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हिन्दी में ग़ज़ल - एक समग्र प्रस्तावना
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महेश अनघ |
यह
एक कठोर सत्य है कि विगत तीन चार दशक से हिन्दी में लगातार
लिखी जा रही ग़ज़ल आज तक भी अपना मानक स्वरूप निर्धारित
नहीं कर पाई है
। कारण कुछ भी हो, संवाद का अभाव, रचनाकारों
की लापरवाही, उर्दू अदब का अनुशासन,
समालोचना का अकाल, समकालीन समीक्षा द्वारा छन्द का विरोध या
फिर ग़ज़लकारों के अपने अपने खेमें और पूर्वाग्रह
। नतीजा
यह कि भावी पीढ़ी के सामने हिन्दी ग़ज़ल को वास्तविक रूप
में पहचानने का कोई ठोस से साधन नहीं है
। यों ग़ज़ल पर
केन्द्रित अनेक शिविर हुए, संगोष्ठियाँ हुई, विशेषांक
निकले, अलग-अलग विषय पर कई सारगर्भित आलेख छपे और हजारों
की संख्या में लोकप्रिय ग़ज़ले लिखीं गईं, किन्तु
दुर्भाग्य से ग़ज़ल के मानक रूप पर कोई सहमति नहीं बन
पाई । इसी कारण आज तक हिन्दी ग़ज़ल को साहित्य के मूल्यों
में स्थान नहीं मिल सका और वह निरन्तर अभिशप्त जीवन जी रही
है । तो, क्यों न
इस सदी के लिये हम एक उपाय करें
।क्यों न
हम ग़ज़ल के मानक स्वरूप को स्थापित करने की व्यावहारिक
पहल करें ।
मैं, महेश अनघ, पिछले तीस वर्षों के ग़ज़ल लेखन का साक्षी,
पूरे होशो हवास में, बिना पूर्वाग्रह के, तटस्थ भाव से कुछ
प्रस्ताव यहाँ रख रहा हूँ जिन पर देश भर के हिन्दी कवि,
पाठक, श्रोता एवं समालोचक विचार करें
। बिन्दुवार अपनी
सहमति या असहमति व्यक्त करें और एक खुला संवाद बनायें,
तत्पश्चात जिन बिन्दुओं पर आम सहमति हो उन्हें स्थायी रूप
से निर्णित मान लिया जाये और घोषित किया जाये तथा जो
मुद्दे असहमति या मतभेद के कारण अनिर्णीत रहें उन पर अलग
से चर्चा आयोजित की जाये ।
मैं यहाँ अपनी ओर से कोई वक्तव्य नहीं दे रहा, बल्कि ग़ज़ल
के आम पाठकों, श्रोताओं, समीक्षकों के विचार जो मैंने अब
तक जाने हैं, उनके आधार पर और ग़ज़लकारों के शेर उद्धृत
करते हुये कुछ प्रस्ताव रख रहा हूँ, जनमत संग्रह के लिये
। इस आलेख में दिये जा रहे उदाहरणों में ग़ज़लकारों के नाम
मैने जानबूझकर नहीं दिये हैं, कारण यह, कि यहाँ ग़ज़ल के
आकलन का उद्देश्य है, ग़ज़लकार का आकलन करना नहीं है
।
1. ग़ज़ल का
नामकरण :
यह प्रारम्भिक विवाद है, उर्दू की विधा ग़ज़ल, जब हिन्दी
साहित्य में प्रचलित हुई तो स्वभाविक रूप से संबोधन की
