

सृजनगाथा
रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन
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खास लोगों से बातचीत के बहाने
रचना का प्रेरक तत्व मनुष्य और प्रकृति के बीच समाया सौंदर्य
(डा. श्यामसुंदर दुबे से जयप्रकाश मानस की बातचीत)
- आपकी रचनाधर्मिता का प्रेरक तत्व क्या है? ललित निबंध के साथ कई विडंबनाएँ रही हैं- अल्पसंख्यक पाठक, प्रकाशन हेतु पत्रिका संपादक का अपना पूर्वाग्रह, समीक्षकों एवं कतिपय महापुरुष साहित्यकारों की घनघोर उपेक्षा । इतनी सारी चुनौतियों के बावजूद आप ललित निबंध से कैसे जुड़े ?
0 मेरी रचना का प्रेरक तत्व मनुष्य और प्रकृति के बीच समाया वह सौंदर्य है, जिसमें अपनी संपूर्ण दुर्बलताओं में भी मनुष्य सुंदर लगता है । क्योंकि वह यह जानता है कि इन दुर्बलताओं से उसे कैसे मुक्त होना है । प्रकृति के आंतरिक सत्य को कैसे अन्वेषित करके अपने समूचे विकास के लिए उसे अंगीकार करना है, सृष्टि की संवेदना प्रणाली में मनुष्य की सत्यान्वेषी दृष्टि ने जो कुछ भी तलाशा है वह मुझे प्रेरणा देता है ।
ललित निबंध के पाठक जरूर सीमित संख्या में हैं, संपादकों और समीक्षकों के पूर्वाग्रह और उपेक्षाएँ भी इस विधा के लोकव्यापीकरण में बाधक तत्व हैं, फिर भई ललित निबंध लिखा जा रहा है । इधर ललित निबंध के लेखकों की संख्या बढ़ी है । यह विधा कभई भी लोकप्रिय विधा की तरह प्रतिष्ठित नहीं रही है । यही इसकी ताकत भी है । ललित निबंध पाठकीय और समीक्षकीय तैयारी की माँग करता है । इसे पढ़ने के लिए संस्कार सिद्ध होना जरूरी है । जाहिर है कि ललित निबंध का आस्वादन पाठकीय विदग्धता की उत्तरोत्तरता पर निर्भर है । इधर जन साहित्य के जनरुचि प्रधान लेखन में ही लोगों की रुचि समाप्त हो रही है। तब ललित निबंध की पाठक संख्या का और सीमित होना चिंतनीय नहीं है । संपादक और समीक्षक ललित निबंध की पाठकीय क्षमताओं से अप्रभावित नहीं रह सकते हैं । फिर इनके पूर्वाग्रह और इनकी उपेक्षायें ललित निबंध के प्रति ही क्यों ? समस्त रचनात्मक अवदा के प्रति इनकी शिविरबद्धता है । हाँ, ललित निबंध के रचनाकार की अपनी कुछ सीमाएँ और कमजोरियाँ भी हैं- अन्यथा ‘तुलसी साँचे सूर को बैरी करत बखान ।’
ललित निबंध एक ऐसी विधा है जो अपनी क्षमता के बल पर सबके सिर पर बोलने लगती है । मैं ललित निबंध के इसी सर्वोत्तम को पाने की चेष्टा में संलग्न हूँ । फिर मैं समीक्षकों और संपादकों की चिंता क्यों करूँ ? उन्हें मेरी रचनाएँ पसंद आती हैं तो मैं अपनी रचनात्मकता के प्रति आश्वस्त होता हूँ । पाठकों की विरलता भी उस समय नहीं सालती जब एक समझदार पाठक की कभी जानदार प्रतिक्रिया प्राप्त हो जाती है । मैं निबंध की अनेक भंगिमाओं में ललित की तलाश के लिए भी क्रियाशील हूँ । इसलिए मुझे नहीं लगता कि पाठकीय प्रतिक्रियाओं की कोताही मेरे सामने है । चुनौतियाँ ही तो लेखन को माँजती हैं । मैं सतत हूँ संपूर्ण नहीं । इसलिए शक्ति अर्जित करता रहता हूँ और लेखन के नये आयामों से जुड़ने की चेष्टा करता रहता हूँ । उसका आनंद भी लेता हूँ ।
- आप जिस साँस्कृतिक चेतना को अपना प्रतिपाद्य बनाते हैं वे लोक, आंचलिकता या लोक धर्म के विषय हैं । आप अपने ललित निबंधों को अन्य ललित निबंधकारों से कैसे भिन्न देखते हैं ? इन दिनों आप नया क्या रच रहे हैं ?
