रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

लोककथा

 

उ.प्र. की लोककथाःटिपटिपवा

गिरिजा रानी अस्थाना

क थी बुढ़िया । उसका एक पोता था । पोता रोज़ रात में सोने से पहले दादी से कहानी सुनता । दादी रोज़ उसे तरह-तरह की कहानियाँ सुनाती ।

 

एक दिन मूसलाधार बारिश हुई । ऐसी बारिश पहले कभी नहीं हुई थी । सारा गाँव बारिश से परेशान था । बुढिया की झोंपड़ी में पानी जगह-जगह से टपक रहा था टिपटिप- टिपटिप । इस बात से बेखबर पोता दादी की गोद में लेटा कहानी सुनने के लिए मचल रहा था । बुढ़िया खीझकर बोली अरे बचवा, का कहानी सुनाएँ ? ई टिपटिपवा से जान बचे तब न !

 

पोता उठकर बैठ गया । उसने पूछा- दादी, ये टिपटिपवा कौन है ? टिपटिपवा क्या शेर-बाघ से भी बड़ा होता है ?

 

दादी छत से टपकते हुए पानी की तरफ़ देखकर बोली हाँ बचवा, न शेरवा के डर, न बघवा के डर । डर त डर, टिपटिपवा के डर ।

 

संयोग से मुसीबत का मारा एक बाघ बारिश से बचने के लिए झोंपड़ी के पीछे बैठा था । बेचारा बाघ बारिश से घबराया हुआ था । बुढ़िया की बात सुनते ही वह और डर गया ।

 

अब टिपटिपवा कौन-सी बला है ? ज़रूर यह कोई बड़ा जानवर है । तभी तो बुढ़िया शेर-बाघ से ज़्यादा टिपटिपवा से डरती है । इससे पहले कि बाहर आकर वह मुझ पर हमला करे, मुझे ही यहाँ से भाग जाना चाहिए । बाघ ने ऐसा सोचा और झटपट वहाँ से दुम दबाकर भाग चला ।

 

उसी गाँव में एक धोबी रहता था । वह भी बारिश से परेशान था । आज सुबह से उसका गधा गायब था । सारा दिन वह बारिश में भीगता रहा और जगह-जगह गधे को ढूँढ़ता रहा लेकिन वह कहीं नहीं मिला ।

 

धोबी की पत्नी बोली जाकर गाँव के पंडित जी से क्यों नहीं पूछते ? वे बड़े ज्ञानी हैं । आगे-पीछे, सबके हाल की उन्हें खबर रहती है ।

 

पत्नी की बात धोबी को जँच गई । अपना मोटा लट्ठ उठाकर वह पंडित जी के घर की तरफ़ चल पड़ा । उसने देखा कि पंडित जी घर में जमा बारिश का पानी उलीच-उलीचकर फेंक रहे थे ।

 

धोबी ने बेसब्री से पूछा महाराज, मेरा गधा सुबह से नहीं मिल रहा है । ज़रा पोथी बाँचकर बताइए तो वह कहाँ है ?

 

सुबह से पानी उलीचते-उलीचते पंडित जी थक गए थे । धोबी की बात सुनी तो झुँझला पड़े और बोले मेरी पोथी में तेरे गधे का पता ठिकाना लिका है क्या, जो आ गया पूछने ? अरे, जाकर ढूँढ़ उसे किसी गढ़ई-पोखर में ।

 

और पंडित जी लगे फिर पानी उलीचने । धोबी वहाँ से चल दिया । चलते-चलते वह एक तालाब के पास पहुँचा । तालाब के किनारे उँची-उँची घास उग रही थी । धोबी घास में गधे को ढूँढ़ने लगा । किस्मत का मारा बेचारा बाघ टिपटिपवा के डर से वहीं घास में छिपा बैठा था । धोबी को लगा कि बाघ ही उसका गधा है । उसने आव देखा न ताव और लगा बाघ पर मोटा लट्ठ बरसाने । बेचारा बाघ इस अचानक हमले से एकदम घबरा गया ।

 

बाघ ने मन ही मन सोचा लगता है यही टिपटिपवा है । आखिर इसने मुझे ढूँढ़ ही लिया । अब अपनी जान बचानी है तो यह जो कहे, चुपचाप करते जाओ ।

 

आज तूने बहुत परेशान किया है । मार-मारकर मैं तेरा कचूमर निकाल दूँगा ऐसा कहकर धोबी ने बाघ का कान पकड़ा और उसे खींचता हुआ घर की तरफ़ चल दिया । बाघ बिना चूँ-चपड़ किए भीगी बिल्ली बना धोबी के पीछे-पीछे चल दिया । घर पहुँचकर धोबी ने बाघ को खूँटे से बाँध दिया और सो गया ।

      

सुबह जब गाँव वालों ने धोबी के घर बाहर खूँटे से एक बाघ को बँधे देखा तो उनकी आँखे खुली की खली रह गईं ।

 

लोककथा 

साधनों की चिंता ही जीवन की सफलता का महामंत्र है - विवेकानंद

आपकी प्रतिक्रिया

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, संजीव ठाकुर, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

Google
WWW http://www.srijangatha.com