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संगठन, साहित्य के संबंध पर पुनर्विचार |
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विजय कुमार देव |
भारतीय
साहित्य में हमें संगठनों का उद्भव सन् 1935 में समझ में
आता है, जब पेरिस में दो मित्रों ने इस तरह का संगठन क़ायम
किया था और भारत में प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष मुंशी
प्रेमचन्द बनाए गए थे । यह निर्विवाद है तक तत्कालीन
प्रलेस ने लेखकों और उसके माध्यम से समाज को एक दिशा दी थी
लेकिन यह भी सच है कि मुंशी प्रेमचन्द के पश्चात् यह संगठन
जिस आन्तारिक संकीर्णता का शिकार होता गया उसका असर बाह्य
रूप मे भी सामने आया।
धीरे-धीरे ये संगठन अपने मूल उद्देश्यों से भटकते गए। संघ और संगठनों की नियती यह होती
गई कि या तो इन्हें सत्ता द्वारा नष्ट करने
की कोशिशें या फिर
उन्हें सत्ता का पिछलग्गू बनाने का प्रयास किया जाता रहा।
इसी उपक्रम में बेहतर और स्वतन्त्रचेता संस्थाएं उसके भीतर
कार्यरत लोगों के
निजी स्वार्थों के चलते नष्ट होती गई।
आज जब हमें वर्तमान में साहित्यक संगठनों की प्रासंगिकता
विषय पर पुनर्विचार की आवश्यकता महसूस हो रही है, तो
निश्चित ही यह इस बात का संकेत है कि अब अधिकांश लेखकों का
इस छद्म से मोहभंग हो चुका है। मोहभंग की स्थिति उत्पन्न
होने के क्या कारण रहे हैं
?
उन कारणों पर क्या कभी हमने एक साथ बैठकर विचार करने और
बेहतर स्थिति निर्मित करने के प्रयास किए हैं
?
यह आज भी बहस का मुद्दा है!
इधर साहित्य में राजनीतिक शैली हावी होती गई है। संगठन,
उपसंगठन, गुट निरन्तर बनते गए हैं और इंतिहा यह कि अब
निर्गुट साहित्यकारो का भी संगठन बन गया है। किन्तु जो
सृजनधर्मी
लेखक है, जो इन घिनौनी गुटीय राजनीति से दूर हैं
उसका कोई ठिकाना नहीं है। संगठनों के लिए अभी भी वह वर्जित
वस्तु की तरह हेय है। दूसरे, भारतीय संस्कृति के समानांतर
उन विचारो की सार्थकता पर भी विचार अनिवार्य है, जिनकी
बुनियाद पर ये संगठन खड़े हुए थे । यह भी विचारणीय है कि
वैचारिक मोहभंग की स्थिति में लड़खड़ाते संगठनों का विकल्प
क्या होना चाहिए और क्या हो सकता है
?
इस सांगठनिक प्रतिक्रियावाद का सबसे दुखद पहलू यह है कि
विचारधारा के एक विचित्र किस्म के अहंकार के बंधन में
सिरजा गया
साहित्य एक खास किस्म की वैचारिकता तक ही सीमित
हो जाता है। टुकड़ा-टुकड़ा संगठनों की अपनी-अपनी पत्रिकाएँ
निकल आती है; कुछ खास-खास लेखकों की रचनाएँ ही उसमें छपने
लगती है, उनके भीतर से ही आलोचक उग आते हैं। परस्पर
संगठनों की निन्दा का प्रयोजित दौर आरम्भ होता है और यह
युद्ध, वाकयुद्ध, मुष्ठियुद्ध तथा गुरिल्लायुद्ध तक अपने
उत्कर्ष को प्राप्त होता है । खासियत यह कि फिर ये कुएँ के
मेंढ़क हो जाते हैं, जिस कुएँ मे जैसे स्रोत होते हैं पानी
का स्तर भी वैसा ही होता है। यह इस बात पर भी निर्भर करता
है कि कुएँ कहाँ खोदा जा रहा है
!
