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मेरी आँखे क्यों नहीं देखती |
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स्वामी जी.सी.डी भारती* |
बाग
में रंग बिरंगी फूल खिले हैं । हरियाली है । चिड़ियों की
चहक है ।
फूलों की
गमक है । भौंरों की गुनागुहट से आकृष्ट
हो कर धीरे-धीरे मानसिक शांति की ओर बढ़ते चले जाते हैं तब
आहिस्ता-आहिस्ता मखमली और साफ-सुथरी घास पर बैठ कर फूलों
को निहारते-निहारते ज़ेहन अनवर फ़रोख़ाबादी के शेर में
उलझती चली गई-
फूलों के देख-देख शर्मा रहें हैं आप
खिलते हुये गुलाब तज़र आ रहें हैं आप ।
चेहरे से अपने रेश्मी आंचल हटाइये
घूंगट की चिलमतों में छुपे जा रहैं हैं आप।
वाह
!
ये फूल तेरा हुस्नोजमाल है या तेरे हुस्नोजमाल का सदक़ा है
फूल । रंग-बिरंगी
फूल तो दिखते हैं मगर उससे सम्बंध जोड़ने वाली खुशबू को हम
एहसास करते हैं पर क्यों नहीं देख सकते
?
हरी-हरी मुलायम घास को बाग़ीचे में पाकर चप्पल या जूते
उतार कर उसमें चहल क़दमी करतें हैं । वो हरियाली हमारे
तलवों को एक मर्म स्पर्श देती है - हमारी आँखों को चैन और
दिल को सुकून पहूँचाता है । हम उस सुकून को, उस चैन को
क्या देख पाते है
?
उड़ते हुए चिड़ियों की झुंड की आवाज़ सुनकर आँखें सहसा ऊपर
आसमान की ओर उठ जाती हैं और हमारा यह मस्तक एक ओर से दूसरी
और तक घूम जाता है । दूर तक आवाज़ करती चिड़ियों को
निहारते रहते हैं मगर कभी इस आवाज़ को पढ़ना चाहा या कभी
इसे समझने कि कोशिश की
?
क्या इस आवाज़ से दूर ओझल चिड़ियों के दुःख-सुख, दर्द,
बेक़रां देख पाते हैं
?
भौंरो की गुनगुनाहट से हमारा यह कान हमें कुछ और कह देता
है जैसे मंड़ी में आवाज़ लगाते हुए दुकानदार जोर-जोर से
चिल्लाते रहते हैं । हमारे पास फ़लां-फ़लां सामान है और
इसके क़ीमत भी सस्ता है, बस क्या, हम एक दुकान को छोड़कर
दूसरी दुकान में पहूँच जाते हैं । हम कितने भटक रहे हैं ।
कभी ये दुकान तो कभी वो दुकान । कब तक भटकते रहेंगे
?
हमें ज़िंदगी भर पहली कक्षा में ही रहना है क्या
?
आगे की कक्षायें उत्तीर्ण करना है कि नहीं
!
कभी हम बाग़ में खो जाते हैं,
कभी रंग बिरंगी फूलों में, तो कभी खुश्बू में । कभी
हरियाली में, कभी चिड़ियों की आवाज़ में, तो कभी भौंरो की
गुंजन या फिर कभी तितली के छटा .में उलझ जाते हैं । कितना
उलझेंगे और कितना उलझना बाकी़ है
?
कभी समाज के आडम्बर में तो कभी धार्मिक कुरीति, तो कभी
परिवार के जंजाल में, या फिर तथाकथित टी.व्ही. चेनलों
वाले 108 स्वामी जी महाराजों के भ्रमजाल में । कब तक फसते
रहेगें
?
हम अपनी आँखों से क्यों नही देख रहे हैं, इन आखों का उपयोग
कब होगा, हमारी आँखे कब रौशन होंगी
?
कब तक अंधों की तरह जियेंगे, कब तक प्रकाशहीन रहेंगे
?
कब तक जगत् गुरुओं के बाजा़र में दुकान-दर-दुकान भटकते
रहेंगे
?
क्या कोई इन जगत् गुरुओं के बाजा़र में सतगुरु भी आयेगा
?
या फिर हमारे आसपास ही सतगुरु है, क्यों नहीं खोज पा रहे
हैं, क्यों नहीं देख पा रहे
?
