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ग़ज़ल
जिंदगी में हमारे साथ चलेगी - वशीर बद्र |
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विजय वाते के साथ बातचीत |
विजय वाते :
हिन्दी कविता के वर्तमान परिदृश्य में ग़ज़ल का अपना एक
मकाम बन चुका है, यह छंद अब हिन्दी में अत्यन्त लोकप्रिय
हो गया है। अनगिनत लोग ग़ज़लें लिख रहे हैं
तथा कथ्य की
नवीनता और भाव की सहजता के लिहाज से हिन्दी ग़ज़लें सराही
भी काफी जा रही हैं। लेकिन अब भी उर्दू वाले इसको, उर्दू
ग़ज़ल के समकक्ष दर्जा देने के अनच्छुक लगते हैं। क्या आप
भी ऐसा ही सोचते हैं
?
वशीर बद्र
: मैं भी हिन्दी का शायर हूँ, हिन्दी में भी ग़ज़लें
लिखता हूँ इसलिये बेहतर हो कि आप यह सवाल मुझसे न पूछकर
किसी खालिस उर्दू ग़ज़लकार से पूछें।
विजय वाते :
दरअसल आप हिन्दी ग़ज़ल के वह शायर हैं, जिसको उर्दू
ग़ज़ल पर भी पूरी पकड़ और महारत हासिल है।
बशीर बद्र
: शुक्रिया । ऐसा तो नहीं है, लेकिन मैं आज की भाषा
का शायर हूँ, जो दो लिपियों, हिन्दी और उर्दू में लिखी
जाती है। यकीनन हिन्दी में बहुत उमदा और समर्थ ग़ज़लें
लिखी जा रही है और उर्दू वालों का यह ऐतराज भी सभी के
लिए
नहीं है, बल्कि ऐसे लोगों के लिए हैं, जो हिन्दी ग़ज़ल के
प्रयोग करते हुए रदीफ काफियें और बहर की पावंदी को नहीं
जानते । यदि ऐसा ही दोष कोई उर्दू में करता है, तो उस पर
भी एतराज किया जाता है। हिन्दी लिपि में लिखकर भी जो इन
पाबंदियों को जानते और मानते हैं, उन पर कतई एतराज नहीं
किया जाता।
ग़ज़ल में बहर
की पावंदी बहुत जरूरी है। आज जो हिन्दी लिपि की ग़ज़लें
लिखी जा रही है, उनमें अक्सर अच्छे शेर बहर में होते हैं।
सुनते ही जो शेर बहर में न लगे वो ग़ज़ल का शेर कभी नहीं
माना जा सकता । पुरानी उर्दू ग़ज़ल के काफियों में ईता के
नाम से जो ऐब बताया जाता था, उससे पाबंदी हिन्दी
में इसलिए
कम होगी कि उर्दू के अक्षर में, स्वाद सीन के काफिये एक
ग़ज़ल में नहीं बन सकते लेकिन हिन्दी लिपि में यह सब
‘स’
के अक्षर से बनाये जाते हैं, जो बिन्कुल सही भी है। इसी
तरह उर्दू में जाल स्वाद पर खत्म होने वाले शब्दों में
ग़ज़ल के काफिये नहीं हो सकते, लेकिन हिन्दी में ज के नीचे
बिंदी रख देने से यह सब काफिये बन जाते हैं। खुशी की बात
यह है कि पाकिस्तान की ग़ज़ल में भी काफिये बनने लगे हैं,
अगरचे यह चलने अभी आम भाषा
सुनने में हिन्दी और उर्दू के
फर्क को खत्म करती है। और अंग्रेजी से आये हुए शब्दों को