0 मेरी सांस्कृतिक चेतना का निर्माण लोक की संवेदना और लोक के व्यवहार के बीच से ही हुआ है । पारिवारिक पृष्ठभूमि वैदिक पंरपरा की थी और मेरा मानस लोक की गिरफ्त में था । इसलिए आधारभूमि तो आर्षचेतना से उर्वर रही, किन्तु लोक का पादप ही इस पर उत्फुल्ल हुआ ।
लोक मेरे ललित निबंधों की आंतरिक शक्ति है । मैंने लोक को सीधे-सीधे नहीं लिया है । उसकी निरंतर अमृता शक्ति को अपनी समसायिकता की प्राण-उर्जा बनाकर ही ग्रहण किया है । इसलिए लोक मेरे निबंधों में आख्यान के बतौर नहीं शक्ति संधान की तरह आया है । जीवन के शाश्वत की तलाश मैंने लोक के भीतर से ही की है । मेरे ललित निबंध अन्य निबंधकारों से क्या भिन्नता रखते हैं, ये बताना मेरे लिए कठिन है । प्रयास यही रहा है कि पंरपरा में प्रविष्ठि ही नहीं पाऊँ, उसे प्रेरित भी करूँ । आधुनिक संवेदना जो हमारी भारतीय दृष्टि में समाहित होने के लिए एक आक्रमण की तरह उद्यत है को कैसे भारतीय रुख में ढालूँ और उसे अपनी तरह प्रयोजनीय बनाऊँ । ये मेरी रचनात्मकता कशमकश का महत्वपूर्ण हिस्सा है और यही शायद मुझे अन्य निबंधकारों से विलगाने का जरिया बन जाए । फिलवक्त तो मैं इस कोशिश में हूँ कि भीड़ में एक टमकता हिस्सा जरूर बनूँ । मेरे संग्रह गिनती में अधिक नहीं हैं लेकिन जो हैं उनमें मेरा विकसित स्वरूप ही संग्रहित है । इस विकास में वे स्फुरणाएँ भी सक्रिय हैं जो मुझे अपने समय के ललित निबंधकारों से कुछ भिन्न बनाती हैं । जैसे भाषिक स्तर पर मैंने संप्रेषणीयता की ताकत को अपनी ताकत बनाना चाहा है । कविता बनते जा रहे ललित निबंध की भाषा को आमफहम बोलचाल की भाषा देने की चेष्टा मेरी प्राथमिकी रही है । इसलिए
ललित निबंधों की रचना रुक-रुककर ही होती है । गोया निबंध लिखता ही रहता हूँ और जो भी निबंध लिखता हूँ उसे ललित बनाने की कोशिश की गुंजिश बनाकर ही चलता हूँ ।
- ललित निबंध को आप किन शब्दों में परिभाषित करना चाहेंगे ? कोई इसे व्यक्तिव्यंजक निबंध कहता है, कोई रम्य रचना । आपका व्यक्तिगत अभिमत क्या है ?
0 अब ललित निबंध नाम ही सार्थक और सर्वस्वीकृत है । इसलिए अन्य नामों के पचड़े में न तो पड़िए न ही उसे बहस का विषय बनाइए । निबंध वैसे ही परिभाषाओं में अटने वाला कभी नहीं रहा । ललित निबंध तो और अड़ियल है । इसे बाँधकर रखना संभव नहीं है । मानसिक ऊर्जा को एक संक्षिप्त गद्य रचना में अनेक विधा भंगिमा की तरह समेटकर उत्तेजक भावप्रवणता में जिस रचनात्मकता को पकाया जाकर आविष्कृत किया जाता है, वही ललित निबंध है । व्यक्ति व्यंजकता निबंध का एक लक्षण है । ललित निबंध में वह समाहित है । ललित निबंध न केवल रम्य है और न केवल व्यक्ति व्यंजक । वह व्यक्ति की सीमाओं का उन्मुखीकरण भी है और रम्य का विलोमी जुगुप्सा प्रेरक भी । उसकी हजार रंगतें हैं इसलिए उसे ललित ही कहा जा सकता है । ललित में चेतना का सौंदर्य समाहित है । वह रूढ़ अर्थों में ललित नहीं है । इस सौंदर्य में तमाम तरह के जीवन-बोध है जो अपनी कहन में क्रोधित, संबोधित, अनुरंजित करने की क्षमताएँ रखता है ।
क्रमशः...
E-mail:Srijangatha@gmail.com
अंक-2. जुलाई 2006


