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अंक-2. जुलाई,2006
सृजनगाथा
रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन
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लघुकथा
योगेन्द्र नाथ शुक्ल
दोनों सैनिक द्वार पर पहरा देते हुए बार बार किले के ऊपर लगे ध्वज की ओर देख लेते थे । कुछ घंटे पहले ही उस ध्वज को बदला गया था ।
“पुरूगढ़ का सारा राजपाट ही बदल गया... नए राजा आ गए । हमारी मातृभूमि पर दुश्मनों का कब्जा हो गया । काश ! हमारा हौसला पस्त नहीं हुआ होता और हम उनसे युद्ध लड़ लेते ! मेरा मन बोलता है कि हम उन्हें परास्त कर सकते थे ।”
दूसरे ने जवाब दिया - “तुम सच कह रहे हो... हथियार डालने की सलाह हम दोनों ने ही सेनापति को दी थी । मित्र ! हम इतिहास का वह काला पन्ना बन गए हैं जिसे पढ़कर दूसरी जातियाँ, यह कहकर हमारा मजाक उड़ाएंगी कि वे डरपोक लोग थे, जो अपनी मातृभूमि की रक्षा नहीं कर पाए ।”
दोनों की आँखें चार हुईं । दूसरे ही क्षण वे लहूलुहान होकर जमीन पर गिर पड़े । दोनों की तलवारें एक-दूसरे के पेट में घुस चुकी थीं ।
आलोक कुमार सातपुते
वह विलाप करता हुआ जा रहा था कि ईश्वर ने उसके साथ बड़ा ही अन्याय किया । दुर्भाग्य सदा ही उसके पीछे पड़ा रहता है, तभी एक धन्ना सेठ के घर से एक व्यक्ति बाहर निकला और उससे कहा – “मैंने कई बार तुम्हारे घर के चक्कर लगाए, पर तुमने अपने अंतस में ताला जड़ रखा था । खैर अब बताओ कि मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकता हूँ ।” इस पर उसने कहा – “अरे जाओ भाई अपना रास्ता नापो...। मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो...।” इतना सुनकर वह व्यक्ति आगे बढ़ गया, तभी उसने जिज्ञासावश सेठ के घर जाकर उससे पूछा कि अभी अभी आपके घर से जो व्यक्ति निकला, वह कौन था ?
“वह अवसर था ।” सेठ ने जवाब दिया ।
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एक/ घाव
एक मजदूर एक दिन पेड़ से गिर गया । वह चोट खाकर उस पेड़ नीचे बैठा कराह रहा था । उसके घुटनों तथा कुहनियों से खून बह रहा था ।
उधर से एक क्लर्क गुजरा । आज उसने पहली बार सौ रुपये की रिश्वत खाई थी । वह घर लौट रहा था । उस दिन उसकी आत्मा से लगातार खून बह रहा था ।
पेड़ से गिरे, उस मजदूर को देखकर उस क्लर्क के मन में सहानुभूमि पैदा हुई । उसे लगा कि यह मुझसे अच्छा है । यह तो पेड़ से ही गिरा है । मैं तो अपनी नजरों से गिर गया हूँ । उसकी चोट से मेरी चोट ज्यादा गहरी है ।
क्लर्क ने बहुत आग्रह करके उसे अपना भाई कहकर वे रुपये उस मजदूर को दिए ताकि वह अस्पताल जाकर इलाज करा आए ।
पेड़ से गिरे मजदूर के लिए मरहम-पट्टी कराना जरूरी नहीं था । जरूरी था आटा दाल लाना, उसने सौ रुपये आटा-दाल में खर्च कर दिए ।
उसकी चोट ठीक हो गई । वह फिर से पेड़ पर चढ़ने लगा ।
क्लर्क ने मगर उस रास्ते से गुजरना बन्द कर दिया था ।
दो/ खूनी कार
मेरे पास एक कार थी । उसकी खूबी यह थी कि वह पेट्रोल की बजाय आदमी के ताजे खून से चलती थी । वह हवाई जहाज की गति से चलती थी और मैं जहाँ चाहूँ, वहाँ पहुँचाती थी, इसलिए में उसे पसंद भी खूब करता था, उसे छोड़ने का इरादा नहीं रखता था ।
सवाल यह था कि उसके लिए रोज-रोज आदमी का खून कहाँ से लाऊँ ? एक ही तरीका था कि रोज दुर्घटना में लोगों मारूँ और उनके खून से कार की टंकी भरूँ ।
मैंने सरकार को अपनी कार की विशेषताएं बताते हुए एक प्रार्थनापत्र दिया और और निवेदन किया कि मुझे प्रतिदिन सड़क दुर्घटना में एक आदमी को मारने की इजाजत दी जाए ।
सरकार की ओर से पत्र प्राप्त हुआ कि उसे मेरी प्रार्थना इस शर्त के साथ स्वीकार है कि कार को विदेशी सहयोग से देश में बनाने पर मुझे आपत्ति नहीं होगी ।
तीन/ फाइल और कीड़े
उन्हें फाइलें चलाने का बहुत शौक था । जब तक फाइल का वज़न उनके बज़न से ज्यादा नहीं हो जाता था, वे फाइल चलाते ही रहते थे ।
एक दिन दफ़्तर में एक कीड़े ने उन्हें काट लिया । उन्होंने कीड़े का तो कुछ नहीं बिगाड़ा मगर उसके बारे में फाइल चला दी । वह फाइल चलती रही, कीड़े की तीस-चालीस पीढ़ियाँ इस बीच निबट गई । धीरे-धीरे उस फाइल ने एक कीड़े का रूप धारण कर लिया और उन्हें ऐसा काटा कि वे फाइल चलाना भूलकर उस कीड़े को मारने दौड़े, मगर वह कीड़ा तो अजर-अमर था !
चार/ जीवनगाथा
मैं बहुत खाता था । बहुत खाने से बहुत से रोग हो जाते हैं इसलिए सुबह और शाम दौड़ा करता था । बहुत दौड़ने से बहुत थक जाता था इसलिए बहुत सोता था । बहुत सोने से स्वास्थ्य बहुत अच्छा रहता है इसलिए कमाने का काम में अपने मजदूरों और क्लर्कों पर छोड़ दिया करता था ।
और इस तरह एक दिन मैं मर गया । मुझे पता ही नहीं चला कि मैं कब मरा ।
पाँच/ एक कौए की मौत
एक कौआ प्यास से बेहाल था । वह उड़ते-उड़ते थक गया मगर कहीँ पानी न मिला । आखिर में उसे एक घड़ा दिखा । उसमें चुल्लू भर पानी था । कौआ खुश हो गया । उसने सोचा कि कंकड़ डालने वाली पुरानी पद्धति अपनाऊँगा, तो पानी ऊपर आ जाएगा, और मै पी लूँगा ।
कौए के दुर्भाग्य से वह महानगर था, वहाँ कंकड़ नहीं थे ।
कौआ मर गया और पानी भाप बनकर उड़ गया ।
विष्णु नागर




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