रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

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कथोपकथन

पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी से बातचीत

सामयिक साहित्य समाप्त होगा, न कि शाश्वत साहित्य

 डॉ. रामनारायण मधुर

(चार दशक पूर्व लिया गया एक आत्मीय साक्षात्कार)

        5 जून 1965 को जब मैं आचार्य पं हजारी प्रसाद द्विवेदी के निवास स्थान (दुर्गाकुण्ड, वाराणसी) पर इंटरव्यू के लिए समय निश्चित करने के निमित्त पहुँचा तो वहाँ दो सज्जन और बैठे हुए थे, एक जबलपुर के हिन्दी प्रेमी, दूसरे काशी विद्यापीठ के प्राध्यापक । उन लोगों की बातचीत में व्यवधान डालकर, दाल-भात में मूसरचंद की तरह मैं कमरे में दाखिल हो ही गया, बाहर प्रतीक्षा कब तक करता। मुझे देखते ही पंडितजी बोल उठे। आओ-आओ, बैठो तुम तो भागलपुर में हो न ?

        जी नहीं, अब मैं नर्मदा पोस्ट ग्रेटुएट कॉलेज, होशंगाबाद में चला आया हूँ, भागलपुर तो कभी का छोड़ दिया ।

        पंडित जी हंस पड़े । लगा जैसे शीतल शुभ्र चाँदनी जैसी तरलता प्रकोष्ठ भर में फैल गई हो। बोले- बड़ी लम्बी छलाँग मारते हैं । काशी से भागलपुर, भागलपुर से होशंगाबाद । फिर गंभीर  हो गये । उन्होंने दोनों सज्जनों से मेरा परिचय कराया ।

 

        बातचीत के दौरान पता चला कि आजकल वे पुनर्नवा नामक ऐतिहासिक उपन्यास की सृष्टि कर रहे हैं । मैंने पूछा-पुनर्नवा', बाणभट्ट की आत्मकथा और चारुचंद्र लेख की ही परंपरा में होगा ? पहले उन्होंने शीर्षक के बारे में बताया कि इसका नाम केवल पुनर्नवा मात्र ही नहीं होगा बल्कि पुनर्नवा जिसमें व्योमकेश शास्त्री की भूमिका नहीं दी जा सकी इतना होगा । कल्पना वाले उसे धारावाहिक रूप से छापने के लिए तैयार हैं । उसके (कल्पना) सम्पादक का पत्र भी आया था, जिसमें उन्होंने लिखा था कि क्या व्योमकेश शास्त्री आप से नाराज हैं, कि भूमिका लिखने के लिए तैयार नहीं हो रहे हैं ? और क्या भविष्य में भी उनके प्रसन्न होने का कोई उपाय नहीं है ? मैनें उन्हें उत्तर दे दिया- इस समय तो नाराज ही हैं, भविष्य की बात भविष्य ही जाने। कहना नहीं होगा कि व्योमेकश शास्त्री पंडित जी का ही छद्म नाम है और इसी नाम से उन्होंने बाणभट्ट की आत्मकथा एवं चारूचंद्र लेख की भूमिका लिखा है । कल्पना के संपादक ने उनसे उक्त प्रश्न करके मज़ाक किया था । फिर उन्होंने मेरे प्रश्न का उत्तर दिया पुनर्नवा, बाणभट्ट की आत्मकथा एवं चारुचंद्र लेख की परंपरा में नहीं होगा । पात्र काल्पनिक रहेंगे, वातावरण ऐतिहासिक रहेगा । उपन्यास पुनर्नवा नाम से प्रकाशित हुआ है ।

 

        इसके बाद अपनी-अपनी अरज-गरज गाकर वे दोनों सज्जन चले गये । छूटते ही मैंने कहा मैं आपसे इंटरव्यू के लिए समय माँगने आया हूँ ।

        क्या पूछोगे भाई, अब मैं परीक्षा देने के योग्य नहीं रहा । पास होऊँगा या फेल कह नहीं सकता । फिर उनकी अट्टहास भरी निश्छल हँसी । बहुत कहने-सुनने के पश्चात तब जाकर वे राजी हुए ।

 

        सात जून को प्रातःकाल सात बजे मैं उनके अध्ययनकक्ष में दाख़िल हुआ । वे मेरी प्रतीक्षा कर ही रहे थे । बैठा ही था कि एक बड़ा प्यारा-सा भोला-सा धवल खरगोश आकर कमरे में घूमने लगा । कमरे में जब नौकर झाडू लगाकर चला गया तो वे अख़बार नीचे रखकर मेरी ओर मुख़ातिब हुए और बोले पूछो, क्या पूछना है?” तब मैने प्रश्न पूछना प्रारंभ किया और उन्होंने उत्तर देना । प्रश्नोत्तर इस प्रकार हैं:-

 

आप साहित्यकार कैसे बने ?