जिसने हिन्दी और उर्दू में अपना मान लिया है।
विजय वाते :
क्या फर्क केवल भाषा का है।
वशीर वद्र
: नहीं, इमेजेस का है। आज की ज़िंदगी की इमेजेस, हमारे
घर, घर के सामान, पहनने के कपड़े ऑफिस, रेलवे स्टेशन, बस
स्टेंड, रेडियो, टी.व्ही., कालेज, स्कूल बाबत सबकी पहचान के
लिए, जो शब्द इस्तेमाल होते हैं, मैं उन शब्दों को अपने
देश का शब्द मानता हूँ, यह अंगरेज़ी से भी हमारे यहाँ आये
हैं। और भी शब्द हैं जैसे स्कूल, कॉलेज, ट्रेन, बस, टी.वी,
रेडियो, दरबार, मयखाना, बुक, यूनिफार्म, पेंट, शर्ट आदि ।
यानी आज की ज़िंदगी के आधे से ज्यादा जो संज्ञा वाचक शब्द
हैं वे सब अब हिन्दी हैं, सब उर्दू भी हैं । यद्यपि 100
साल पहले के रहन-सहन, पहनने-ओढ़ने के सारे शब्द ग़ज़ल से
निकाले नहीं गये है, लेकिन वो कम जरूर हो रहे हैं । अब
सिर्फ उन्हीं तक गजल को सीमित रखना, ग़ज़ल को इतनी छोटी
दुनिया देना है कि जहाँ सिर्फ गाने वाली ग़ज़ल लिखी जा सकती
है ।
विजय वातेः
लेकिन ग़ज़ल को लोकप्रिय तो गाने वालों ने ही किया है । ग़ज़ल
का म्यूजिक 100 साल पहनने-ओढ़ने वाले शब्दों तक ही सीमित
क्यों है
?
बशीर बद्रः
हाँ । ये ज़रा सोचने की बात है कि हिन्दी चलन वाले घरानों
से आये हूए मशहुर ग़ज़ल सिंगर जैसे- जगजीत, पंकज, उधास, अनूप
जलोटा, अशोक खोसला, राजेन्द्र मेहता, नीता मेहता सब
बोलचाल
की ऐसी ही खूबसूरत गुनगुनाती ग़ज़लें
चुनते हैं, उनमें अंग्रेजी से आये हुए या हिन्दी और उर्दू
शब्दों का इस्तेमाल करने वाली कोई ग़ज़ल नहीं होती । न मैं
एतराज कर रहा हूँ, न मशवरा
दे रहा हूँ, जो लोग ग़ज़ल का म्यूजिक समझते हैं, उनमें यह
कैसे कहा जा सकता है कि आप कैसे
शब्दों वाली ग़ज़ल गायें। फिर भी मैं समझता हूँ कि साहित्य
में जिन्दा रहने वाली ग़ज़ल फिलहाल चाहे न गाई जा रही हो,
10-20 साल बाद ग़ज़ल के इन शब्दों का म्यूजिक लोगों के
दिलो-दिमाग से जुड़ने लगेगा। साहित्य में जिन्दा हिन्दी
वाली ग़ज़ल की भाषा, उसके मेटाफर, सिमिली और इमेजेस, पढ़ने
वाले और सुनने वाले में अपना रास्ता खुद कायम करेंगे और कर
रहे हैं। जो शायर इस बात से डरेगा कि उसकी ग़ज़ल कभी नहीं
गाई जा रही है, वह अपना नुकसान करेगा। उर्दू ग़ज़ल अभी
नहीं गाई जा रही है, वह अपना नुकसान करेगा। उर्दू ग़ज़ल
में भी सन् 1958 के आसपास से अंग्रेजी के शब्द आने लगे
हैं। जैसे-वाँन, पुलोवर, स्वेटर, रेल, बस, आफिस। तब तो ऐसा
लगता था कि ग़ज़ल के साथ ज्यादती कर रहे हैं । आज भी उर्दू
