन के हैं और हरएक में अनेक कथ्य और स्थितियाँ छिपी हैं । इसके अलावा मनुष्य का व्यक्तिगत और आध्यात्मिक संसार है; प्रकृति है,प्राणि-जगत है, अनुभव और ज्ञान का अनंत फैलाव है । गर्ज़ यह कि कथ्य अपरिमित हैं, उनका अन्वेषण और रचना कलाकार के लिए कभी समाप्त न होने वाला प्रकरण है । रचनाकार अपनी दृष्टि से वैविध्य को अन्वित करता है और उसे दिशा देता है, और यह दिशा तभी प्रामाणिक कही जा सकती है जबकि हमें मनुष्यता के करीब ले जाए ।

 

      अगर अनुभव और उसके प्रत्यंकन के स्तर पर कवि में नया उन्मेष और ऊर्जा हो तो कविता बाहर की ही नहीं भीतर की रूढ़ियाँ भी तोड़ती है । प्रतिभाशाली कवि स्वयं अपने को ही छकाते हुए कई बार खुद के बाहर आ खड़ा होता है । यह मात्र बदलाव नहीं, सतत विकास की प्रक्रिया है । हमारे अपने युग में ही कई तरह के वैचारिक और व्यवहारिक द्वंद्वों में उलझते हुए कविता ने अपना सफ़र तय किया है और अनुभव तथा संरचना के स्तर पर लगातार परिपक्व होने का प्रमाण दिया है ।

 

क्रमशः

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