सुविधा हेतु इसे हिन्दी ग़ज़ल कहा गया
। बाद में यह देखा गया कि हिन्दी ग़ज़ल शब्द ने भ्रम पैदा कर दिया, कुछ लोगों
ने कहा कि इसमें फलां जगत उर्दू का शब्द आ गया तो यह हिन्दी
ग़ज़ल कहाँ रही, कुछ ने परम्परा से चली आ रही उर्दू के कहन
को ही हिन्दी ग़ज़ल माना
। यदि वह किसी हिन्दी पत्रिका में
छपी हो । कुछ शीर्षस्थ साहित्यकारों
व संस्थाओं ने अपनी ओर
से इसे नये नाम देने का स्वर बुलन्द किया जैसे गीतिका,
मुक्तिका, द्रुपदी, तेवरी, नई ग़ज़ल आदि-आदि
। लेकिन ये सभी
नाम उनके अपने खेमें तक ही प्रचलित रहे और एकाधिक नाम होना
विवाद को ही जन्म देना है
। जबकि हिन्दी साहित्य में अन्य
विधाओं के नाम की तरह इसे ग़ज़ल विधा कहा जा सकता था
। जहाँ
तक
‘हिन्दी’
विशेषण का सवाल है तो यह जान लेना चाहिये कि काव्य की
महत्ता से भाषा गौरवान्वित होती है, भाषा के महत्व से
काव्य गौरवान्वित नहीं होता, भाषा के मह्त व से काव्य
गौरवान्वित नहीं होता
। कबीर और केशवदास इसके प्रत्यक्ष
उदाहरण हैं
।
तो पहला
प्रस्ताव है कि–हिन्दी
साहित्य में लिखी जाने वाली ग़ज़ल को केवल
‘ग़ज़ल’
कहा
जाये, कोई
विशेषण नहीं लगाया जाये ।
2.
ग़ज़ल की भाषा
:
विवाद और मतभेद का यह मुख्य बिन्दु है
। हिन्दी में लिखी गई
ग़ज़ल की भाषा हिन्दी होनी चाहिये, यह तो ठीक है, लेकिन
कौन सी हिन्दी
?
आल्हाखण्ड वाली,
तुलसी वाली, कबीर वाली, प्रसाद वाली, मीरा वाली, मुक्तिबोध वाली
?
ईशुरी वाली या फिर मुम्बइया
?
वैसी दशा में उर्दू ही क्या बुरी है
?
काव्य में भाषा की भूमिका केवल संप्रेषण के लिये है
। अतः उचित भाषा वही जो अधिक से अधिक संप्रेषित हो सके और फिर
हिन्दी भाषा क्या है
?
संस्कृत, फारसी, अरबी, लेटिन, पारसी का मिलाजुला रूप और
बुन्देली, ब्रज, अवधी, भोजपुरी, बघेली, छत्तीसगढ़ी आदि से
सम्पृक्त रूप
!
जैसे
:-
हुजूर आरिजो रुखसार क्या तमाम बदन
मेरी सुनो
तो मुजस्सिम गुलाब हो दैये
। (क)
बाढ़ की
संभावनायें सामने हैं
और नदियों के
किनारे घर बने हैं
। (ख)
दोनो उद्धरण एक ही कवि की रचना है, अब कोई साधारण सा पाठक
भी कह देगा कि
‘क’
उर्दू ग़ज़ल है और
‘ख’
हिन्दी ग़ज़ल है
। शब्दों की
वल्दियत पर जाने की भी जरूरत
नहीं है।
ऋतवाही
ब्रह्माण्डव्यपिनी शुचि रुचि वाली शारदी
आयु व्योम में रची
ऋचा है हंसपदी सी जिन्दगी
। (क)
अगर इसे हिन्दी
ग़ज़ल कहते हैं तो बेचारे पाठक को काँपने से भगवान बचाये,
यह ग़ज़ल किस पाठक के लिये होगी
?