ग़ज़लों में यह शब्द एहतियात के साथ आ रहे हैं, लेकिन
हिन्दी लिपि में छपने वाली ग़ज़लों में इनका इस्तेमाल
खुलकर ही रहा है और मुझे यकीन है कि आने वाले दिनों में जो
ग़ज़ल ज्यादा दिल को छूयेगी और जिन्दगी में हमारे साथ
चलेगी, उसको सुनकर कोई यह न कह सकेगा कि ये हिन्दी की
ग़ज़ल है या उर्दू की ग़ज़ल है, बल्कि व ग़ज़ल की भाषा
वाली ग़ज़ल होगी। उसका इशारा यहाँ शैरों में दिखाई देता
है।
जब पूछ लिया
उनसे कि किस बात का डर है ।
कहने लगे ऐसे
ही सवालात कर डर है ।।
है खास खबर
आपको हो जाओ खबरदार ।
कागज पे सुधरते
हुए हालात का डर है ।।
(शेरजंग गर्ग)
मौसम
तनी गुलेलों जैसा, गिरे कबूतर जैसे दिन ।
किससे कहते घर में बाबा,
बरसे पत्थर जैसे दिन ।।
सन्नाटों की सर्द केंचुली, ओढ़ी गूँगे शहरों ने-
चहल-पहल भूले चौराहे, तपते ऊसर जैसे दिन ।
(दिनेश शुक्ल)
जब
मिले सबसे गमों की देर तक चर्चा हुई ।
और जब बिछडें तो कोई दूर तक अपना न था ।।
जिस
भरी बस्ती में उनको आज तक खोजा किया ।
वो
बहुत वीरान थी, आकाश तक अपना न था ।।
(डॉ. गिरिराज शरण अग्रवाल)
ऐसा
ही आपका वो शेर भी है-
एक
तकरीर सिर्फ काफी है,
क्या जरूरत दिया सलाई की ।
विजय वातेः
हिन्दी के कुछ अच्छे शायर...........
वशीर बद्रः
(बीच में टोकते हूए) हर शायर के यहाँ उसके अपने मिजाज होते
हैं, उससे उसकी पहचान बनती है, लेकिन सबको मिलाकर अच्छी
ग़ज़ल की पहचान बनती है । मैं यहाँ किसी का नाम नहीं ले रहा
हूँ, क्यों कि उनको पूरी तरह पढ़ने, परखने और अलग-अलग
शायरों की पहचान बताने के लिये कई वर्षों की मेहनत जरूरी
है। लेकिन साफ जाहिर होता है कि कई नये शायर नये शब्दों की
इमेजरी से नई बात कर रहे हैं, कुछ लोग ग़ज़ल की पुरानी
परम्पराओं और नई बदली हूई जुबान को खूबसूरती से मिलाकर नई
ग़ज़ल लिख रहे हैं । इस तरह नई ग़ज़ल की नई रूह सामने आ रही है
।
मसलन-
फिर हवा के साथ
में है शीत के नैजे नुकीले,
फट गया है, ताप
का अस्तर चलो चलना कहाँ है ।
(शरद सिंह)
या आपकी गजल के यह शेर-
अर्थ पर अहसास
पर, आवाज़ पर है बंदिशें,
सब तरफ
प्रतिबंध लेकिन हूक आती सी लगें ।
शेर जिसका
स्तब्धता और तीखा कर गया,
उस ग़ज़ल की आँच
मुझको दूर जाती सी लगें ।
जाती तौर पर मेरा ख्याल है कि संस्कृत, अरबी और फारसी के
बड़े शब्द जो सौ साल पहले बहुत आम थे, और
अब किताबों तक
सीमित होते जा रहे हैं, उनका चलन कम हो रहा है ।
विजय वातेः
उर्दू में बहर की पाबंदी और शब्दों के वज़न पर आप कुछ कर
रहे थे
?
