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कहाँ से आ गई रोशनी की यह नाज़ुक लकीर अँधेरे की सलवटों को कंपकंपाती किस की यह पग ध्वनि कि अँधेरा अर्रा कर टूटता तार-तार होता कैसी यह धुन, ताल-लय कि नर्तकी के पैरों के जादू से खुलती जातीं जंग-खाई चिटखनियाँ और दरवाज़े चट्टानों को फोड़ फूटती हरियाली देखो तो, लहराती ओढ़नी का कमाल घेर लीं दसों दिशाएँ और पूरा मंच ! नरेन्द्र मोहन
आसमानी दृश्य : ज़मीनी भूमिका है तो गंगा - घाट पर नियान लाइट की तेज रोशनी तेजतर रोशनी आगे भी लेकिन गंगतीर से उठने से पहले हम चाँद के बादलों के आटोप से बाहर निकलने की प्रतीक्षा करते हैं मानो हम चाँद को बादलों के बीच गुम छोड़कर नहीं जा सकते मानो आसमानी दृश्य में हो हमारी भी कोई ज़मीनी भूमिका यकीनी भूमिका ज्ञानेन्द्र पति
जरूरी था जो सब समेट लिया उसने । छोटी-छोटी गठरियों में समा गया घर और रख दिया गया ठेले पर । जो बचा रह गया उसका उसे बिल्कुल ही मोह नहीं था वह वहीं छूटने के लिये बचा था । वह बचा था तो वहां बसा रह गया था थोडा़ बहुत घर भी थोड़े बहुत दिनों के लिये और । बच्चे या भिखारी इस बचे हुये घर को उठा ले जायेंगें । यह नई जगह है और अब यहां इन्हें बसना है । गठरियों में समा गया था जो घर उसके आईने भर टुकड़े ने अपने लिये कील ठोंक ली थी ।
कपड़ो ने बना ली थी अपनी जगह रस्सियों पर टीन कनस्तर भी पहले की ही तरह जब गये थे साथ लाये पाटे पर एक खाट थी उसे तो कोने में ही रहना था वह अपनी जगह को लेकर निष्फिक्र थी । उस मजदूर परिवार के चेहरे पर न उजड़ने का दुख था न फिर से बसने का सुख उनेक लिये हर जगह घर थी पर कहीं नहीं था उनका अपना घर ।
वे जानते हैं उन्हें इसी तरह से जीना है वे इसी तरह से जीते आये थे । राजेन्द्र ओझा
अंडमान के नारियल से लदे वृक्षों मैं आऊंगा अंबर्डीन, बिल्लीग्राउंड बम्बूफ्लाट, मीठाखाड़ी, हाथीटापू, जंगलीघाट डिगलीपुर, हैडो, गोलघर, चाथम और सीपीघाट के तबाह घाट मैं फिर आऊंगा।
ओ नन्हीं और लम्बी छिपकलियों । दूर देष से मैं फिर आऊंगा, मेरी बांह जितनी लम्बी तरोई, करेले और नीम और नारियल और मिर्ची ओ समुद्र ! मैं फिर आऊंगा ।
ओ ! स्टोव पर घर भर का खाना बनाती औरत ओ ! पेड़ को काटकर नाव बनाते मल्लाह ओ ! छतरी लेकर समुंदर में जाल फैलाए मछुआरे और उनके हाथ न आती मोटी मछलियों मैं आऊंगा ।
साफ सुबह के आसमान साफ सुबह के पेड़ों और पहाड़ों मैं फिर आऊंगा।
ओ बूढ़े हज्जाम । केरल के एक गांव में शताब्दियों पहले आए मैं फिर आऊंगा अगली शताब्दी में तुम्हीं से अपने बाल काले कराऊंगा ।
मुझे पहचाना । मुझे भूल न जाना । ओ नन्हीं छिपकली मैं फिर आऊंगा । राजेन्द्र उपाध्याय
सूर्य की आभा-सी दमकती सुबह मंदिरों की घंटियों में उतरता स्तवन धूप और कपूर के गंध में नहाई अगरबत्ती के सुगंधित धुएँ-सी लहराती चुपचाप अपने सुनहरे पंखों को फैलाये घाट की सीढ़ियों पर धीरे-धीरे चढ़ती है अपूर्व सौंदर्य की प्रतिरूप सुबह सुनती है तबले की थाप घुँघरू की छन-छन सुरों में नाचते स्वर बाँसूरी की तान जो किसी ऊँची इमारत के किसी झरोखे से आती है छनकर धीरे-धीरे और फिर झिलमिलाती गंगा के पानी को हलके से थपथपा देती है जहाँ रात के अलसाये झपकी लेते नाविक कुनमुनाकर उठ उठ जाते हैं । बासु कुमार
पेड़ की आकांक्षा बीज है और बीज का सपना पेड़
हम अपने होने से पहले ही होना चाहते रहे न बीज हुए न पेड़ बने
हम जब कभी हुए ही नहीं तो होंगे कैसे और जब होंगे कभी तब ही हुए कहलाएँगे । महाराज कृष्ण संतोषी
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