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प्यार
स्वतंत्र साम्राज्य है |
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डॉ. पूरन सिह
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“प्यार
पूजा है, प्यार वंदना है, अर्चना है, समर्पण है, इबादत है,
भगवान का दूसरा नाम ही प्यार है। प्यार धर्म,
समप्रदाय,राष्ट्र या जाति के बंधन से दूर का एक स्वंतत्र
साम्राज्य है, प्यार में कब वासना है..... तृप्ति की कब
साधना है....प्यार में प्रतिकार कब है.....बस जलन की भावना
है। प्यार गुनाह नहीं है ।.....मैं हर सच्चे प्यार करने
वाले को नमन करता हूँ ।”
इतना कहकर प्रो.जी.के. पाठक ने अपना स्थान ग्रहण कर लिया
था । उसके बाद कुछ और लोग बोले थे तत्पश्चात् जवाहर लाल
नेहरू डिग्री कॉलेज का वार्षिकत्सव सम्पन्न हो गया था।
कॉलेज के छात्र
प्रो. पाठक का पहले ही बहुत सम्मान करते थे अब उनके आगे
सिर झुकाने लगे थे । इसी कॉलेज में उनकी बेटी श्रद्धा भी
एम.ए. प्रथम वर्ष की छात्रा है।
शाम को प्रो.
पाठक अपने स्टडीरूम में बैठे पढ़ रहे थे तभी श्रद्धा ने
पापा से कहा था,
“पापा”
“जी
बेटा”
प्रो. पाठक ने बेटी के प्यार का उत्तर भी प्यार से दिया था
“पापा,
मैं किसी से प्यार करती हूँ।”
“किससे
?”
“हमारे
ही कॉलेज के दीपक सागर से। वही, पापा
जिसने पिछले साल बी.ए. में टॉप किया था । इस साल वह
एम.ए.अंगरेज़ी से प्रथम
वर्ष में पढ़ रहा है”
बेटी का उत्साह हिलोरें मार रहा था।
“पापा
आपने ही तो कहा था कि प्यार धर्म, सम्प्रदाय,जाति, राष्ट्र
के बंधन से दूर का एक स्वतंत्र साम्राज्य
है......पापा....मेरी बात समझने की कोशिश करो...प्लीज पापा
.....। आपकी आज कॉलेज की बातें सुनकर ही मैंने हिम्मत की
है।”
बेटी ने पापा को समझाने का प्रयास किया था।
प्रो.पाठक ने
बेटी को पास बुलाया और उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए
पुचकार कर कहा था- जैसा मेरी बेटी चाहेगी वैसा ही होगा ।”
बेटी खुश हो
गई थी और अपने कमरे में चली गई थी। उसने ममी को नहीं देखा
था। आज उसे पापा में ममी दिखाई देने लगी थी।
प्रो. पाठक कुछ
देर सोचते रहे फिर उठे और अपनी बेटी श्रद्धा के कमरे में
चले गए थे। बेटी सो रही थी। प्रो.पाठक रसोई में लौट आए ।
बेटी के लिए एक गिलास दूध तैयार किया। पुनः वापिस बेटी के
पास गए थे । बेटी को जगाकर, दूध से भरा गिलास दिया था ।
शायद आज मिसेज पाठक की कमी पूरी करने का मन कर रहा था
प्रो. पाठक का । बेटी ने दूध से भरे-गिलास को एक ही साँस
में पी लिया था। श्रद्धा पुनः सो गई थी।
अगले दिन, सुबह
श्रद्धा नहीं उठी और अगले दिन ही क्या वह तो आज तक भी
नहीं उठी । शायद वह प्यार के स्वतंत्र साम्राज्य में चली
गई थी जहाँ न कोई जाति बंधन था और न कोई धर्म, सम्प्रदाय
तथा राष्ट्रबंधन ही ।