रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

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कविता

 

 अमेरिका से बिंदु भट्ट की कविताएँ

खुला दरवाजा अन्तर्मन का

 

छोटे-छोटे दुखों की बुंदे

भरती रही थी

मैं इन आँखों में -

बांध रखा था कब से, जाने

इन पलकों के दायरे में -

छलकने दिया था कभी

भूलकर भी,

और

आज अचानक स्नायु बन्धन खुल गये

निकल पड़ी अनवरत अश्रुधार -

बह चली व्यथाएँ

भीगा वक्षस्थल

गल गयी जमी- जमी सी ये भावनाएँ

खुला दरवाजा अन्तर्मन का

जैसे उगा सूरज

बिछ गया मेरे सामने

मेरा पन्थ निर्मल  ।

 

अगर रावण न होते

रावण होते

होतीं लक्ष्मण रेखाएं

जगती सुवर्ण मृग की लालसाएं

होते अपहरण सीताओं के

जलाई जातीं लंकाएं

होते राम- रावण युद्ध

होतीं अग्नि परीक्षाएं

न होते वाल्मिकी, तुलसी

न रचे जाते रामायण

न होतीं राम कथाएं

 

रागिनी  

टेढ़ी मेढ़ी रेखाएं

फिर अक्षर

फिर शब्द

फिर पंक्ति

फिर पंक्तियां

और सब कुछ

जैसे अनोखा हो जाय

रागिनी मे

अभिव्यक्त हो जाय !

 

मेरा लक्ष्य

 

कई भटकनों के बाद

पायी है पगडंडी

जो छोड़ गयी

मुझे

गलियों तक-

गलियों से गुज़र कर

मिली है

सड़कों की गुत्थी

जिसे सुलझाकर

पायी है

मुख्य सड़क

और

दूर कहीं उस छोर पर

दॄश्यमान हो रहा है

मेरा निर्दिष्ट

मेरा लक्ष्य  ।

 

वह कौन है जो प्रश्न कर रहा है?

एक प्रश्न-

बस एक प्रश्न,

और उसे सुलझाने में

उलझ जाती हूँ

अनेकानेक प्रश्नों से

और

हर प्रश्न बना डालता है

अपनी अपनी

प्रश्नों की एक गुत्थी

प्रश्नों की इस बाढ़ में

डूबने से बचने को छटपटाता

मेरा यह मन

बच कर किनारे पर लग आता है तब

जब सब कुछ

बस एक प्रश्न पर कर रूक जाता है

बस एक प्रश्न कि

वह कौन है जो प्रश्न कर रहा है?

 

 

कविता 

निश्चय ही शरीर सर्वश्रेष्ठ धर्म साधन है - कालिदास

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