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अंक-2. जुलाई 2006
सृजनगाथा
रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन
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डॉ.
तृषा शर्मा
भारतीय परंपरा में
आभूषणों की पहचान विश्व में सबसे अलग हटकर है क्योंकि आभूषणों की विशाल परंपरा
विश्व में सबसे अधिक भारत में ही है। राजा- महाराजाओं के इस देश में करोड़ों से
लेकर एक रुपये तक के आभूषण प्रचलन में थे और आज भी हैं। भारतीय परंपरा में नारी
के सौंदर्य की अप्रतिम अनुभूति के प्रतीक आभूषण भारत के गाँवों की भी पहचान
हैं। छत्तीसगढ़ का सौम्य ग्रामीण भारत के गाँवों की भी पहचान हैं। छत्तीसगढ़ का
सौम्य ग्रामीण अंचल इससे अछूता नहीं है और अपनी सामर्थ्य के अनुसार परंपरा को
जीवित रखने की कोशिश अंतिम पंक्ति के मानव में भी जारी है। छत्तीसगढ़ के
ग्रामीण अंचल के पारंपरिक आभूषण आकर्षक और कलात्मक हैं, जो इस अंचल की नारी को
सौम्य तथा सुंदर भी बनाते हैं । देश-विदेश में विख्यात छत्तीसगढ़ की लोककला और
आदिवासी परंपरा का ये पारंपरिक आभूषण श्रृंगार करते हैं ।
छत्तीसगढ़ की ग्रामीण महिलाएँ सुता, पुतरी, गोप, करधन, साँटी, बिझिया, बाजूबंद, फुल्ली, लटकन, मुंदरी, चूड़ी-कंगन आदि आभूषणों से सज्जित रहकर यहाँ की संस्कृति को महिमामंडित करती हैं । आदिवासी बस्तर-सरगुजा क्षेत्र में भी आभूषणों की परंपरा है और इसमें से अनेक आभूषण वहाँ भी प्रचलित हैं । डालडा चाँदी से बने आभूषण ग्रामीण अंचलों में विख्यात हैं ।
छत्तीसगढ़ के पारंपरिक आभूषणों की शुरुआत ‘शीशफूल’ से होती है । शीशफूल मांग के दोनों ओर माथे में चैन की तरह पहना जाता है और उसके बीच में लाँकेट रहता है । लाँकेट का घुँघरू माथे पर झूलते रहता है । ‘पटिया’ भी सिर का ही आभूषण है । कानों पर भी एक से एक आभूषण पहने जाते रहे हैं । ‘फूलसकंरी’ रायगढ़ क्षेत्र का विशेष आभूषण है । यह झुमके जैसा होता है और झुमके से जुड़ी हुई तीन फूल की डिजाइन होती है । फूल के बीच में लाल रंग का पत्थर भी जड़ा रहता है । इसके चैन को कान मे लपेट कर पहना जाता है । यह आभूषण नारी सौंदर्य को निखारता है । इसी तरह ‘खिनवा’ भी एक पारंपरिक आभूषण है जो सोने के टाप्स की तरह डिजाइन लिए हुए होता है । इसे ‘खूँटी’ भी कहते हैं । बाले की तरह कान में पहनने का एक आभूषण ‘ऐरिंग’ भी है । ‘झूमका’ सदाबहार आभूषण है जो देश के अन्य भागों की तरह छत्तीसगढ़ में भी लोकप्रिय है ।
