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कथा एक परतंत्र देश की |
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गिरीश
पंकज |
'नर
हो न निराश करो मन को।'
विक्रमार्क ने अक्सर आम आदमी को कंठस्थ
रहने वाली शाश्वत पंक्ति का स्मरण किया,
और एक बार फिर चल पड़ा श्मशान की ओर। बेताल
पेड़ पर लटका हुआ था। विक्रमार्क ने उसे कंधे पर लादा और
महल की ओर चल पड़ा।
बेताल फुसफुसी हँसी हँस रहा था। कुछ-कुछ बड़बड़ा भी रहा था।
विक्रमार्क ने ध्यान से सुनने की कोशिश की तो वेताल ने
आवाज तेज कर दी-'राजन्,
फिर सुनाऊँ कोई कहानी?
बोरियत दूर हो जाएगी। बोरियत दूर करने के
लिए आजकल दिल लुभाने वाली नायिकाओं और राजनीति के मसखरे
लल्लुओं की चर्चाएं बड़ी सटीक रहती हैं। घंटो निकल जाते
हैं। कहो तो शुरू करूं।'
विक्रमार्क मौन ही था। लेकिन इस मौन को स्वीकृति मानकर
चालाक बेताल ने एक कहानी शुरू कर दी-'हे
परमसाहसी राजन् बड़ी पुरानी बात है। एक पराधीन देश था। तुम
तो जानते ही हो, कि पराधीन सपनेहु
सुख नाहीं। सो कुछ बहादुर लोग देश को स्वतंत्र कराने के
लिए जी-जान से भिड़ गए थे। वे शासक उर्फ शोषकों पर छिप-छिप
कर वार करते। शासक भी देशवासियों को अक्सर परेशान करता।
प्रताड़ित करता। देश के लोग आजादी के लिए मचल रहे थे। लेकिन
उस देश में कुछ लोग ऐसे भी थे,
जिन्हें गुलामी रास आ रही थी। हर देश में ऐसे लोग पाए जाते
हैं। जैसे सूअर को कीचड़ में मजा आता है,
उसी तरह बहुतों को गुलामी में भी खास
किस्म का रस आने लगता है। इसीलिए इस प्रवृत्ति के लोग
आजादी के लिए लड़ने वालों को मूर्ख कह कर संबोधित करते थे।
गुलामी पसंद लोगों को शासक राजबहादुर,
खाजबहादुर,
चमचाश्री, फलानाश्री,
ढिकानाभूषण,
फलानारत्न आदि सम्मान देते रहता था। लेकिन आजादी के परवाने
शोषकों को निपटाने में लगे रहे, और
शहीद भी होते रहे। लेकिन स्वतंत्रता सेनानियों की निपटाऊ
रणनीति के कारण शासक वर्ग हलाकान होता गया। एक सेनानी मरता
था, मगर सौ शोषकों की जान ले लेता
था। यह देख कर शासक चिंतित हो गया। अगर यही रफ्तार रही,
तो उनकी नस्लें ही लुप्त हो जाएंगी। यही
सोच कर एक दिन शासक और उनके परिजन देश छोड़ कर भाग खड़े हुए।'
'राजन्, देखते ही
देखते देश स्वतंत्र हो गया। लोगों ने जश्न मनाया। लेकिन इस
बीच कुछ अवसरवादी लोगों ने होशियारी से काम लिया। वे अपने
को स्वतंत्रता सेनानी साबित करने में सफल हो गए। आजादी की
लड़ाई को जो लोग मूर्खतापूर्ण काम बता रहे थे,
वे अब आजादी के गीत गा रहे थे। आजादी की
लड़ाई में भाग लेने के बजाय जो भाग खड़े हुए थे,
वे खलनायक अब नायक बन रहे थे। लोकतांत्रिक
सरकार बनी तो ये लोग सरकार में भी जगह पाने में सफल हो गए।
कोई मंत्री बन गया तो कोई संत्री। जिसे जहां भी जगह मिली,
फिट हो गया। आजादी की लड़ाई करने वाले पीछे
रह गए। उनका सपना था आजादी। आजादी मिली और उनका काम खत्म।
वे सोच रहे थे कि अब राम-राज आ जाएगा। लेकिन ऐ राजन् ऐसा
कुछ भी नहीं हुआ। विदेशी लोग तो चले गए,
लेकिन अपने पीछे अपनी भाषा,
अपनी आदतें, अपने
हथकंडे और अपने पुलिसिया डंडे छोड़ गए थे। आजाद देश में
शासन करने वाले दिखते तो बिल्कुल देसी थे,
लेकिन उनकी हरकतें विदेशियों जैसी ही थीं।
विदेशी भाषा बोलना पसंद था। उनका खान-पान और पहरावा भी
इनको अच्छा लगता था। यह सब देख कर स्वतंत्रता सेनानी दुखी
थे कि क्या इसी दिन के लिए आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे।
आकाश से गिरे,
खजूर में अटक गए। हे राजन् अब तुम मेरे इन
प्रश्नों का सही-सही उत्तर दो, कि
आजादी मिलने के बावजूद उस देश के लोग आजाद क्यों न हो सके?
वे अपनी भाषा-संस्कृति आदि क्यों भूल गए?
अंत में इन लोगों का क्या हुआ?
क्या उस देश के स्वतंत्रता सेनानी खामोश
ही बैठे रहे या फिर उन्होंने आजाद देश को गुलाम लोगों से
मुक्त कराने के लिए एक बार फिर अपना मोर्चा खोल दिया?'
विक्रमार्क ने वेताल की बातों पर सोचना शुरू किया। पहले तो
उसे कुछ नहीं सूझा। उसे लगा कि मौन रहना ही बेहतर है लेकिन
वेताल ने एक अड़ंगा लगा दिया था,
कि मेरे प्रश्नों के उत्तर दो वरना
तुम्हारा सिर टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा। विक्रमार्क ने कहना
शुरू किया- 'देखो,
उस देश के लोग दरअसल वर्षों तक गुलामी में
रहे इसलिए वे गुलामी का रस लेने लगे थे। आजादी और गुलामी
के फर्क को वे समझ नहीं पाए। जैसे पिंजरे में रहते-रहते
तोता उड़ना भूल जाता है, ठीक उसी
तरह ये लोग आजादी की उड़ान भूल चुके थे। इसीलिए वे
विदेशियों की भाषा बोल रहे थे। वैसी ही हरकतें कर रहे थे।
अपने ही लोगों पर डंडे बरसा रहे थे। भ्रष्टाचार कर रहे थे।
पशुओं को मिलने वाले चारे तक को बेचकर करोड़ों की कमाई कर
रहे थे। यह देख कर पुराने सेनानियों ने निर्णय किया,
कि एक बार फिर आजादी के दौर-जैसी लड़ाई
शुरु की जाए। भले ही ये लोग अपने हैं,
लेकिन हरकतें तानाशाह विदेशियों जैसी हैं।
इसलिए इनके खिलाफ लड़ना होगा।'
विक्रमार्क ने हमेशा की तरह बिल्कुल सही जवाब दिया था,
और इसके साथ ही उसका मौन भी भंग हो चुका
था। चालाक वेताल को और क्या चाहिए था। वह फौरन उड़ा और बरगद
पर जा कर लटक गया।
विक्रमार्क फिर उसके पीछे भागा,
जैसे जनता, नेताओं
के पीछे भागती है। विक्रमार्क तलवार लेकर भागा। जनता
ज्ञापन लेकर भागती है।