दूसरी ओर, ग़ज़ल जैसी कमनीय विधा में भदेस भाषा का प्रयोग
भी नहीं होना चाहिये जैसे उपरोक्त कवि की ही रचना है :
दाल भात के
मूसलचंदों का अभिन्नदन है
इस युग में तो
गैरतमंदों का अभिनन्दन है
।(क)
सरल भाषा के
नाम पर ऐसी भाषा भी ग़ज़ल में नहीं ली जाये, जो काव्य के
अनुकूल नहीं है, जैसे एक अन्य कवि का शेर :
हमें जोतकर
कोल्हू में, फरमाते आराम सभी
। (क)
जबकि बहुत
आसानी से हम सुपरिचित और प्रचलित भाषा का प्रयोग करके
ग़ज़ल को संप्रेषणीय भी बना सकते हैं और उसका हिन्दी रूप
भी सुरक्षित रख सकते हैं, जैसे :
कहीं भी कूजन
नहीं, गर्जन नहीं घनघोर वन में
कहीं वनपाखी नहीं पशुधन
नहीं घनघोर वन में
।
तो, दूसरा
प्रस्ताव है कि-
‘ग़ज़ल’
की भाषा, आम बोलचाल की भाषा ही रहे जो सहज सम्प्रेष्य हो
।
ग़ज़ल में भाषा को लेकर पांडित्य प्रदर्शन न किया जाये और
गैर हिन्दी शब्दों से परहेज भी न किया जाये तथापि भाषा
में में व्याकरण
अनिवार्य
रूप से हिन्दी का ही हो
।
3. ग़ज़ल
का छन्द
: इस मामले में दो परम्पराओं का विरोध है
। ग़ज़ल की उर्दू
बहरें अरकान द्वारा अनुशासित हैं जो गेयता की दृष्टि से
उपयुक्त मानी
जाती हैं । जबकि हिन्दी की छंद परम्परा
मात्राओं से शासित है जिसमें वर्तनी और उच्चारण की समानता
रहती है किन्तु शब्द प्रखरता के कारण गेयता में व्यतिक्रम
संभावित है
। चूंकि ग़ज़ल एक छंद काव्य है और हिन्दी
साहित्य की रचना है अतः उसका छंद मात्रिक ही होना चाहिये
ऐसा अघिकांश लोगों का मत है, किन्तु विडम्बना यह है कि
अघिकांश हिन्दी ग़ज़लें अरकान परम्परा में लिखी गई है और
लिखी जा रही हैं
। शायद ही कोई हिन्दी ग़ज़लकार हो(मुझ सहित)
जिसने अपनी सभी ग़ज़लें मात्रिक अनुशासन में लिखीं हों, एक
ग़ज़लकार के दो उदाहरण:
ये जो शहतीर हैं पलकों पे उठालो यारो
अब कोई ऐसा
तरीका भी लिकालो यारो
। (क)
मेरे गीत
तुम्हारे पास सहारा पाने आयेंगे
मेरे बाद
तुम्हें ये मेरी याद दिलाने आयेंगे
। (ख)
इनमें
‘क’
मात्राओं में समान होकर भी वज़न के अनुसार उर्दू्
परम्परा का शेर है जबकि
‘ख’
मात्राओं से शासित हिन्दी छंद होकर भी गेयता के अनुकूल है,
अतः दोनो उदाहरण ग्राह्म हैं
।जबकि -
मैं तो बहता
हुआ दरिया हूँ गुजर जाऊँगा
एक दिन गहरे
समन्दर में उतर जाऊंगा
। (क)
यह विशुद्ध रुप
से अरकान परम्परा में लिखा गया शेर है,
मात्राओं के अनुसार दोषपूर्ण है दूसरी ओर-
घटनायें घटती
हैं अति निर्मम आये दिन,
अप्रिय प्रकाश
लगता युग प्रियतम आये दिन
। (क)
यह विशुद्ध
मात्रिक छंद है, किंतु संतुलित होकर भी इसमें गेयता संभव
नहीं जबकि ग़ज़ल को संतुलन भी चाहिये और गेयता भी
। कुछ
ग़ज़लें प्रयोग और कृति स्पर्द्धा के रूप में अत्यंत छोटी
बहर में लिखीं गईं किंतु वे सहज नहीं लगतीं जैसेः
सितारों भरा
आसमां
मेरे घावों की जुबां
।(क)
दुर्गंध का
भवन
जुकामग्रस्त
जन । (क)
दोहा छंद में
भी इन दिनों ग़ज़लें लिखी जा रही हैं, किंतु वे ग़ज़ल की
रवानी और अन्य शास्त्रीय कारणों से उचित नहीं हैं
। दोहे
को दोहा ही क्यों न रहने दिया जाये, उसे ग़ज़ल बनाने की
ज्यादती किसलिये?
