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ग़ज़ल के गलियारे से |
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डॉ. मीनाक्षी जोशी |
“कलम
से कर कलम सर को ग़ज़ल कोई कहने से पहले
ग़ज़ल
तो रंग ए जां जिगर के खून में बनती है।”
भारतीय
साहित्य में आज जो स्थान ग़ज़ल का है वह साहित्य की अन्य
किसी विधा को नसीब नहीं । ग़ज़ल जैसी नाजुक और
तुनक
मिज़ाज विधा पर
कुछ कहने से पहले यह जानना जरूरी है कि वास्तव में ग़ज़ल
है क्या
?
अंतर्मन की संवेदनाओं को कम से कम शब्दों में प्रतीक
एवं संकेतों के माध्यम से अधिक से अधिक प्रभावशाली ढंग से
अभिव्यक्त करने की सशक्त कला का ही दूसरा नाम है
–
ग़ज़ल । उर्दू के प्रसिद्ध शायर जांनिसार अख्तर ने ग़ज़ल को
कुछ इस तरह परिभाषित किया है-
“हमसे
पूछो कि ग़ज़ल क्या है
?
ग़ज़ल का फन क्या है
?
चंद लफ्जों में कोई आग छुपा दी जाए ।”
उर्दू के ही एक अन्य शायर ने ग़ज़ल के मायने को यूँ व्यक्त
किया है-
“जख्म
सीने में छुपा कर, मुस्कुराना है ग़ज़ल
सहते-सहते दर्द, को दिल को गुदगुदाना है ग़ज़ल
।”
ग़ज़ल मूलतः अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है-‘सुखन
अज जनाना’
अर्थात नारी के सौन्दर्य का वर्णन एवं नारी से प्रेमालाप ।
कुछ विद्वानों के
मतानुसार ग़ज़ल शब्द
‘ग़ज़ाला’
से बना है। फारसी में ग़ज़ाला का अर्थ है- हिरण शावक । इस
संबंध में श्री अयोध्या प्रसाद गोयलीय के लिखते हैं
–
“ग़ज़ल
का अर्थ है इश्किया
अशआर कहना यानी वह कविता जिसमें मिलन
– विरह,
प्रेम, चाहत, कामना, आशा और निराशा का वर्णन हो । फिराक
गोरखपुरी के अनुसार ग़ज़ल का अर्थ है आर्तनाद । कालक्रम
में वह विरह
– वेदना
में परिवर्तित हो गया । डॉ. राजकुमार निजात हिन्दी के नये
तेवरों को इस प्रकार अंकित करते है-
“यदि
ग़ज़ल पायल और पीर का अंदाज है तो यह जुल्म और अन्याय करने
वालों के लिए लफ्जों का एक हथियार भी है, जो चोट करती है
तो बारूद का सा अहसास दे जाती है । सत्ता के गलियारों में
वह बंदूक की गोली की तरह प्रवेश करती है।”
ग़ज़ल में कम से कम पाँच और अधिक से अधिक ग्यारह शे'र
होते
है। इसमें पहला शेर
‘मत्ला’
कहलाता है।
‘मत्ला’
का अर्थ है- आरंभ । अगला शेर काफ़िया होता है अर्थात्
पीछे-पीछे चलने वाला । इसकी हर दूसरी पंक्ति में मत्ले
वाला रदीफ़ आता है। काफ़िये
के साथ आने वाला शब्द या शब्द
समूह, जिनका रूप अंत तक यथावत बना रहता है,
‘रदीफ़’
कहलाता है । ग़ज़ल का अंतिम शेर, जिसमें शायर अपना नाम या
उपनाम (तख्ल्लुस) का प्रयोग करता है उसे
‘मक्ता’
कहते हैं ।
‘मक्ता’
का अर्थ है कट जाना या समाप्त हो जाना। हिन्दी ग़ज़लों में
इसका उपयोग कम ही होता है।
यूँ तो ग़ज़ल का रंग आशिकाना ही होता था किन्तु अब इसकी
परिभाषा बदल गई है। हिन्दी में महाकवि निराला से लेकर आज तक
के ग़ज़लकारों ने अपनी नई प्रकृति निर्मित की और भारत की
मिट्टी की सोंधी सुगंध को प्राणों में बसाया । इस श्रृंखला
में दुष्यंत कुमार का नाम सर्वोपरि माना जा सकता है। वे
हिन्दी ग़ज़ल के शलाका पुरूष है। उन्होंने हिन्दी ग़ज़ल का
रिश्ता इकबाल और फ़ैज की शायरी से जोड़ा । दुष्यंत कुमार
की ग़ज़ल शायर के चारों ओर मौजूद दुनिया को समझने की ही
नहीं, बल्कि उसे बदलने की कोशिश है। उनके ही शब्दों में
–
“तेरे
सीने में न सही, मेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए
कोई हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि यह सूरत बदलनी चाहिए।”
दुष्यंत कुमार के बाद हिन्दी ग़ज़ल को समृद्ध करने का काम
किया कुंवर बेचैन ने । सरल सपाट भाषा का प्रयोग इनकी
विशेषता है। उन्होंने गहन अनुभूतियों के साथ कल्पना के पंख
लगाकर अपनी ग़ज़लें प्रस्तुत की। एक उदाहरण देखिए
–
“दो
चार बार हम कभी जो हँस-हँसा लिए
सारे जहाँ ने हाथ में पत्थर उठा लिए
।
रहने हमारे पास तो ये टूटते जरूर
अच्छा किया जो आपने चुरा लिए ।”
हिन्दी ग़ज़ल के तीसरे सशक्त हस्ताक्षर है, डॉ. हनुमंत
नायडू । जिन्दगी की सच्चाइयों को उन्होंने ग़ज़ल का आधार
बनाया
!