लिखते-लिखते बन गया । बचपन से ही साहित्य में रूचि रही, अध्ययन मनन करता रहा और फिर अच्छे लोगों के संपर्क में आया । सबसे बड़ी बात तो साहित्यकार के अतिरिक्त कुछ बन ही नहीं सकता था ।

 

आपके साहित्यिक प्रेरणा के स्त्रोत क्या हैं ?

अच्छे साहित्य और अच्छी भाषाओं में जो कुछ अच्छा मिलता है, पढ़ता, देखता हूँ, उससे प्रेरणा मिलती है । सदैव मेरा यह प्रयत्न रहता है कि जिस साहित्य का मैं आनंद उठा रहा हूँ और लोग भी उसका आनंद लें । संस्कृत, हिंदी, अंगरेज़ी के ग्रंथों से, लोगों की बातों से और सत्संग से भी प्रेरित हुआ हूँ ।

 

आप रवि बाबू से कहाँ तक प्रभावित हैं ?

उनके संबंध में बहुत कुछ लिख चुका हूँ । उनसे बहुत कुछ पाया है, बहुत कुछ सीखा है । मेरे पास जो कुछ है, उन्हीं का प्रसाद है । उनके व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हूँ । मैंने उनका स्नेह पाया है । उनके साहित्य से मुझे बहुत प्रेरणा मिली है और मिलती रहती है, उन्हें मैं साहित्य संसार की बहुमूल्य निधि मानता हूँ ।

 

साहित्य एवं जीवन के बदलते हुए प्रतिमानों को ध्यान में रखकर लोग शंका उठाने लगें हैं कि अब यही हाल रहा तो शरद और रवि बाबू का भविष्य में क्या स्थान होगा ? आपके क्या विचार हैं ?

मेरा तो यह विचार है, कि जो उत्तम साहित्य है वह बना ही रहेगा, लोगों का मन आकृष्ट करता ही रहेगा । मुझे तो कोई शंका नहीं होती, अच्छा साहित्य कभी तिरस्कृत नहीं होगा । आजकल जो चीज़े चल रही हैं, वह स्थायी नहीं हैं । अच्छे साहित्यकारों को कुछ कहने का मौका देकर वह स्वयं समाप्त हो जायेंगी । सामयिक साहित्य समाप्त होगा, न कि शाश्वत साहित्य । रवि और शरत बाबू का साहित्य शाश्वत साहित्य है ।

 

हिंदी का नवलेखन क्या उपेक्षित है ? हाँ, तो उसे प्रतिष्ठित कैसे किया जा सकता है ?

सारी भाषाओं का नवलेखन पहले उपेक्षित रहता है, फिर स्थान ग्रहण करता है । कभी कालिदास को भी अपने बारे में सोचना पड़ा था । सच तो यह है कि जब नया लेखक, नया साहित्यकार आता है, तो उसकी बात देर में समझ में आती है । कम लोग होते हैं, जो नयी प्रतिभा को पहचान पाते हैं । बर्नाड शा जब नये थे तब उनकी भी उपेक्षा की गई थी । जानबूझकर कोई उपेक्षा नहीं करता । उन्हें पहचानने में थोड़ी देर लगती है ।

      कभी कहा गया है नवलेखन का यदि परिचय रहा तो अवश्य प्रतिष्ठा होगी । अभी मेरे पास एक ऐसा लड़का आया था, जिसे मैं चार-पाँच वर्षों से जानता हूँ । किन्तु कल ही जान पाया कि वह एक अच्छा कवि भी है । हिंदी में बहुत लिखने वाले हैं किन्तु साहित्यिक पत्रिकाओं की कमी है । जो नयी निकलती हैं, वे शीघ्र ही समाप्त हो जाती हैं । प्रतिष्ठित पत्रिकाएँ विशेष लोगों की और विशेष रूचियों से संबंधित हैं, जहाँ नये लेखकों की दाल नहीं गल पाती । फिर भी नवलेखक को निराश होने की कोई बात नहीं । प्रतिभा होगी तो उसका अवश्य सम्मान होगा ।

            “जो संत हैं, अच्छे हैं, वे परी7 करके देखते हैं, तब निर्णय करते हैं । वे नया और पुराना का ख़्य़ाल नहीं करते । जो मूढ़ हैं, वे दूसरे के विश्वास से परखते हैं । उनकी बुद्धि दूसरों की रहती है, युग के सभी कवियों और लेखकों का यही अनुभव रहा है । बहुत से तो ऐसे साहित्यकार होते हैं जिनका जीवन भर मूल्याँकन नहीं हो पाता ।

 

नयी कवित एवं  ‘नयी कहानी से आप क्या समझते हैं, इसके चलते क्या पुरानी कविता और पुरानी कहानी का कोई मूल्य नहीं रहा ? और ये नाम क्या उपयुक्त हैं ?