उदाहरण देखें
-
आपस में लड़ते
रहें, अगड़े पिछड़े रोज
राजनीति पैदा
करे, ऐसे झगड़े रोज
। (क)
अब आप हिन्दी
में ग़ज़ल की बहर का एक उदाहरण देखें जो मात्रा के
अनुशासन, गेयता और रवानी तीनों दृष्टियों से अनुकूल है
-
देह का रंग है
सीपिया सीपिया
चम्पई चम्पई
मोतिया मोतिया
। (ख)
या फिर गेयता
की शर्त पर मात्रिक छंद से छोड़ा सा समझौता करके उपयोगी
बनाया गया यह शेर देखें
-
सांस जब चल
पड़ी ढंग से एक दिन जिन्दगी हो गई
जिस तरह बूंद बरसात में
धीरे धीरे नदी हो गई
। (ख)
एक मात्रा
शिथिल करके इसे गेय बनाया गया है
।
तो, तीसरा
प्रस्ताव है कि-‘गजल’
की बहर यथासंभव मात्राओं से अमुशासित हो किंतु रवानी और
गेयता के लिये आवश्यक हो तो मात्रिक अनुशासन शिथिल किया जा
सकता है (वैसे भी समकालीन काव्य में छंद विधान दोयम दर्जे
पर है, काव्य मूल्य ही अधिक महत्वपूर्ण है।)
4. रवानी (लय)
:
गजल किसी
भी भाषा की हो, उसमें रवानी अच्छी लगती है।
लयात्मकता तो काव्य का बहुमुल्य गुण है । जिन गजलों में लय
नहीं होती, वे सबको अखरती हैं, जैसे
-
प्रगति शिखर तक
पहुंच नहीं पाता,
दृढ़ जिसका
अरमान नहीं होता
। (क)
डीजल की बू में
फूल एक
धीरे-धीरे
लापता हुआ । (क)
इसलिये
भले ही शब्द
बदलने पड़ें, भाषा बदलनी पड़े या शब्द-संयोजन बदलना पड़े
किंतु रवानी आनी ही चाहिये । इससे ग़ज़ल का रुप निखर आता है
। जैसे-
न हम हैं न तुम
हो न बन्दिश जहाँ की
महज, जिन्दगी
का तमाशा बचा है । (ख)
ज़िन्दगी तेरे
बिना, तेरे बिना, तेरे बिना
किस कदर सुखा
है बारिश के महीनों में कुँअर (ख)
तो, चौथा
प्रस्ताव है कि-
ग़ज़ल में छंद के अतिरिक्त रवानी (लय) भी
होना चाहिए । हिन्दी भाषा के शब्दों से यदि लय भंग होती
हो तो अन्य भाषा के समानार्थी शब्द लिये जायें ।
5. ग़ज़ल
का कथ्य
:
पारम्परिक ग़ज़ल सैकड़ों साल तक आमतौर से रुमानी
ख्यालों पर ही लिखी जाती रही । इसके ही समानान्तर हिन्दी
में रीति काल की कविता लिखी गई थी । किन्तु हिन्दी साहित्य
में जिसे ग़ज़ल का धमाकेदार प्रवेश कहा जाता है, वह दुष्यंत
का ग़जल लेखन है
। और दुष्यंत की ग़ज़लों में लोकप्रियता का
सबसे बड़ा कारण था - रुमानियत से अलग हटकर समकालीन प्रसंगों
को ग़ज़ल का विषय बनाना । इस ज़मीन तोड़ने का ही परिणाम था कि
पिछले पच्चीस वर्षों में हिन्दी में ग़ज़ल की बाढ़ सी आ गई ।