डॉ. नायडू ने प्रस्तुत ग़ज़ल में कितने मर्मस्पर्शी ढंग से
जीवन की कशिश को अंकित किया है-
“चोट
लगती थी तो पहले भी जख्म होता था
दर्द उठता था मगर पल में खत्म होता था ।
अब तो फूलों से ही मर जाते हैं जाने कितने
पहले पत्थर भी जो लगता था नरम होता था।
अब तो अपने हैं कि अपने नहीं लगते हमको
पहले गैरों में भी अपनों का भरम होता था।
अब तो यारों से भी मिलने की कोई आस नही
पहले दुश्मन से
भी मिलने का धरम होता था।”
इसके पश्चात् कमलेश भट्ट, जहीर कुरैशी, डॉ. नंदलाल पाठक,
दिनेश शुक्ल,
भवानी शंकर, पुरुषोत्तम प्रतीक, रामकुमार कृषक, रोहिताश्व
अस्थाना, ज्ञान प्रकाश
विवेक, सूर्यभानु
गुप्त, तथा चंद्रसेन विराट आदि कवियों ने
ग़ज़ल को अपने-अपने अंदाज में व्यक्त किया। राजनैतिक,
सामाजिक विसंगतियों पर व्यंग्य, महानगरीय जीवन की त्रासदी,
निम्न मध्य वर्ग की कुंठाए आदि विषय इनकी ग़ज़लों के
केन्द्र बने। ग़ज़लों को ऊँचाई तक पहुँचाने में मशहूर शायर
‘बशीर
बद्र’
के महत्वपूर्ण योगदान को भुलाया नहीं जा सकता ।
आतंकवादियों पर इनका व्यंग्य देखिए-
“लोग
टूट जाते है एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियों जनाने में ।”
शहर के टूटते, निर्जीव रिश्तों पर बशीर बद्र लिखते हैं-
“कोई
हाथ भी न मिलायेगा, जो गले मिलोगे तपाक से
ये नये मिज़ाज का शहर है, जरा फासले से मिला करो।”
राजनेताओ के भ्रष्टाचार पर विजयकुमार सिंघल का प्रहार इन
शब्दों में देखिए-
“चिरागों
के तले भी जब अंधेरा हो तो क्या कीजै
अगर सूरज ही उजालों का लुटेरा हो तो क्या कीजै
।”
समकालीन ग़ज़लकारों ने पाठकों के भीतर उतर जाने का प्रयास
किया है और हमारी संवेदना को आन्दोलित किया है। हमारे जीवन
मूल्य टूट कर
बिखरते जा रहे है।जीवन की यथार्थ स्थिरि का
मार्मिक चित्रण करते हुए शिव ओम
‘अम्बर’
कहते है-
“अक्स
अपने ही वीराने हो गए है
आइने कितने पुराने हो गए हैं
अब यहाँ कोई नहीं सुनता किसी की
हर गली नक्कारखाने हो गए हैं
बाँधकर पाजेब महाफिल में खड़े हैं
हम तवायफ के तराने हो गए है ।”
आज देश में दो समस्याएँ अपने विकराल रूप में देश की
निरीह जनता को अपना निवाला बना रही है। इसमें से पहली
समस्या है-सांप्रदायिकता। काश्मीर के स्वर्ग को नर्क बनाने
में कौन दोषी है
?