बशीर बद्रः उर्दू में बहर की जो पाबंदी है उसका पूरा ख्याल हिन्दी की
अच्छी ग़ज़ल कहने वालों ने रखा है । उर्दु में भी जहाँ किसी
ग़ज़ल में कोई बहर से खारिज पंक्ति हो जाती है, उसे कुबूल
नही किया जाता । हम आज हिन्दी ग़ज़ल को कितनी भी छूट देना
चाहें, लेकिन बहर की पाबंदी, बहरहाल
होगी । हम तो कर ही रहे हैं, लेकिन आने वाले लोग और ज्यादा
परफेक्शन का ख्याल रखेंगे, ऐसा ही अच्छी शायरी में होता है। खुशी की बात ये
हैं कि हिन्दी में बहुत से शब्द ऐसे हैं, जिनका किताबी
उर्दू से अपना अलग उच्चारण, अपना अलग वज़न है जैसे - सुहाग,
शमा, फसल, माफ ऐसे सैकड़ों अलफाज़, उसमें अपने तलफ़फुज की
पाबंदी कर रहे हैं, और ऐसा ही करना भी चाहिए।
जो
शब्द हमारी ज़िंदगी में घुलमिल गये हैं, ग़ज़ल की भाषा
उन्हीं से बनती है। थोड़ी देर के लिये हमें यह भूल जाना
चाहिये कि यह शब्द संस्कृत, अरबी, उर्दू या कहाँ से आया
है। बल्कि यह देखना चाहिये कि अपने ज़माने की ओर आज की
ज़िंदगी का जो शब्द चित्र बनाते हैं और जो हमारी ज़िंदगी
की प्राबलम्स को शायराना ढंग से पेश करते हैं,
वही शब्द ऐसे आ रहे हैं, जिनसे ग़ज़ल का नया फैयाव होगा
लफ़्जों को
जिस शायराना अंजाद में बरतना चाहिए, वो खूबसूरती अब नये
लिखने वालों के अच्छे शैरों में मिलने लगी है।
हिन्दी
ग़ज़ल के असर से उर्दू ग़ज़ल और उर्दू ग़ज़ल के असर से
हिन्दी ग़ज़ल में बड़ी खूबी आती जा रही है। उसका असर
पाकिस्तानी ग़ज़ल पर भी पड़ रहा है। पाकिस्तान के एक शायर
हैं नासिर शहजाद, उनके यहाँ बहुत पहले से ऐसी ग़ज़ल मिलती
है, जिसमें हमारी पुरानी सभ्यता, मथुरा और काशी की गूँज
लाहौर की इस्लामी तहजीब से गले मिलती है। हिन्दुस्तान की
ग़ज़ल जिसमें हिन्दी और उर्दू के अलावा गुजराती,
पंजाबी, सिधी, मराठी और दूसरी भाषाओँ की ग़ज़ल शामिल है,
ऐसी ग़ज़ल होगी, जिसमें आज का हिन्दुस्तान, अपनी और पड़ौस
की मौलिक कृतियों और उसके ट्रांसलेशन के जरिये, दुनिया की
दूसरी बड़ी जुबानों को भी ग़ज़ल के करीब जायेगा।
विजय वाते
: ग़ज़ल पर आमतौर पर एकरसता का आरोप लगता है। ग़ज़ल
में पुनरावृत्ति का होना जरूरी है
?