जो पुराने मूल्य हैं, वे ठीक हैं । आज बिहारी-सतसई, लिखकर कोई प्रतिष्ठा प्राप्त करना चाहे तो नहीं कर सकता है । आज नव चेतना एवं नवजागरण की लहर फैली हुई है । नये-नये प्रयोग हो रहे हैं । तुलसी की रामायण तो बहुत प्रतिष्ठित है । परंतु आज कोई उस तरह की रामायण लिखे तो उसे भी प्रतिष्ठा नहीं मिलेगी । कहने और लिखने के ढ़ंग में परिवर्तन हुआ है । पुरानी चीज़ें तो प्रतिष्ठित हैं ही, उनका मान कहाँ घट रहा है । अपभ्रंश का एक पुराना दोहा है

पिऊ, एम्बहि कर सेल्लु करू, छंडहु तुहुं कर वालु ।

जिवें कावालिय बप्पुरा, रचेहिं अभग्गु कवालु ।।

 

इसे मैंने नये ढ़ंग पर इस तरह कर दिया है

 

पिय अगिहर आटम तजहु कसि कसमिक कर लेहु ।

सरजन जन जातें लहहिं नित अगनित मृत देहु ।

 

       नये और पुराने का अंतर इन दो दोहों से स्पष्ट हो जायेगा । पहले मृतकों की आवश्यकता कापालिकों को होती थी, अब सरजनों (डॉक्टरों) को होती है । मैंने भी दोहा, श्लोक, छंद चौपाई बहुत बनाया है । कोई पूछता तक नहीं । बहुतों को छंद मिलता है तो विषय नहीं, विषय मिलता है तो छंद नहीं । मुझे भी नहीं मिलता, वाल्मीकि को दोनों मिला था । वाक्य के पीछे-पीछे अर्थ आना चाहिए । अर्थ ही नयी कविता मे प्रमख हो गया है । सीधे चलना है तो नाचकर क्यों चलते हो । गद्य लिखना है तो पद्य क्यों लिखते हो । अर्थ भार है, अर्थ भार हीन गीत है, अर्थभार संयुक्त का नाम कविता है ।

 

कुछ लोगों को कहना है, कि हिंदी साहित्य एवं संस्थाओं में राजनीतिक दाँव-पेच काम कर रहे हैं, क्या हमारे लिए यह शुभ है ?

राजनीति नीचे खींचती है । राजनीति का अर्थ है, स्वार्थ, जिसमें आदर्श नहीं, त्याग नही, ग्रहण ही मुख्य है । यदि हिंदी साहित्य और संस्थाओं में स्वार्थ आया तो उनका पतन हो जायेगा । धरती जड़ वस्तु को नीचे खींचती है । जहाँ चेतना और प्राज्ञ तत्व प्रमुख होगा, धरती उसे नहीं खींच सकती । किन्तु आज धरती का ही आकर्षण प्रमुख हो गया है । जिसे हम तमोगुण कहते हैं ।

 

हिंदी के साथ-साथ अंगरेज़ी भाषा को भी रखना क्या भारत के लिए हितकर है ?

व्यवहार की भाषा अपनी होनी चाहिए । फिर भी अंगरेज़ी तथा अन्य भाषाओं का ज्ञान अपेक्षित है । अंगरेज़ी का विपुल साहित्य है जो ज्ञान के लिए आवश्यक है । प्रतिदिन के कार्यों एवं शिष्टाचारों में अपनी भाषा को भी महत्व देना चाहिए । अंगरेज़ी का ज्ञान इतना अवश्य हो कि उसको पढ़कर रस ले सकें । कोशिश करना चाहिए कि अंगरेज़ी का ज्ञान बना रहे । आजकल तो अंगरेज़ी की पढ़ाई व्यर्थ है, पढ़ने वाले अपने को खो देते हैं । अभी तक वे पढ़ते नहीं, बल्कि रटते रहे हैं । जब अपनी भाषा पर अधिकार होगा तभी अंगरेज़ी पर भी अधिकार हो सकेगा । अंगरेज़ी केवल उच्च शिक्षा के लिए आवश्यक है, उसे सब पर लादना व्यर्थ है ।

 

 

 कथोपकथन

विजय और पराजय का क्षेत्र संसार है, निर्जन नहीं है - भगवतीचरण वर्मा

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