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शायर कहता है... |
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मुरली
मनोहर
श्रीवास्तव
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बशीर
बद्र
के
एक
शेर
से
शुरू
करता
हूँ
अपनी
बात-
मुझे
इश्तहार
सी
लगती
हैं
ये
मुहब्बतों
की
कहानियाँ
जो
कहा
नहीं
वो
सुना
करो
,जो
लिखा
नहीं
वो
पढा
करो
।
वाकई
कोई
मुझ
से
पूछे
तो
मैं
कहूँगा
ग़ज़ल
जो
कहा
नहीं
गया
है
‘वह’
सुनने
की
चीज
है
और
जो
लिखा
नहीं
गया
है
वह
‘पढने’
की
चीज
है
।
ग़ज़ल
को
चीज
कहने
पर
मुझे
भी
एतराज
है
क्योंकि
ग़ज़ल
कोई
चीज
नहीं
है
चीज
कहने
पर
उसके
भौतिक
होंने
का
एहसास
होता
है
जबकि
ग़ज़ल
को
छूने
का
दावा
शायद
कोई
भी
नहीं
करना
चाहेगा।
हाँ
इसे
एक
एहसास
मानने
में
कोई
हर्ज़
नहीं
है।
क्यों
हम
तर्कों
में
पडे
–
एक
शेर
है-
हाय
रे
मजबूरियाँ
तर्के
मुहब्बत
के
लिये,
मुझको
समझाते
हैं
वो
हाय
रे
मजबूरियाँ,
तर्के
मुहब्बत
के
लिये
मुझको
समझाते
हैं
वो
और
उनको
समझाता
हूँ
मैं
,
आ
कि
तुझ
बिन
किस
तरह
ऐ
दोस्त
घबराता
हूँ
मैं
जैसे
हर
शै
में
किसी
शै
की
कमीं
पाता
हूँ
मैं
।
तेरी
महफ़िल
तेरे
जलवे
फ़िर
तगादा
क्या
करें
ले
उठा
जाता
हूँ
जालिम
,
ले
चला
जाता
हूँ
मैं
।
अर्थ
यह
कि
मुहब्बत
जो
बस
एक
एहसास
है
उसे
बनाये
रखने
के
किये
तर्क
की
आवश्यकता
पडे
तो
वह
कैसा
प्यार
है
।
इसी
तरह
ग़ज़ल
के
खूबसूरत
अहसास
को
महसूस
करने
के
लिये
तर्क
की
आवश्यकता
पडे
तो
उस
अहसास
को
जीना
मुश्किल
हो
जायेगा
।
कहने
का
अर्थ
यह
कि
सिर्फ़
वह
ही
सच
नहीं
है
जो
तर्क
पर
खरा
उतरे,
ग़ज़ल
दिल
से
लिखी
जाती
है,
उसमें
ज़ज्बात
पिरोये
जाते
हैं
(मैं
गलत
कह
रहा
हूँ,
ज़ज्बात
खुद
ब
खुद
उसमें
समाये
होते
हैं
एक
अच्छे
लेखन
में
कुछ
करना
नहीं
पडता
वह
स्वत:
होता
चला
जाता
है,
बाद
में
पढने
वाले
और
विश्लेषण
करने
वाले
उसके
गुण
और
दोष
ढूंढा
करते
हैं
।
)
यह
भी
सच
है
कि
लिखते-लिखते
भावनायें
गणित
की
किताब
की
तरह
कैल्कुलेटिव
और
तार्किक
हो
उठती
हैं
लेकिन
उनकी
खूबसूरती
यही
है
कि
इसके
बाद
भी
रचना
का
साथ
दिल
और
भावना
से
नहीं
टूटता।जैसे
कोई
गणित
का
पर्चा
दिल
की
दीवार
पर
पूरी
रूमानियत
के
साथ
होशोहवास
में
लिखा
जा
रहा
हो
और
लिख
जाने
के
बाद
दो
और
दो
चार
की
तरह
सही
हो
।
उसका
सही
होंना
ही
अपने
आप
में
किसी
का
भी
होश
उडा
देने
के
लिये
काफ़ी
है।
ग़ज़ल
की
दुनियाँ
को
पूरी
तरह
समझ
पाना
और
उसकी
विवेचना
कर
पाना
मुझे
बहुत
कठिन
बात
लगती
है
और
सबसे
बढ
कर
जब
हम
विश्लेषणात्मक
विवेचना
करते
हैं
तो
पाठ्य
में
कठोरता
आ
जाती
है,
तब
किसी
भी
रचना
में
बसा
हुआ
रस
पी
पा
ना
कठिन
होता
है। मैं
कोशिश
करता
हूँ
उन
ग़ज़लों
को
कुछ
अपनी
समझ
के
साथ
रखने
की
जिन्हें
अमूमन
हम
लोग
सुनते
रहते
हैं
और
जिसके
भाव
मुझे
जिस
तरह
लगे
।
गालिब
के
नीचे
लिखे
शेर
को
देखें
क्या
कहता
है-
न
था
कुछ
तो
खुदा
था
न
होता कुछ
तो
खुदा
होता
।
डुबोया
मुझ
को
मेरे
होंने
ने
न
होता
मैं
तो
क्या
होता
?
हुयी
मुद्दत
कि
मर
गया
गालिब
मगर
अब
भी
याद
आता
है
वो
हर
बात
पे
कहना
कि
यूँ
होता
तो
क्या
होता
?
यह
कौन
सी
मौत
है
और
किसकी
?
इसे
अंत
में
छूते
हैं
–
अभी
कुछ