हिन्दू या मुस्लिम, हिन्दुस्तान या पाक्स्तान
?
बावरी मस्जिद कांड में कौन विजयी हुआ राम या अल्लाह
?
इन सवालों का हमारे पास कोई जवाब नहीं । सांप्रदायिकता की
शिकार केवल निर्दोष आम जनता होती है। शायर विवेक
‘शौक’
इस व्यथा को इन शेरों में व्यक्त करते हैं-
“मस्जिदें
तो हुई हासिल हमको
खाली ईमान गंवा बैठे
।
मंदिरों को तो बचा लिया हमने
खाली भगवान गंवा बैठे
।
हम चांद-सितारों तक तो जा पहुँचे
खाली इंसान गंवा बैठे
।
सरहदे जब-जब बँटती है
दोंनो नुकसान उठाते है,
वो पाकिस्तान गंवा पैठे
हम हिन्दुस्तान गंवा बैठे।”
दूसरी प्रमुख समस्या-पिछले कुछ वर्षों से भारत में किसानों
की आत्महत्याओं का लम्बा सिलसिला जो आज भी थमने का नाम
नहीं ले रहा है और न ही इनके सही आंकड़े हमें ज्ञात है।
आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी हमारे देश में सामंतीवादी
प्रवृत्ति बरकरार है। कवि नीरज व्यास इस विडम्बना को वाणी
में इस प्रकार पिरोते है
–
“रक्त
के बीज वे बोते हैं
फसल इंसानियत की ढोटे हैं
जिन्दगी बहुत ही सफेद है उनकी
कई चाँद बाँहों में लेकर सोते हैं
शगल अब हो चुका है आत्महत्या का
पसीना बहाकर जिन्होंने खेत जोते है।”
हिन्दी साहित्य में ग़ज़ल को छंदबद्ध कविता की वापसी मानी
जा सकती है। कुछ रचनाकार हिन्दी ग़ज़ल को गीतिका, मुक्तिका,
अनुगीत आदि के नाम से सम्बोधित करते हैं। वैसे भारतीय काव्य
शास्त्र में
‘दोहा’
छंद भी बहुत कुछ उर्दू के
‘शे'र’
से मिलता है। दुष्यंत कुमार
तथा
इकबाल के शे'र इस मामले में
कबीर के बहुत नजदीक थे। खरे, धारदार और बेबाक। मुक्तक छंद
में यह शैली आज भी बहुत लोकप्रिय है। बिहारी के होहे
‘देखन
में छोटे लागे, घाव करे गंभीर’
की उक्ति को डॉ. मिथिलेश अवस्थी प्रस्तुत दोहों मे
चरितार्थ करते है-
“बुरी
हो करनी गर किसी की, धीमें से कह जाओ
अच्छी करनी हर किसी की,
कंठ खोलकर गाओ
।
चुगली कभी न कीजिए, इससे बढ़े विकार
ठीक रहे जाकी करे, खुद ही पड़े बीमार
।
नफरत कभी न घोलिए, जाति-धर्म के नाम
अपने जैसा कीजिए, दूजों का सम्मान ।”
इस प्रकार हिन्दी गज़लकारों ने
रुमानियत और देह-सौन्दर्य
को छोड़कर जीवन के यथार्थ को व्यक्त किया । उन्होंने
जिन्दगी की छोटी-छोटी बातों को सूक्ष्मता से परखा और अपनी
ग़ज़लों में रुपांकित किया है तथा कर रहे है । निकट भविष्य
में हिन्दी ग़ज़ल मानव-जीवन का
दर्पण बनकर अपनी इंद्रधनुषी
आभा बिखेरेगी । अंत मे चलते-चलते गायन में प्रस्तुत करती
हूँ सरोज व्यास
की यह ग़ज़ल-
जब दिल को लगती बात, ग़ज़ल तब होती है
लंबी जब दुख की रात, ग़ज़ल तब होती है
।
हँसने गाने के मौसम तो, हर वक्त जीवन में आते है
सिसकी भरती हो बात, ग़ज़ल तब होती है
।
हर रोज़ हमारे हाथ उठे, आदाबों और सलामों में
बरसों बिछड़ा हो साथ, ग़ज़ल तब होती है
।
रिश्तों के आँगन छोटे हों, लम्बी-बंबी दीवारें
सहमे सहमे जज़बात, ग़ज़ल तब होती है
।
फूलों की लेकर आड़ कोई, कांटा जब चुभ जाए
अपनी कर बैठे घात,
ग़जल तब होती है
।