गले के आभूषण नारी सौंदर्य की सबसे बहुमल्य रत्न हैं । छत्तीसगढ़ में गले के हार के रूप में ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में ‘ रूपिया’ पहनने का प्रचलन है । ‘रूपिया’ सिक्के के ही डिजाइन का होता है इसे अपनी-अपनी क्षमता के हिसाब से सोने, चांदी का बनाकर काले-धागे में पिरोकर पहना जाता है । ‘पुतरी’ भी एक इसी तरह का आभूषण है । ‘गोप’ सबसे प्रचलित आभूषण है जो मोटे और कई परत लिए हुए चैन की तरह होता है और इसमें लाकेट भी लगा होता है । ‘कंठा’, ’गजमल’, ‘चारफोकला’, ‘तिलरी’ ‘कटवा’ आदि आभूषण हैं । ‘सुता’ भी एक महत्वपूर्ण आभूषण है । ‘काँटी’ भी गले में पहने जाने वाला स्वर्ण आभूषण है । ‘सुंर्रा’भी गले का आभूषण है । बच्चों के गले में पहनाया जाने वाला छत्तीसगढ़ का एक महत्वपूर्ण आभूषण ‘बजरबट्टू’ भी है। यहाँ नाकों में ‘नथनी’ और ‘ढार’ पहनने की प्रथा भी थी । नाक में सामान्यतः ‘फुल्ली’ पहना जाता है जो सोने का होता है ।
हाथों के अनेक आभूषण भी आकर्षित करते हैं । ‘अँगूठी’ का प्रचलन यहाँ भी है लेकिन इसे ‘मुँदरी’ कहा जाता है । कलाई का एक काँटेदार गहने का प्रचलन है जिसे ‘बनुरिया’ कहा जाता है । ‘कड़ा’ हाथों में पहना जाता है जो सामान्यतः कड़ा रहता है । यह बीच से कटा रहता है और इसे फैलाकर पहना जाता है तथा पुनः दबाकर गोल कर दिया जाता है । ‘बहूँटी’ बाजूबंद जैसा आभूषण है जो चाँदी का बना हुआ होता है । इसे बाँये हाथ के बाजू पर पहना जाता है। ‘देवरइहा –परछइहा’ एक ऐसा आभूषण है जिसे अलग-अलग हाथों की अँगुलियों में पहना जाता है। पाँचों अँगुलियों के लिए अलग-अलग अँगूठी होती है और सभी का अलग-अलग नाम रहता है । हाथों पर ‘नांगोरी’ भी पहना जाता था जो साँप की डिजाइन लिए रहता है । ‘पौंची’ भी बाँहों में पहनने का एक आभूषण है ।‘ककनी’ कंगन जैसा रहता है जिसे चूड़ियों के आगे-पीछे पहना जाता है । विधवा स्त्री ‘पटा’ पहनती हैं, जो चाँदी का होता है ।
‘करधन’ कमर पर पहने जाना वाला एक महत्वपूर्ण आभूषण है जो अन्य प्रांतों की तरह यहाँ भी शौक से पहना जाता है । इसे ‘कमरपट्टा’ भी कहा जाता है । यह चाँदी का बना हुआ होता है और पुराने समय में यह बहुत वजन वाला होता था । पैर और हाथ में कड़ा जैसे ‘चुरवा’ पहनने का भी प्रचलन था । ‘कटहर’ एक ऐसा आभूषण है जो पैरों पर पहना जाता है । यह गोल और अंदर से पोला रहता है तथा इसमें घुँघरू लगा रहता है जो चलने से बजता है । ‘चुटकी’ भी एक बिछिया जैसा एक आभूषण है जिसे पैरों की अँगुलियों में पहना जाता है । ‘पैरी’ जालीदार पायल जैसी बनावट वाला आभूषण है लेकिन यह लचीला नही होता है । ‘तोड़ा’ कटहर जैसा ही रहता है परंतु एक जगह से कटा हुआ होता है बीच में कील लगी रहती है । ‘जेहर’ दो या तीन लड़ वाला होता है जिसमें चारों तरफ घुँघरू लगे रहते है । ‘साँटी’ लोकप्रिय आभूषण है जिसे पैरों में पहना जाता है यह चोटी जैसा गूँथा रहता है । ‘लच्छा’ चाँदी का गोल कड़ा जैसा रहता है इसे पहनने के लिए चपटा कर देते है और पहनने के बाद इसे पुनः गोल कर देते है । रस्सी की ऐंठन जैसी इसकी डिजाइन रहती है ।
