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अंक-2. जुलाई 2006
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रचना का प्रेरक तत्व मनुष्य और प्रकृति के बीच समाया सौंदर्य
(डा. श्यामसुंदर दुबे से जयप्रकाश मानस की बातचीत)
-ललित निबंधों के मूल विषयों में लोक भी है । फिर ललित निबंधकारों के यहाँ व्यंग्य को लेकर कोई परहेज भी नहीं, ऐसे में क्या लोक-यथार्थ को व्यंग्य विधा में अभिव्यक्त करने वाले य़था- परसाई, शरद जोशी आदि की रचनाओं को ललित निबंधों की परिधि में नहीं समेटा जा सकता है ?
0 व्यंग्य विधा को ललित निबंध में समेट लेने पर व्यंग्यकार क्या करेंगे ? वे अभी अपनी स्वतंत्र इयत्ता के लिए जद्दोजहद कर रहें हैं । वे ललित निबंध में आना ही नहीं चाहेंगे । हाँ, ललित निबंधकार अपनी सीमाओं में उन्हें खोल सकता है । किन्तु व्यंग्य ललित निबंध में एकदम खुला हुआ नहीं है । व्यंग्य सपाट भी होता है जो केवल अपने सर्वांग में व्यंग्य ही होता है । कभी-कभी अपनी निर्लज्जता में वह बखिया की जगह चमड़ी भी उधेड़ जाता है । असल व्यंग्य अपनी मारक शक्ति में क्रूर और अचूक होता है । वह केवल व्यंग्य होता है कुछ और नहीं । ललित निबंध इस तेवर में नहीं आ सकता है । इसलिए हरिशंकर परसाई और शरद जोशी में ललित के लक्षण मिल सकते हैं किन्तु वे ललित निबंधकार नहीं हो सकते हैं । उनकी शैली और कहन की सूक्ष्मता लेकर ललित निबंध बढ़े तो उसकी सामाजिक स्वीकृति बढ़ेगी । इस ज़मीन पर ललित निबंध अपनी रूढ़ि को भंग कर सकता है ।
-ललित निबंधकार की सामान्य रचना प्रक्रिया पर आपकी टिप्पणी क्या होगी ? इसमें हिन्दी समाज, उसकी संस्कृति, उसकी विकृति या नित बदलती दुनिया की क्या भूमिका होती है ? क्या इस रचना प्रक्रिया को हम श्यामसुंदर दुबे की रचना प्रक्रिया मान सकते हैं, या आपकी रचना प्रक्रिया कुछ भिन्न है ?
0 ललित निबंधकार की रचना प्रक्रिया उसकी जीवन शैली है । वह छद्म नहीं पाल सकता है । जैसा जीवन वैसा लेखन । इसका कारण यह है कि ललित निबंध स्व और पर का साझा आस्वादन है । न केवल साझा आस्वादन बल्कि स्व को बार-बार रीता करना भी है । अपने को जितना रीता करते जाओगे उतना ‘पर’ उमड़-उमड़कर आपके भीतर भरता जाएगा । जब यह छलकने लगे तब ललित निबंध होता है । यह आत्मव्यंजकता निरंतर अपने को पर से भरते जाने वाली है । ललित निबंध यदि विचार बनाकर पूर्ण तैयारी के आधार पर लिखा जाएगा तो वह विमर्श बन जाएगा । ललित निबंध में ध्रुव विषय होता है किन्तु यह इतना घुल जाता है कि वह अवांतर से भी झलक मारता रहता है । भाषा की लय में विषय का विलयन अपनी अभिव्यक्ति प्रणाली को पा लेना है । इसमें संस्कृति, विकृति और कृति सभी का इस तरह समावेश होता है कि उसके भीतर हम अपने समय-सत्य को पा सकें । इसीलिए ललित निबंध पलायन नहीं बल्कि समय का सामना है । बदलती दुनिया को ललित निबंध यदि नहीं दे पाया तो वह जीवंत कैसे रह सकेगा ? मेरी रचना प्रक्रिया भी यही है । कभी कोई घटना, चरित्र, विचार या भाव जब गहरा ताप देने लगता है तब व्यक्तित्व में जो रीतने का विस्फार होता है उसमें तमाम जहान के आवर्त-विवर्त उठने लगते हैं । यह आवर्त-विवर्त न जाने कितने संस्कारों के उफान होते हैं । स्वयं पता नहीं चलता, लेखनी की नोक पर वह भी आ जाता है जो शायद बुलाने पर भी न आता । अब चूँकि रचना प्रक्रिया नितांत निजी चीज है इसलिए दूसरों की क्या है? नहीं कह सकता । कमोवेश सबकी यही होती होगी । चूँकि मैं ललित निबंध के साथ और कई विधाओं में लिखता हूँ इसलिए मैं यह भी कह सकता हूँ कि रचना प्रक्रिया मेरे तईं विधागत कर्म ही है । लगभग सभी रचनाकर्म एक-सी ही यातना, एक-से ही आनंद से उपजते हैं ।
- समकालीन हिन्दी ललित निबंध का शिल्पगत एवं भावगत चरित्र कैसा है ? आप इन्हें किस दृष्टि से देखते हैं । ललित निबंध का इतिहास लेखन अभी शेष है । आप चरित्रगत विशेषताओं के आधार पर इन्हें कैसे विभाजित करना चाहेंगे ? कुछ महत्वपूर्ण संभावनाशील रचनाकारों के विषय में कहना चाहेंगे ?
0 समकालीन हिन्दी ललित निबंध का शिल्पगत और भावगत चरित्र बहुत अच्छा नहीं है । ललित निबंध को किसी भी रूप में आगे नहीं बढ़ाया जा रहा है । पुराने को भी साधा नहीं जा पा रहा है । कमजोर हाथों में ललित निबंध की लगाम है । मैं स्वयं अपने ललित निबंधों से असंतुष्ट हूँ । मैं ललित निबंध को डा. हजारी प्रसाद द्विवेदी, विद्यानिवास मिश्र और डा. कुबेरनाथ राय की गिरफ्त से निकालना चाहता हूँ । उसे इनकी गिरफ्त से निकलता देखना चाहता हूँ । किन्तु इनसे निकलना तो दूर रहा इन तक अनुकरण के आधार पर भी पहुँचना संभव नहीं लगता है । शिल्प के नाम पर लिजलिजे पदबन्धों और बासी भाषा के करतब ही अधिक हैं । मुझे तो रीतिकाल के उस कवि की पंक्ति याद आती है जिसने कविता करने वालों को उत्तेजित करते हुए कहा था कि कविता कुछ टोटकों के सहारे नहीं चलती है । ‘लोगन कवित्त कीबौ खेलि करि जान्यौ है ।’
क्रमशः...

सृजनगाथा
रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन
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