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देवभाषा

 

शनि की स्थिति और ज्योतिषाचार्य रहीम कवि

आचार्य डॉ. महेशचन्द्र शर्मा·

 

                    यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवेति ।

                    दूरङूगं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ।।

वेदों में नक्षत्र विज्ञान-

        इस वैदिक मंत्र में आये ज्योतिषाम् इस पद का अर्थ ग्रहनक्षात्राणाम् ऐसा किया जाना चाहिये । ज्योतिष शब्द के तो उच्चारण अथवा श्रवण के साथ ही ग्रह नक्षत्रों की अनुभूति अन्तः करण में होने लगती है । वेदों में नक्षत्र की व्युत्पत्ति के विषय में कहा गया है-

              प्रबाहुर्वा अग्रे क्षत्राणयातेपुः। तेषामिन्द्रः क्षत्राण्यादत्त ।

              नवा इमानि क्षत्राण्यभूवन्निति । तन्नक्षत्राणां नक्षत्रत्वम् ।

 

        यहाँ यह स्पष्ट हो जाता है कि जो क्षत नहीं है वे नक्षत्र हैं । नक्षरति न गच्छति इति नक्षत्रम्। या गतेरभावत्वं नक्षत्रम् किन्तु एक अन्य व्यूत्पत्ति के अनुसार गत्यर्थक नक्ष् धातु से भी नक्षत्र शब्द निष्पन्न होता है - नक्षत्र वह है जिसमें ग्रहों का संञ्चार होता है । यथा- सलिलं वा इदमन्तरासीत्। यदतरन् । तत्तारकाणां तारकत्वम् । यो वा इह यजते । अमु सलोकं नक्षते । तन्नक्षत्राणां नक्षत्रत्वयम् । देवगृहा वै नक्षत्राणि । य एवं वेद । गृह्मे भवति । यानि वा इमानि पृथिव्याश्चित्राणि । तानि नक्षत्राणि । तस्मादश्लीलनामँश्चित्रे । नावस्येन्न यजेत् । यथा पापहे कुरुते । ताद्दग् एवं तत् ।।

 

        यहाँ देवगृहा वै नक्षत्राणि का आशय है कि देवों के ग्रह हैं- नक्षत्र  इसी कथन के आधार पर गृह्णातीति ग्रहः यह व्युत्पत्ति हमें यह भी बताती है कि नक्षत्रों में संञ्चार करने वाले प्रत्यक्ष प्रकाशमान् ग्रह ही वैदिक साहित्य में ग्रह कहे गये हैं । सृष्टि के आरम्भकाल से ही ग्रह-नक्षत्रों की चर्चा विशेष रुप से हमारे आर्षग्रन्थों में प्राप्त होती है । सुर्य सिद्धान्त की ये पंक्ति उल्लेखनीय है - ग्रहर्क्ष देव दैतेयादि ऋजतोsस्य चराचरम् । जगदुत्पत्ति के प्रसंग में भी सूर्य का उल्लेख प्रमुखता से किया गया है-

        हिरण्यगर्भो भगवानेष च्छन्दसि पठ्यते।

        आदित्यो ह्मादिभूतत्वात् प्रसूत्या सूर्य उच्यते।।

 

        और श्रुतिवाक्य इसमें प्रमाण है- हिरण्यगर्भः समभवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् तथा सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च । वैदिक ऋषि प्रतीकों की भाषा किन्तु सरल परिभाषायें ग्रहों अर्थात् देवों की देते है वे कविता में अपनी बात करते हैं-

         अमी ये पञ्चोअक्षणो मध्ये तस्युर्महो दिवः।

        देवत्रा नु प्रावाच्यं सधीचीनानि वावृतुवित्तं में अस्य रोदसी ।।

       अर्थात्-ये महाप्रबल पाँच देव विस्तीर्ण द्युलोक के मध्य में रहते हैं। मैं उन देवों के विषय में स्तोत्र (कविता) रचना चाहता हूँ । वे सब एक साथ आनेवाले थे, लेकिन वे सब आज निकल गये हैं।

 

वेद-पुराणों में ग्रह नक्षत्र-

        सूर्य को जगत् का आत्मा मानने विषयक विचार पुराणों मे भी हमें दिखायी देता है। भारतीय ज्ञान-विज्ञान के विश्वकोष के रूप में प्रसिद्ध महाभारत में भी उपर्युक्त वैदिक प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है । यथा-

त्वं भानो जगतश्चक्षुस्त्वमात्मा सर्वदेहिनाम्।

त्वं योनिः सर्वभूतानां त्वमाचारः क्रियावताम्।।

 