हिन्दी कविता का स्वभाव है कि वह कथ्य प्रधान होती है ।
दूसरी बात यह कि हिन्दी साहित्य आदमी के निमित्त है और
आदमी का जीवन ही कविता की ज़मीन है । आधुनिक काल में आदमी का
जीवन में अर्थ शास्त्र, राजनीतिशास्त्र, विश्व व्यवस्था,
वर्ग चेतना, परिवार, व्यक्तिगत सुख-दुख, कुंठा, संत्रास,
सामाजिक विकृतियां और
भी अनेक प्रसंग हैं । बेशक श्रृंगार
और रागात्मकता भी मानव जीवन का एक अंग है । लेकिन बस एक
अंग ही है - समग्र नहीं
। इसलिये आधुनिक
ग़ज़ल जीवन के विविध प्रसंगों पर लिखी जाती रही, जो उचित ही
है, ग़ज़ल के विभिन्न कथ्य इस प्रकार दृष्टव्य हैं-
कहाँ तो तय था
चिरागां हरेक घर के लिये,
कहाँ चिराग
मयस्सर नहीं शहर के लिये
। (ख)
चादनी छत पर चल
रही होगी,
अब अकेली टहल
रही होगी । (ख)
दोनों उदाहरण
एक ही रचनाकार के हैं,
देश की अच्छी
हिफाजत कर रहे हो,
खेत विधवा का
समझ कर चर रहे हो
। (ख)
इन दिनों
राजनीतिक दुराचार ज्यादातर ग़ज़ल का विषय रहा है, जिसमें
नेताओं का भ्रष्टाचार, अविश्वास,
अव्यस्था और साम्प्रदायिक
तनाव मुख्य रूप से उभर कर आया है और काव्य की प्रासंगिकता
के लिये अनुकूल भी है, जैसे -
पाँच रुपये मिल
गये रोज तो भूल गया स्कूल का रस्ता
नेता जी के
चुनाव में अब लगा रहा है नारा लड़का
। (ख)
काजू भुनी
प्लेट में, व्हिस्की गिलास में,
उतरा है रामराज
विधायक के निवास में
। (ख)
गलतियाँ बाबर
की थीं जुम्मन का घर फिर क्यों जला
ऐसे
नाजुक वक्त में हालात को मत छेड़िये
। (ख)
व्यक्ति चरित्र
और सामाजिक विसंगति के कथ्य देखें -
जरा बूढ़ों को
देखो तो कबर में पाँव लटके हैं,
मगर ज़िद है कि
नाचेंगे पहन कर जींस होली में
। (ख)
जीवन की इस
लूटपाट में एक विसंगति यह भी देखी,
सुख को
खुशहालों ने लूटा, दुख को कंगालों ने लुटा
। (ख)
और, हिन्दी
ग़ज़ल में आध्यात्म भी है -
बोलता जब मैं
निरुत्तर कौन है,
मैं नहीं भीतर
तो भीतर कौन है
। (ख)
उपरोक्त सभी
विषय और इनसे भी परे अन्य सारे विषय, ग़ज़ल की जमीन बनते
हैं । इसलिये इस
बिन्दु पर कोई विवाद नहीं है
। केवल इतना
जरूरी है कि जो भी कथ्य लिया जाये वह स्पष्ट हो, अपने में
उलझा हुआ, दुरूह नहीं हो, जैसा कि इस शेर में -
आप
निष्ठा बने हैं, उभयनिष्ठ हैं
आस्था के अमिट
उष्म आभास हैं
। (क)
इस शेर में पता
ही नहीं चलता कि क्या कहा जा रहा है
?