आदिवासी बस्तर और सरगुजा में आदिवासी संस्कृति और परंपरा ने भी अनेक आभूषणों की श्रृंखला दी है उनमें आज भी बस्तर के कन्याएँ सिर पर कौड़ी और चाँदी के लरों से सुसज्जित गहने पहन कर अपनी परंपरा को सुरक्षित रखी हुई हैं । लोक कलाकार और नर्तक आभूषणों की वैभवशाली परंपरा को साक्षी बनाए हुए हैं । अंतर्राष्ट्रीय लोक गायिका पद्मश्री एवं पद्मभूषण तीजनबाई पंडवानी गाती हुई जब सुता पहने रहती है तो उसकी आभा अलग ही दिखाई देती है । इसी तरह नाचा –गम्मत के कलाकार और राऊत नाचा में कौड़ियों के पुरुष-आभूषण अलग ही छटा बिखरते हैं ।
छत्तीसगढ़ में आकर्षक और सुंदर आभूषणों की परंपरा महापाषाणकाल से प्रचलित थी । प्राचीन काल में ‘हँसुली’ का प्रचलन देश के विभिन्न हिस्सों में था लेकिन छत्तीसगढ़ में हँसुली आभूषणों में शिरोमणि है । लोकगीतों में भी इसका उल्लेख मिलता है । छत्तीसगढ़ की पुरातात्विक मूर्तियों में अनेक आभूषणों में से ‘हँसुली’ उत्कीर्ण है । छत्तीसगढ़ के आर्थिक विकास एवं सामाजिक प्रथा की समृद्धि के प्रतीक यहाँ के आभूषण आज भी प्रचलित हैं ।
आभूषण की सफाई के लिए ब्रश का प्रयोग भी होता है जिसे ‘गजरी’ कहा जाता है । केयूर आभूषण तो यहाँ की प्राचीन विशेषता है । सिरपुर के भग्नवशेषों में केयूरों का बाहुल्य है । सिरपुर से प्राप्त तारा देवी की प्राचीन प्रतिमा आभूषणों के वैभव का उदाहरण है । प्रतिमा के हाथ में अंगुष्ठ और कनिष्ठा में आकर्षक अंगुठी है, दोनों हाथों में दो-दो कंकण और बाजूबंद हैं, गले में हँसुली और माला है, केशकला के साथ आवली में आभूषण हैं । कर्ण में कुण्डल, वक्षस्थल पर चोली है जो आभूषणों से जड़ित थे । ककराभाट, लीलर और बस्तर के अनेक स्थानों पर पुरातत्ववेत्ताओं द्वारा किए गए सर्वेक्षणों में भी महापाषाणकाल के अनेक आभूषणों के अवशेष प्राप्त हुए हैं जो छत्तीसगढ़ में आदिकाल से आभूषणों की समृद्ध परंपरा के प्रमाण हैं ।
सोरर में पत्थरों के आभूषणों के अवशेष तथा महंत घासीदास संग्रहालय में रखी दुर्लभ मूर्तियों में छत्तीसगढ़ में आभूषणों की परंपरा का वैभव दिखाई देता है । मल्हार संग्रहालय में संरक्षित पद्मावती की प्रतिमा आभूषणों के अंकन से सुसज्जित है । जैन और बौद्ध धर्म से संबंधित अनेक प्रतिमाओं में आभूषणों की आभा दिखाई देती हैं । बस्तर की विष्णु एवं देवी प्रतिमाओं में उकेरे गए आभूषण कंठहार, मुकुट, भुजबंध और अनेक आभूषणों का अंकन छत्तीसगढ़ में गौरवशाली परंपरा को प्रदर्शित करते हैं ।
आधुनिक आभूषणों की चकाचौंध ने अब राज्य के शहरों और बड़े कस्बों में परंपरागत आभूषणों की ख्याति को कम कर दिया है लेकिन पहले की तरह गाँवों में आज भी इनमें से अधिकतर आभूषण अपनी चमक बनाए हुए हैं और संस्कृति तथा परंपरा के संरक्षण के लिए मँहगे आभूषणों से अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं । ये आभूषण छत्तीसगढ़ और आदिवासी बस्तर की पहचान हैं, ये संग्रहालयों की मोहताज़ नहीं, इसे प्रचलन की परंपरा का सुख चाहिए ।