        महर्षि वेदव्यास जो कि भविष्यवेत्ता तथा त्रिकालदर्शी के रूप में भी प्रसिध्द हैं, ने ग्रह व नक्षत्रों के विषय में स्पष्ट मत व्यक्त करते हुये लिखा है चन्द्रदित्यौ ग्रहास्ताराः नक्षत्रामि दिवौकसः।

 

       ऋग्वेद के जिस मन्त्र अमी ये पञ्चो अक्ष्णो मध्ये .... । आदि में पाँच देव का तात्पर्य भी भौमादि पाँचग्रह ही लेना चाहिये । चमकने वाले अथवा प्रकाशवान् इस अर्थ में ही यहाँ दिव् धातु आया है, देवगण आदि वाचक किसी अन्य अर्थ में नहीं । ऋग्वेद के ही 10वें मण्डल के 55वे सूक्त में भी पाँच देवों का अर्थ, देवविशेष नहीं अपितु पाँच ग्रह ही लिया गया है। ग्रह-लक्षत्र विज्ञान के उदयकाल में भी शुक्र और गुरू भारतीयों की जानकारी में भी अवश्य थे । अपने चमचमाते स्वरूप के कारण भी ये दोनों ग्रह हमारे पूर्वजों की द्रष्टि से ओछल हो भी कैसे सकते थे ? ऋग्वेद के अनेक मन्त्रों से ध्वनित होता है कि प्रति 20 मास में प्रभास शुक्र प्रातः काल में पूर्व दिशा की ओर उगता है। उसके दिखने के बाद ही ऋषिगण स्नान तथा पूजा आदि के समय को ज्ञात कर अपने अन्य दैनन्दिन कार्यों को सम्पन्न करते हैं । वैदिक ऋषि इसे प्रकाशमान् नक्षत्र नहीं अपितु ग्रह मानते हैं । उस काल के साहित्य के अनुशीलन से ज्ञात होगा कि बृहस्पति शुक्र के पास ही भ्रमण करता था । शुक्र की गति अत्यन्त तेज थी अतः वह बृहस्पति को कहीं पीछे छोड़ देता था । शुक्र व गुरु को ग्रह मानने की परिकल्पना पर एक मन्त्र वैदिक साहित्य से यहाँ प्रस्तुत है-

        ईर्मान्यद्वपुशे वपुश्चक्रं रथस्य ये मथुः।

        पर्जन्य नाहुषा युगा मह्रा रजांसि दीयथः।।

        अर्थात्- हे अश्विन्, तुमने अपने रथ के एक तेजस्वी चक्र को सूर्य को शोभायमान करने के लिये रख दिया है, और दूसरे चक्र से तुम लोक के चारों ओर घूमते हो । इस मन्त्रार्थ में एक तेजस्वी चक्र, जिसे सूर्य के पास रखा चित्रित किया गया है, उससे शुक्र यह भावार्थ समझना चाहिये, और दूसरे चक्र से गुरु का अर्थ ग्रहण करना चाहिये । निरुक्त द्युस्थानीय अश्विनौ की गणना करते हुये अर्धरात्रि को उनका स्तुतिकाल मानता है । ऋग्वेद अश्विनौ का सम्बन्ध उषा से बताता है । ज्योतिष की द्दष्टि से इन सन्दर्भों को देखा जाय तो अश्विनौ गुरु और शुक्र ये ग्रह हैं, और कोई नहीं । ऋग्वेद में गुरु के सम्बन्घ में भी स्वतन्त्र परिकल्पना प्राप्त हुयी है । तैत्तिरीय ब्राह्मण में इस अवधारणा का समर्थन किया गया है-

बृह्स्पतिः प्रथमं जायमानाः । तिष्यं (पुष्यं) नक्षत्रमपि सम्बभूव ।।

 

            सिद्धान्त, संहिता और होरा इस त्रिस्कन्ध से युक्त ज्योतिष शास्त्र को वेद पुरुष का नेत्र कहा गया है । पाणिनीय शिक्षा का वचन है –‘ज्योतिषामयनं चक्षुः । हर मनुष्य ही नहीं प्राणीमात्र के शरीर में नेत्र एक प्रधान अंग माना गया है । वैदिक साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान रखने के कारण जगत् और जीवन के हरेक क्षेत्र में ग्रह-नक्षत्रों की गति का विशेष महत्व है । जातक के जन्म के समय ग्रह नक्षत्रों की जो स्थिति होती है, जातक की जीवनी शक्ति उससे प्रभावित हुये बिना नहीं रह पाती । जातक की शारीरिक रचना, भाषा- शैली, व्यवहार, विद्या व कार्यकुशलता आदि भी इससे प्रभावित होते हैं । व्यक्ति की प्रगति, दुर्गति अथवा सद्नति भी-ग्रह दशा व ग्रहगति से नियन्त्रित सञ्चालित तथा प्रभावित होती है। जातक के हानि, लाभ, जीवन,मरण, यश-अपयश आदि का विचार भी इन्हीं ग्रहों के आधार पर होता है। और ये सब किसी अदृश्य शक्ति व्दारा सञ्चालित हैं । ग्रहों द्वारा अच्छे व बुरे दोनों प्रभाव देने का निर्णय उनकी लग्न स्थिति पर निर्भर करता है।

