सृजनगाथा  

रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

 

E-mail:Srijangatha@gmail.com

अंक-2. जुलाई 2006

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

माह के बालकवि-चंपा मावले

 

 

 

 

 

सबको बतलाता हूँ

 

रात अँधेरी जोर-जोर से

मेंढ़क जब टर्राया ।

पानी के भीतर से कछुआ

एक निकलकर आया ।

 

 

बोला- रोज रात को ऐसे

क्यों तुम चिल्लाते हो ?

गाना गाते हो या बोलो

किस पर यूँ झल्लाते हो ?

 

 

 

मेंढ़क बोला- गीत न गाता

और न झल्लाता हूँ ।

चारों ओर भरा है पानी

सबको यही बताता हूँ ।

 

 

 

 

जंगल में संगीत

 

भालू दादा चले एक दिन

रंग मंच पर गाने ।

और गधा भी आया, उनके

संग में सूर मिलाने ।

 

हाथी ढोलक बजा रहा था

बंदर   जी    संतुर ।

जैसे थाप पड़ी हाथी की

ढोलक   हो  गई चूर ।

 

 

 

सुना गजब आलाप गधे का

श्रोता  सारे  भागे ।

हाथी दौड़ा पीछे-पीछे

भालू   आगे - आगे ।

 

 

 

 

 

बचपन

इस अंक में- 

माह के बालकवि- चंपा मावले  

लोककथा- सिन्धु रथ

कविता - हेमंत कुमार चावड़ा

विनोद-प्रसंग- प.महावीर प्रसाद द्विवेदी

पठनीय किताब- हरिप्रकाश वत्स

 

 

कसम तूझे है

 

चिड़िया बोली चूँ चूँ चूँ

बिट्टू क्या करती तू ।

 

परेशान तू मत होना

कसम तुझे है, मत रोना ।

 

भूख लगी हो बलताना

नहीं तनिक भी शरमाना ।

 

बड़ी दूर से आई हूँ

दाने चुगकर लाई हूँ ।

 

अपने पास इन्हें रख ले

या फिर इसी समय चख ले ।

 

 

 

 

 

 

 

 

छाता

वर्षा से रक्षा करता हूँ

छाता मेरा नाम ।

 

छोटे और बड़े लोगों के

आता हूँ मैं काम ।

 

अब मैं रंग-बिरंगा हूँ पर

पहले था मैं काला ।

 

निखर गई है काया मेरी

दिखता हूँ मतवाला ।