ज़िद में सही मूसा ने एक झलक देखा तो । ये और बात है कि
जिस पर मूसा खड़े थे वो कोहेतूर (पहाड़) जल कर सूरमा हो
गया लेकिन मूसा बच गये । कैसे
?
साहेब के प्रकाश-पुंज की एक हलकी-सी झलक से कोहेतूर खाक हो
जाता है, मगर मूसा गश खा जाते हैं (चक्कर आ जाना) । वो
नहीं जलते बेशक़ जिन आँखों में उन्हें देखने की चाह
अनुनय-विनय के साथ हो उसे कौन मिटा सकता है । हम देखें या
न देखें लेकिन मूसा जैसे देखने की अतुविनय तो करें । शायद
इसी तरह की भावना रही होगी - सूफ़ी संत शायर हज़रत बेदाम
वारसी की-
उठता
हुआ हस्ती का परदा नज़र आता है
अब जलवा हक़िकत में जलवा नज़र आता है ।
इस सूरते ज़ाहिर के नक़्शे को मिटा पहले,
फिर देख तुझे तुझमें क्या-क्या नज़र आता है ।
ठीक इसी तरह सुफ़ी संत हज़रत बाबा बुल्लेशाह कहते हैं-
बुलिया रब तै थों वख़ नहीं
तैनू दैंदा कख़ नहीं
तेरी देखणवाली अँख्ख नहीं ।
बहुतों ने देखा है बाबा फ़रिद ने तो ऐसे देखा कि अपना सारा
जिस्म चील-कौउओं को खिला दिया और उनसे आग्रह किया
“कागा
सब तन खाईयो, मोरी चुन-चुन खइयो मांस
। दो नैना मत खाइयो, मोहे पिया मिलन को आस ।।”
सुर ने तो ऐसे देखा कि फिर और कुछ न देखने की इच्छा से
दोनों आँखें ही वापस कर दी । मीरी ने तो ग़ज़ब कर दी, ऐसे
देखा कि देखने वाले को ही
“मोल
ले लिया”
। क्यों न तराज़ू में वो यार को तौलती । उसने रवि दास जैसे
तराजू (सद्गुरु)जो पाया था । नानक साहेब ने ऐसे देखा कि वो
उनके साथ में यात्रा करने लगे,
“नानक
नाम जहाज़ है चढ़े सो उतरो पार”
और यात्रा पूरी कर ली । कबीर साहेब ने जो देखा तो फिर क्या
कहने, फिर तो ऐसी फ़कीरी यार से हुई कि कबीर साहेब के
पीछे-पीछे पिया कबीर-कबीर पुकारते फिरने लगे । क्योंकि
कबीर साहेब ने
“द्वतियो
नास्ति”
को सिद्ध कर दिया और ऐसे देखा कि दूई को मिटा कर एक कर
दिया ।
वाह
!
देखने वालों ने तो क्या-क्या
देख लिया और कैसे-कैसे देख लिया
!
कोई जलवा तो कोई नुर तो कोई प्यार कोई यार । कोई उसके
देखने के लिये अपना मान-सम्मान ज़ात-धर्म मर्यादा आदि सबको
लाँघ कर उनको देखा तभी कोई सुर, कोई मीरा, कोई नानक और कोई
कबीर बन पाये । इन लोगों ने तो उस यार को (साहेब) देख लिया
पर हम कब देखेंगे
?
क्या ऐसे ही चौरासी के चक्कर में घूमते रहेंगे
?
हाय री आँखें, मैं तुझे कब उसे देखते देखूँ । काश!
उस बाजा़र का पता मुझे भी मिल जाता जहाँ-
“अनवर
अशरफी”
का शेर-
वो हैं बाजा़रे सोहब्बत के अजब सौदागर ।
बिकने वाले को ख़रीददार बना देते हैं ।
बिकने वाले को खरीददार बना दिया जाता है । काश, वो
दुकानदार का पता मुझे मिल जाता, जिसके दुकान के चश्में पहन
कर इन सब लोगों ने मेरे साहेब को देखा है । मेरे यार को
देखा है, मेरे साजन को देखा है । जब ये लोग देख सकते हैं
तो हम क्यों नहीं देख सकते
?
जो उनकी आँखे कहती हैं, वो मेरी आँखें क्यों नहीं देखती
?
* लेखक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित
सूफ़ी शैली के कबीर गायक हैं ।