सृजनगाथा  

रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

 

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अंक-2. जुलाई 2006

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

  

        

         पठनीय

        

         किताब

 

सब बोले दिन निकला

बाल साहित्य बच्चों के उन अंकुरों को पुष्ट करता है जो बड़े होकर उन्हें जीवन के सत्य को पहचानने में सहायता करते हैं । शैशवावस्था में बालक अपने चारों ओर की वस्तुओं का परिचय प्राप्त करने के लिए अपनी कर्मेन्द्रियों तथा ज्ञानेन्द्रियों का उपयोग करने एवं अपने मन के भावों को अभिव्यक्त करने के लिए भाषा सीखते हैं । शैशवावस्था पार करते ही उनकी रूचि तथा ज्ञान का स्वतः विकास होने लगता है । बच्चे बाह्य वातावरण में रूचि लेने लगते हैं और उनके प्रति मन में उठने वाले कौतूहल को शान्त करने का माध्यम खोजते हैं । उन्हें अदभुत प्राणियों, विचित्र परिस्थितियों तथा चकित कर देने वाली क्रियाओं की कल्पना में विशेष आनन्द मिलता है । इस अवस्था में बच्चे बाहरी जगत की ओर आकृष्ट होते हैं । वे जिन वस्तुओं को देखते हैं और व्यवहार में लाते हैं उनका रहस्य जानने के लिए उत्सुक रहते हैं । वे अपने ही बारे में जानकर संतुष्ट नहीं होते बल्कि दूसरों के जीवन में अनुभूतमय आश्चर्य, आशाओं तथा वेदनाओं को भी जाने का अनुभव करने का प्रयत्न करते हैं । उनके हाथों में जो चीज होती है, वे उसे अच्छी तरह देखभाल कर उसके बारे में अच्छी तरह जानकारी प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं ।

चूँकि स्कूलों में बच्चों को नियमों में आबद्ध सीमित वातावरण मिलता है, जबकि घर में मुक्त तथा व्यापक वातावरण होता है। बच्चों की कल्पना शक्ति वास्तव में ही मुक्त एवं व्यापक वातावरण में ही विकसित होती है । बाल साहित्य ज्ञान के असीम भण्डार को बच्चों के समक्ष प्रस्तुत करता है और बच्चे उसमें से अपनी इच्छानुसार अपनी जिज्ञासाओं तथा ज्ञान की तुष्टि के लिए ग्रहण कर लेते हैं। उनकी विकसित कल्पना ही भविष्यके अनेक बाल सुलभ सपनों को साकार बनाती हैं।

 

श्री जयप्रकाश मानस की बाल कवितायें उनके काव्य संग्रह सब बोले दिन निकला में भारतीय परिवेश में जन्मी बच्चों के आसपास के संसार को परिलक्षित करती हैं, जिनमें सदाचार की सीख राष्ट्रीयता की भावनायें, मनोरंजन, कल्पना की व्यापकता तथा कौतुहल स्पष्टतः दीख पड़ते हैं । स्कूल हर दिन जाओ, हो खुशहाल लोग सभी, वर्षारानी, सूरज गर्मी के दिन, आम का पौधा, शहीद महान बनूँगा, ऐसी रचनायें हैं जो बाल साहित्य की सभी विशेषताओं का प्रतिनिधित्व करती हैं । बच्चों के लिए आसपास बिखरी सभी सामग्री जैसे तारे, चन्दा, फूल, हवा, कमल, चिड़िया, भौंरे, सूरज, गुड़िया, तितली, फिसलपट्टी, स्कूल, रोटी, चटनी, छुक-छुक गाड़ी, दादी माँ, दादाजी, चूहे, बिल्ली, कौवा, गौरैया, वर्षा, नीलकंठ, जुगनूँ, उल्लू, छाता, गुरुजू, समोसे,चाय, मुर्गी, जाड़ा, धूप, नींद, लोरी, नदियाँ, जंगल,पहाड़, किसान,तरकारी, अनार, पुलिस, माँ, गाँव, ताल तलैया, नानी, आम, पौधा इत्यादि संकलन में सिमटी हैं जिनके साथ सुन्दर चित्रों का आकर्षण बच्चों के लिए मनमोहक है।

 

मानस जी की शैली जहाँ आकर्षक है, वहीं उनकी भाषा सरल तथा सरस है तथा सांकेतिक भी । सहज तथा सरस शब्दों का प्रयोग करते हुए रचनाओं में बिम्बों को उकेरा गया है जो उनकी रचनाओं को पठनीय बनाते हैं । सभी रचनाओं का शिल्प सहज तथा चारूता से पूर्ण है । छंद सौन्दर्य तथा भाषा बच्चों की रूचि के अनुकूल है जो चित्रात्मक है तथा प्रभावपूर्ण भी । रचनाओं में स्मरमीयता के गुण को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता ।

 

कुल मिलाकर मानस जी का काव्यसंग्रह बाल साहित्य के लम्बे मार्ग में एक मील का पत्थर कहा जा सकता है । उनकी रचना यात्रा की उम्र लम्बी हो यही शुभकामना करता हूँ ।

 

हरिप्रकाश वत्स

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

बचपन

इस अंक में- 

माह के बालकवि- चंपा मावले  

लोककथा- सिन्धु रथ

कविता - हेमंत कुमार चावड़ा

विनोद-प्रसंग- प.महावीर प्रसाद द्विवेदी

पठनीय किताब- हरिप्रकाश वत्स