बशीर बद्र
: जो ऐसी बात कहते हैं, वो पुरानी ग़ज़ल को भी नहीं
समझ पाते । नेचर या कल्चर की जो इमेजरी है, वो उसमें
इन्सान की बात करती है। मंजर दिखाना काफी नहीं है। उसके
पीछे इन्सान की बात होती है। यह मैं अच्छी ग़ज़ल की तरफ से
बोल रहा हूँ । पुराने गीत, दोहे,लांग पोयम इन सबमें जो
अच्छा शायर है
और जो असल की नकल बनाते हैं, उनकी शायरी में भी यकसानियत
होती है। लेकिन जो ग़ज़ल या दोहे की या गीत की भाषा समझते
है, वह ऐसा नहीं कह सकते । यह दावा करना तो गलत होगा कि आज
की ग़ज़ल कभी-कभी हद से आगे बढ़ गई है। लेकिन
आप आज कोई भी इमेजरी बताइये, कोई प्राब्लम बताइये, मैं ग़ज़ल
में उसकी तरफ इशारा कर सकता हूँ । कोई मुझसे अगर यह कहे कि
यह बात,यह ख्याल या यह मिसाल ग़ज़ल में नहीं आई है, और मैं
सोचकर भी उसको बता न सकूँ तो मेरी मालूमात में इजाफ़ा होगा
। मुझे तो यह यकीन है कि दुनिया जितनी बड़ी थी, जितनी बड़ी
है, और आगे होगी उसकी सारी झलकियाँ ग़ज़ल में कहीं न कहीं
मिलती हैं। यहाँ तक कि जो ज़िंदगी कल होगी, वह भी ग़ज़ल
में मिलने लगी है और आज जो
ज़िंदगी से मिट गया है, वह भी
ग़ज़ल में जिन्दा है। मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं ग़ज़ल की
वकालत करने लगा हूँ, लेकिन आप मेरा इम्तिहान ले सकते हैं,
अगर मैं साबित न कर सका या सोचकर भी नहीं बता सका, या अपनी
किताबें टटोलकर भी अपनी बात साबित करने को नजीर नहीं दे
सका, तो अपनी गलती सुधार लूँगा।
विजय वाते :
आप हर खासो-आम के शायर हैं। जाहिर है कि आपने कुछ शेर
अवाम के लिये कहे तो
कुछ साहित्य या
अदब के लिये
?
बशीर बद्र :
नहीं नहीं मैंने किसी खास के लिये कुछ खास नहीं कहा ।
खासो आम के मानी....
विजय वाते :
यह शब्द मैंने किसी मुहावरे के तौर पर इस्तेमाल नहीं
किया। दरअसल आपके कुछ शेरों की पहुँच 8-10 करोड़ लोगों तक
तो है ही । हाल में मैंने एक टक्रक के पीछे आपका यह शेर
लिखा हुआ पढ़ा है-मुसाफिर है हम भी, मुसाफिर हो तुम भी।
किसी मोड़ पर
फिर मुलाकात होगी।।
पाकिस्तान के वजीरे आजम जनाब जुल्फ़िकार अली भुट्टो ने
शिमला समझैते के वक्त आपका यह शेर पढ़ा था-
दुश्मनी जमकर
करो लेकिन यह गुंजाइश रहे,
जब कभी हम
दोस्त हो जायें, तो शर्मिन्दा न हों।
या फिर स्व. राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिह ने अपनी मृत्यु के
पहले कहा था-
उजाले अपनी
यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली
में ज़िंदगी की शाम हो जाये।
स्व. इंदिरा जी भी इस शेर को अपने बहुत करीब होना कहती
थीं, यों उन्हें यह पता भी नहीं था कि यह शेर बशीर बद्र ने
कहा है। और आजकल मिस युनीवर्स सुष्मिता सेन यह कहती फिर
रही हैं-
कोई हाथ भी न
मिलायेगा,जो गले मिलोगे तपाक से।
ये नये मिजाज
का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो ।।
आपके शेर नारायण दत्त तिवारी भी
अपनी तकरीर में पड़ते हैं । हिन्दुस्तान में जासूसी कर रही एक खूबसूरत जासूसा भी पढ़ती
हैं । और मीनाकुमारी भी पढ़ती रही हैं। स्कूल कालेज की
डिबेटों से लेकर नुक्कड़ पर तकरीर करने वाले कई लोगों से
मैंने यह शेर सुने हैं, इसलिये यह खासोआम वाली बात आपकी
हकीकत है, मेरा मुहावरा नहीं।
बशीर बद्र
: (बीच में टोकते हुए) यह तो शेर की किस्मत है, मेरा
क्या....