 

सौभाग्य संवर्धक शनि-

        शनि भी मानव जीवन को प्रत्यक्षरूप से प्रभावित करनेवाले ग्रहों में से एक है। सर्दी में भी शनि का नाम लेने मात्र से सुनने वाले जातक को पसीना छूट जाता है। ज्योतिषी के मुख से जातक सुनले कि उस पर साढ़े साती है, तो वह मनोवैज्ञानिक रूप से तनावग्रस्त हुये बिना नहीं रहता । चाहे भले ही उस पर साढ़े साती दशा चल रही हो या नहीं । किन्तु अब यह गणित द्वारा सिद्ध हो गया है कि यद्यपि जातक पर सर्वाधिक प्रभाव शानि का होता है, तथापि यह कहना ठीक नहीं है कि यह सर्वदा दुष्प्रभावित ही करता है। शनि सौभाग्य भी प्रदान करता है। यदि जन्मपत्री में शनि बलवान् हो अर्थात् अपनी राशि मकर या कुम्भ अथवा मूल त्रिकोण में हो या फिर उच्चा राशि तुला में हो, शुक्र बुध के प्रभाववाली राशियों के नवांश अथवा उच्च नवांशों में हो या फिर तीसरे अथवा ग्यारहवें भाव में हो तो जातक का भाग्यवर्धन अवश्य होता है। शनि की ये भाग्यवर्धिनी दशा कहलाती है। इससे राज्य सम्मान, ऐश्वर्य तथा धन-धान्य में वृद्धि होती है्। अतएव शनि के विषय में ये धारणा बनाना अनुचित है कि यह एक अनिष्टकारी तथा खराब ग्रह है। इन्हें हमेशा दुःखकारक ग्रह के रूप में नहीं देखा जाना चाहिये । नवांश की शुभस्थिति में शनिदेव दरिद्र को भी धनाढ्य बना देते हैं। शनिदेव,जो कि लग्न में कन्या सन्तान देने वाले माने जाते हैं, यदि नवांश की मंगल की राशि में हों तो पुत्र लाभ कराते हैं। पुराणों के अनुसार सूर्य देव के पुत्र शनिदेव पिता से करोड़ों मील दूर रहकर भी धीमी गति से चलते हैं। शनैःशनैः चरति इति शनैश्चरः ऐसा इसीलिये कहा भी जाता है। यही कारण है कि 30 वर्ष में 12 राशियों की परिक्रमा कर पाते हैं, जबकि अपनी ही धुरी पर 36 घंटों में एक बार ही घुमपाते हैं।

 

शिव शिष्य शनि-

        पुराणों में जहाँ सूर्यपुत्र, छायात्मज, नील, असित तथा मन्दगति आदि अनेकानेक नामों से सम्बोधित किया गया है। ज्योतिषशास्त्रीय ग्रन्थों में क्रूर तथा मन्द रूप में वर्णित किया गया है। उसे मकर राशि एवं पुष्य नक्षत्र का स्वामी भी कहा गया है। परन्तु जैसा कि पौराणिक साहित्य के अध्ययन से ज्ञात होता है - शनि-दयालु सौम्य,कृष्णभक्त व शिवशिष्य के रूप में भी जाने तथा माने जाते हैं। जनकल्याण की दृष्टि से भी शनि के माध्यम से अनेक कार्य पौराणिक ग्रन्थों में वर्णित हैं । महाराज दशरथ ने उन्हें स्तवराज स्तोत्र से प्रसन्न कर रोहिणी संकट भेदन करने से रोका था।

 

दण्डाधिकारी और साधु समर्थक शनि-

        यद्यपि पौराणिक वाड्मय में शनि देव को मर्त्यलोक का प्रत्यक्ष दण्डाधिकारी माना गया है, तथापि प्रायः वे उन्हीं लोगों को दण्डित करते हैं जो पाप या दुष्कर्म में संलग्न रहते हैं । जो लोग अच्छे कर्म करते हैं, जो लोग सत्कर्म में लगे रहते हैं, उन्हें साढ़े साती में भी लाभ-ही-लाभ है। शनि कोप से बचने के लिये भी पश्चाताप और प्रायश्चित विधान में दान-पुण्य, दीन-दुःखियों तथा अपंगों की सेवा और सहायता आदि की चर्चा है, ऐसा करने पर शनि की साढ़े साती भी अपनी मारक दशा से आपको मुक्त कर सकती है। धर्मात्मा तथा पुण्यात्मा को उससे कतई डरने की आवश्यकता नहीं है।