बहरहाल इन्हें
कोई फ़र्क नहीं पड़ता, ये अपने-अपने कुएँ के बाहर पानी की
उपस्थित से इन्कार करते रहते हैं और सारी दुनिया की तृषा
इन्ही के कुएँ से शान्त होती रही है, होती रहेगी-जैसा
दावा करते हैं। यह तो उस प्रवाह की सरासर अवमानना
है जिसे रोका
था बाँधा जाना असम्भव है।
वर्त्तमान में साहित्यिक संगठनों की प्रासंगिकता पर तटस्थ
और स्वस्थ राय देने की अपेक्षा हम उन लोगों से नहीं कर
सकते जो अपने विचारों से जड़ हो चुके हैं या जो पूर्वाग्रह
से ग्रस्त हैं और किसी भी परिवर्तित स्थिति को महसूस करने
की क्षमता से शून्य हैं । याद तमाम कट्टरताओं, गुरुडम और
‘अहम् ब्रह्मारस्मि
द्वितीयों नास्ति’
सरीखी प्रवृत्तियों के अलावा भी
कहीं उदात्त चिन्तन का एक
कोमल प्रकोष्ठ यदि जीवित है तो जरुरी है कि वर्त्तमान
माहौल में इस विषय पर जमकर, खुलकार स्वस्थ चर्चा हो।
साहित्यक संगठन कैसे और किसलिए बने हैं और वे क्या और किस
तरह कर रहे हैं यह अब गोपनीय नहीं रहा बल्कि इन संगठनों की
आन्तरिक स्थितियों और सत्यों से एक आम लेखक भी वाकिफ हो
चुका है। हमें यहाँ यह सोचते हुए इस बात पर भी विचार करना
होगा कि संगठन, संघ की परिधि क्या है
?
क्या हमारे यहाँ भारतीय लेखकों का कोई ऐसा संगठन है जिसकी
परिधि में पूरे भारत के लेखकों की आस्था हो
!
हमारी समझ में भारतीय लेखकों का ऐसा कोई आदर्श संगठन मिसाल
के तौर पर प्रस्तुत न कर पाना हमारा दुर्भाग्य ही कहा जा
सकता है। संगठनों के नाम पर हम जो देख और जान रहे हैं वह
बहुत सुखकर नहीं है। एक बेहतर मनुष्य, एक बेहतर समाज को
गढ़ने हेतु अपशक्तियों से संगठित होकर कई-कई स्तरों पर
जूझने और विरोध दर्ज करने के उद्देश्यों से नियमित होने के
इस अंधेरे समय में साहित्यिक संगठनों में जो
छीजन, टूटन और
संकीर्णता निरन्तर आती गई उसके नेपथ्य में इन संगठनों में
अलेखकों और कुलेखकों का प्रवेश रहा । इसके चलते संघठनों की
शैली बदली, उद्देश्य बदले और एक बिल्ला संस्कृति विकसित
होती गई। यानी संगठन का
बिल्ला लगा लेने पर एक अलेखक को भी
लेखक, और अच्छे लेखक होने का प्रमाणपत्र दिया जाने लगा।
उनकी पुस्तकें छापी गई फिर उनपर गोष्ठियों में उनकी
प्रतिभा को समकालीनता और महत्व के संकीर्त्तन में प्रतिभा
का चरमोत्कर्ष साबित किया जाने लगा है। ऐसे में कभी-कभी
अधूरी तैयारी के देहावसान की आशंका जन्म लेती है और एक
लेखक, संभावनाशील लेखक मरता है, टूटता है, दिग्भ्रमित होता
है ।
इधर तीन-चार दशकों में साहित्यिक संगठनों ने
प्रोपेगणडा ज़्यादा किया है और स्वार्थपरता में आपसी अहित
ही ज़्यादा किए हैं यकदि संगठन की कोई प्रासिंगता हो सकती
है तो उसमें हमें आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की उस
सात्विक प्रवृत्ति को उपस्थित करना होगा जो मैथिलीशरण गुप्त
जैसे रचनाकार तैयार कर सकती है।