विजय वाते :
जी हाँ, यह यकीनन शैर की ही किस्मत है क्योंकि उनमें से
ज्यादातर, को पता नहीं है कि वह शेर बशीर बद्र ने कहा है।
अब मेरी उत्सुकता यह है कि क्या यह कुछ मशहूर शेर ही आपकी
अपनी भी पसंद है, या आपको अपनी सार्थकता इनसे अलग कुछ
शेरों में शेर देखें। जो मशहूर नहीं हुए हैं-
कोई कागज न था
लिफाफे में,
सिर्फ तितली का
एक पर निकला।
या
वो जाफ़रानी
पुलोवर उसी का हिस्सा है,
कोई दूसरा जो
पहने तो दूसरा ही लगे।
या
भर गया है
आस्माँ परिंदों से
पेड़ कोई हरा
गिरा होगा।
एक कंपलीट शायर के यहाँ कुछ ऐसे शेर होते हैं, होने चाहिए
जिनकी पहुँच 8-10 करोड़ लोगों तक जरूरी है। यह हाल कई
दोहों का है। मिर्जा गालिब के बहुत से शे’रों
का है। मैं नही चाहता कि आप मेरी शायरी की बात करें। लेकिन
आपकी बात के सिलसिले में मुझे किसी एक आलोचक मनोजकुमार
का एक आर्टिकल हिन्दी की ग़ज़ल के संबंध में एक किताब में
पढ़ा, याद आता है। इसमें उन्होंने मेरा एक शे’र
लिया है, जो शायद अच्छा शे’र
मानकर लिया है। मेरी यह कहने की हिम्मत तो नहीं है, फिर
भी मुझे वह अच्छा नहीं लगता, उस पर आलोचना में चर्चा हुई
है मेरी दिक्कत यह है कि क्या मैं अपने ही 20-25 मशहूर
शे’रों
के धौंस में आकर अपनी सार्थकता मान लूँ या उसमें, जो न
केवल हिन्दी बल्कि उर्दू आलोचना में भी पूरी तरह से अपनी
नुमाईश होने की बारी देख रहे हैं, क्या इस
धौंस में आकर
मैं अपने बेहतरीन शैरों को नज़र से गिरा दूँ
?
जो शे’र
हिन्दुस्तान से लेकर अमेरिका, कनाडा, तक में बसने वाले
लोगों ने पसंद किये, मौलवी के अंदाज के एक आदमी, एक ठेला
चलाने वाले या स्कूल कालेज में पञने वाले लड़के उसे पढें,
यह सुनकर खुश नहीं होते हैं, यह कहना झूठ होगा । लेकिन
मेरी हैसियत यह नहीं है कि इन्हें अपना सबसे अच्छा शे’र
कह दूँ। गाजियाबाद में एक एस.पी. साहब ने अपने दफ्तर में
पीछे यह शे’र
लगाकर रखा था.....
लोग टूट जाते
हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं
खाते बस्तियाँ जलाने में ।
मुझे अच्छा यकीनन लगा। लेकिन यह सोचना चाहिए कि यह खुशी,
कोई झूठी खुशी तो नहीं है । बाकी शे’र
क्या उस दर्जे के नहीं हैं। 10-15 शे’र
मशहूर हो जाने से
घबराहट होती है, एक खौफ़ पैदा होता है और
लगता है कि जो शे’र
मशहूर नहीं हुए, वह आलोचना तक क्यों नहीं पहुँचे
?
विजय वाते
: कुछ शे’र
करोड़ों तक और कुछ आलोचना तक भी नहीं
?
