रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

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लघुकथा

 
कृष्णावतार

कालीचरण प्रेमी

चेडू दोपहरी में दिशा-मैदान के लिए ज्वार के खेत में घुसा तो उसे कुछ विचित्र-सी फुसफुसाहटें सुनाई दी। उनके कान खड़े हो गए। वह आहट लेता हुआ पास पहुँचा ! अचानक वह बुरी तरह चौंक पड़ा। ज्वार के बीच खेत में हरखू चमेली को संग पड़ा था । खचेडू कुछ देर तक स्तब्ध-सा खड़ा देखता रहा ।

 

बहाईनचो.....हरखू के बच्चे ! चमेली के साथ ये कुकर्म ? साले शर्म नहीं आती ? ......अपनी माँ-बहन को..... खचेडू भभकने लगा।

 

हरखू और चमेली दोनों सहमकर खड़े हो गए । वे इस अप्रत्याशित स्थिति के लिए तैयार नहीं थे। अतः घबरा गए ।

 

भैया ! भैया खचेड़ू !” हरखू गिड़गिड़ने लगा- देख तू तो मेरे भाई समान है ..मेरा ज़िगरी दोस्त ।....जो कुछ तूने देखा है, किसी से कहना मत.....नहीं तो बखेड़ा हो जाएगा...देख मेरी इज्जत का सवाल है।....

 

खचेडू ने स्थिति का जायजा लिया । फिर बोला, अच्छा, तू खैर चाहता है तो भाग जा यहाँ से ....और सुन ! ....चमेली को यहीं छोड़ जा...बस जा...जल्दी भाग ।

 

हरखू तो गाँव की तरफ भाग गया पर अब खचेडू चमेली के साथ ....।

 

 

लघुकथा 

साहस गया कि आधी समझदारी उसके साथ गई - धम्मपद

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