 

सत्ता के दाता भी हैं शनैश्चर-

        भविष्यपुराण में वर्णित 25 श्लोकों के शनैश्चरस्तवराज स्तोत्र में धर्माराज युधिष्ठिर ने शनि की अनेक विशेषताओं का वर्णन किया है। शनि की अनेक धनात्मक विशेषताओं को व्यक्त करने वाले श्लोक भी इसमे सम्मिलित हैं। जहाँ उन्हें घोर, भयद, दुर्निरीक्ष्यो, विभीषणः, कराली, क्रूरकर्म विधाता तथा यम जैसे घातक रूपों मे चित्रित किया गया है, वहीं उन्हें ग्रहराज,राज्येश, राज्यदायक, धनप्रद, ग्रहेश्वर, सर्वरोगह, स्थिरासन तथा कामदः जैसे सुखद सम्बोधनों से भी सम्बोधित किया गया है - देवर्षि  नारद ने इस स्तोत्र का फल बताते हुये कहा है-

        रक्षामेतां पठेन्नित्यं सौरेर्नामबलैर्युताम्।

        सुखी पुत्री चिरायुश्च स भवेन्नात्र संशयः।।

आगे कहते हैं-

        विष्णुर्हरो गणपतिः कुमारो काम ईश्वरः।

        कर्ता हर्ता पालयिता राज्येशो राज्यदायकः।।

        तुष्टो रुष्टः कामरूपः कामदो रविनन्दनः।

        ग्रहपीडाहरः शान्तो नक्षत्रेशो ग्रहेश्वरः।।

प्रशान्त और प्रसन्न शनि-

        इसी प्रकार ब्रह्मण्डपुराण के महाराजदशरथकृत शनैश्चरस्तोत्र में शनि देव की अनेक विशेषताओं का उल्लेख हैं । शनि के दस प्रचलित नामों के साथ स्तुति की गयी है। शनैश्चरकृत पीड़ा विनिर्मुक्ति इस स्तुति का फल है। ब्रह्माण्ड पुराण में ही ब्रह्मा-नारद संवाद में शनि पर व्यापक विवरण प्राप्त होता है। उन्हें चतुर्भुजः, प्रसन्नः, वरदः, प्रशान्तः, वैवस्वत, भास्कर, स्निग्धकंठ, महाभुज, शुभप्रद, ग्रहपति, पिप्पल तथा सूर्यनन्दन आदि नामों से स्मरण किया गया है।

 

शनि की बुलन्दी के व्याख्याता रहीम जी-

        कुछ लोगों की ऐसी भी मान्यता है कि कुछ पुराणों की रचना 1500 ई. के आसपास हुयी। यवनों अथवा मुसलमानों का भी उनमें उल्लेख मिलता है। अकबर के संरक्षक बैराम खान के पुत्र तथा महान् भारत विद्या प्रेमी अब्दुर्रहीम-खाने-खानान् का स्मरण भी इस अवसर पर आ जाता है। ग्रह नक्षत्रों पर उनके ग्रन्थ खेटकौतुकम् का अवलोकन इस सन्दर्भ में कुछ जानकारी अवश्य देता है- वे लिखते हैं-

        यदा मुश्तरी केन्द्रखाने त्रिकोंणे यदा वक्तखाने रिपौ आफताबः।

        अतारिद्वलग्ने नरो वख्तपूर्णस्तदा दीनदोsथवा बादशाहः।।

        अर्थात्-जिसके जन्मकाल में बृहस्पति केन्द्र में अथवा त्रिकोण में और सूर्य छठे  घर में और बुध लग्न में हो, तो वह मनुष्य अपने समय का महान् व्यक्ति या राजा बनेगा। करीब 12 श्लोकों में उन्होंने शनिफलम् भी लिखा है-

        बख्तबुलन्दः श्रीमान् शीरीसखुनश्च मानवो यदि वै।

        ज़ुहलो बख्तमकाने बेतालश्च हि कृपालुरपि भवति।।

और अन्त में-

        नीलाञ्जन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।

        छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चाम्।।

  (नवग्रहस्तोञम् -वेदव्यास)

· लेखक साहित्य, संस्कृति व धर्म के जाने-माने अन्तर्राष्ट्रीव मर्मज्ञ हैं। देश-विदेश के पर्यटक डॉ. शर्मा ने दिल्लीके फ़िक्की हाउस में अ.भा. ज्योतिष सम्मेलन में शनि पर शोधालेख प्रस्तुत किया था, जिसकी व्यापक सराहना की गई थी।

 

 

 

देवभाषा 

जिस राष्ट्र में विद्वान सताए जाते हैं, वह विपत्तिग्रस्त होकर नष्ट हो जाता है - अथर्ववेद

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