:
बशीर बद्र
: मैं बहुत अदब से कहना चाहता हूँ कि आलोचना में
लोग बहुत मेहनत नहीं करते हैं, उतनी नहीं करते हैं, जितनी
करनी चाहिए। शायद यह बात भी सही है कि वह भी मनुष्य हैं और
हजार शे’रों
में से एक शे’र
कैसा है, उसे छाँटकर विश्लेषित करना, मेहनत का काम तो है
ही । दरअसल इस के लिए कुछ तो शायरों को भी अपने शे’रों
को प्रोजेक्ट करना चाहिये । मेरा भी प्रोग्राम या हिन्दी
में, थोड़ा देखते हैं। कुछ तो तकलीफ के कारण कुछ दीगर
कारणों से आज वह प्रोजेक्शन नहीं कर पाये हैं । एक काबिले
जिक्र शायर के पास 100-50 शे’र
तो ऐसे मिलते हैं जिस पर आलोचना करने वालों को मेहनत
एवं
ईमानदारी से सोचना पड़े । यकीनन हर शायर के 100-50 शे’र
ऐसे भी होते हैं, कम से कम
मेरे तो हैं ही जो बहुत कमजोर शेर हैं और शर्मिन्दगी होती है कि वह कैसे छप गये। वास्तव
में यह खुशफहमी नहीं होनी चाहिए कि आज जो हमारे 10 शे’र
मशहूर हो गये हैं वो 200 साल बाद तक भी ऐसे ही चलेंगे ।
200 साल बाद ही पता चलेगा कि कोई हमारे शे’र
पढ़ता है या नहीं, और तभी सही किस्मत का फैसला होगा।
विजय वाते : ग़ज़ल के शे’र
में उद्धरणीयता बहुत ज्यादा होती है, खासकर आपके शे’रों
की । क्या आपकी दृष्टि में यह एक अच्छी ग़ज़ल की अनिवार्यता
है ?
बशीर बद्र : यहाँ कुछ ज़िंदगी
से डरना चाहिये । शायरी वही सच्ची और अच्छी है जो ज़िंदगी की सेवा करे। इसमे शरमाने की बात नही
है, शायरी आर्ट है और
ज़िंदगी उससे भी बड़ी आर्ट । इस
अच्छी आर्ट की जो शायरी सेवा करती है, वह ज़मीन पर होकर भी
ज़मीन की नहीं होती । उसमें ऐसा कोई ऐब भी है, तो वही उसकी
पहचान भी बन जाती है । इसलिये यदि एक शेर उद्धरित होता है
तो उसकी पहचान उनके ऐब से बाहर जाकर भी होती है । जब तक
ज़िंदगी की आर्ट को नहीं समझेंगे, तब तक शायरी के हुनर को
नहीं समझा जा सकेगा । जो उद्धरित नहीं हो रहे हैं, जो कॉमन
नहीं हैं, वह भी
ज़िंदगी और इन्सान के पास ही है । वह जो
कॉमन नहीं हुए हैं, वह कल तक कॉमन जरूर होंगे । उसकी बड़ी
अहमियत है, इसलिये जो शेर करोड़ों तक पहुँचाता है वह तो
अच्छा है ही, जो नहीं पहुँचता है वह
भी अच्छा है । जो
ज़िंदगी से जुड़ा होगा, जो
ज़िंदगी के साथ चलेगा, जो
ज़िंदगी की सेवा करेगा, वह तो उद्धरित होगा, चाहे वह
कविता हो-चाहे गीत में या दोहे में या ग़ज़ल के शेर ।
विजय पातेः अभी हाल में जज्बी साहब भोपाल आये थे, भारत भवन में म.प्र
साहित्य परिषद का इनाम लेने ।
ज़िंदगी और शायरी के इस
मुकाम पर भी उन्होंने यह कहा कि उनकी बैचेनियाँ अभी खत्म
नहीं हुई है । उन्हें जो कहना है वह नहीं कह पाये । क्या
यह बैचेनी हर शायर में जरूरी है
?
क्या आप भी ऐसा ही महसूस करते हैं
?
बशीर बद्रः हर
शायर का यह जज्बा होता है कि उसको अभी भी कुछ कहना है,
जहाँ यह समझ लिया कि उसने सब कह ल