जबकि इसी रचनाकार के एक अन्य शेर में नये शिल्प के साथ भी
कथ्य एकदम स्पष्ट है :
पूछें न
आप हमसे पाहन प्रदेश में
किस भांति हम
बचा कर दरपन निकल गये
। (ख)
तो पाचवा
प्रस्ताव है कि-
ग़ज़ल के कथ्य़ को स्वतंत्र छोड़ दिया
जाये ।
6.ग़ज़ल का शिल्प
: उर्दू की या किसी भी भाषा की ग़ज़ल हो, यदि वह ग़ज़ल है
तो उसमें काव्यात्मकता होनी ही चाहिये, शिल्प ही कविता का
मूल चरित्र है, यही सम्प्रेषित होता है, यही पाठक को
आकर्षित करता
है और इसी से रचनाकार की पहचान बनती है, काव्य में शिल्प
को ही रचनाकार की मौलिकता कहा है, हिन्दी ग़ज़ल में शिल्प के सन्दर्भ के
‘ग़ज़ल
शिल्प’
से अधिक
‘कविता
शिल्प’
पर ध्यान दिया जाना आलोचना के हित में होगा क्योंकि ग़ज़ल
व्यापक अर्थों में काव्य पहलेहै
, अन्य सभी हिन्दी काव्य विधाओं की तरह ग़ज़ल में भी शिल्प
के वे ही उपकरण सराहे गये हैं, जिनसे काव्य सुरक्षित रहते
हुए कहन का प्रभाव
बढ़ता हो और काव्यात्मकता प्रस्तुति परिलक्षित होती हो, इस
सन्दर्भ में शिल्प के जो प्रमुख उपादान ग़ज़ल में प्रयुक्त
एवं रेखांकित किये गये, उनके कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं
-
बिम्ब संयोजन-
ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा,
मैं सजदे में
नहीं था आपको धोखा हुआ होगा
। (ख)
फिर हवा के हाथ
में हैं शीत के नेजे नुकील
फल गया है ताप
का अस्तर चलो चलना कहाँ है
। (ख)
प्रतीक प्रयोग
के मामले में अवश्य यह देखन होगा कि शब्द, कथ्य के साथ
सार्थक रूप से संयोजित हों, नीचे एक ही कवि के दो उदाहरणों
द्वारा सही और गलत प्रतीक को दर्शाया गया है
-
कौन शासन से कहेगा, कौन समझेगा,
एक चिड़िया इन
धमाकों से सिहरती है
। (ख)
तू किसी रेल सी
गुजरती है,
मैं किसी पुल
सा थरथराता हूँ
। (क)
जाहिर है, (क)
उदाहरण में प्रतीक रेल और पुल के कारण कथ्य हास्यास्पद हो गया है
। पुराण और इतिहास के मिथक भी यदि प्रतीक के रूप में
प्रयुक्त हों, तो लोकप्रियता एवं बोधगम्यता जरूर सुनिश्चित
कर लेनी चाहिए, ऐसा न हो, जैसा इस शेर में हुआ
-
चन्द्र चर्चित सर धराम्बर लग रहे अच्छोद से,
महाश्वेतारात
आयी स्नान करने के लिये
। (क)
इस शेर
को समझने के लिये बाणभट्ट की कादम्बरी कितने पाठकों ने
पढ़ी होगी, यह निश्चित ही कवि का पांडित्य प्रदर्शन है,
साथ ही, प्रतीक ऐसा भी नहीं हो कि उसका कोई अर्थ ही न
निकले, जैसे यह
–
अखबारों में
बच्चे सा रोता
जैसे खूनी
तूफान है घर
। (क)
एक और अच्छे,
व्यंजित प्रतीक का उदाहरण दृष्टव्य है -
आज भी आदम की बेटी हंटरों की जद में है
हर गिलहरी के
बदन पर धारियाँ होंगीं जरूर
। (ख)
व्यंजना काव्य
का श्रेष्ठ गुण है
। व्यंजना को उत्तम काव्य और लक्षण को
मध्यम काव्य कहा गया है
। जहाँ तक ग़ज़ल का मामला है, उर्दू
हो या हिन्दी, अभिधा में कही गई ग़ज़ल न तो ग़ज़ल ही होगी
और न ही कविता, नीचे अभिधा और व्यंजना के क्रमशः उदाहरण
देखें -