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हिन्दी ग़ज़ल का मिज़ाज |
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ज्ञान प्रकाश विवेक |
(दुर्भाग्य
से हिंदी ग़ज़लों में मिज़ाज की अनदेखी की जाती है। ग़ज़ल
की बाह्य संरचना अथवा रूप को समझने और शास्त्रीयता पर खरा
उतरने के प्रयास तो दिखाई देता हैं और इस लिहाज से ग़ज़लों
को मुकम्मल समझ लिया जाता है। शायद यही वजह है कि दुष्यंत
के बाद निरंतर ग़ज़लें लिखी जा रही हैं, लेकिन दुष्यंत
जैसा ताप, बेचैनी, मुहावरेदारी, हिंदी के बाद के
ग़ज़लकारों में कम दिखाई देता है। पश्न फिर वही मिजाज का
है। हिंदी ग़ज़लों में विचार है, मिज़ाज नहीं। स्थिति एकदम
विपरीत भी है। जिन ग़ज़लकारों को ग़ज़ल के मिजाज की समझ
है, वहाँ विचार तत्व को अहमियत नहीं दी गई। एक रूमानीपन है
या कहें कि खालीपन है। हिन्दी ग़ज़ल के मिज़ाज का विवेचन
कर रहे हैं हिंदी के महत्वपूर्ण ग़ज़लकार ज्ञानप्रकाश
विवेक-संपादक)
ग़ज़ल
हो या
नज़्म-सारी बात विचार की है। विचार से आगे अनुभूति और फिर
उसे अभिव्यक्त करने का शऊर
!
शऊर हर शायर/ ग़ज़लकार का निजी हो सकता है। यही शऊर
ग़ज़लकार का अंदाज़े-बयां बनकर एक तरह का
‘डिक्शन’
अथवा मुहावरा स्थापित करता है। शऊर कुल मिलाकर अच्छे-बुरे
शेर में फर्क करने की तमीज पैदा करता है।
विचार की जरूरत बेशक अहम है। लेकिन विचार अपने आप में अब
तक अहम भूमिका नहीं निभाता जब तक कि वह संवेदना की गहराई
तक पहुंचकर, शेर की सूरत में जज़्ब न हो जाए । यानी, दो
मिसरे, बहर, काफिया रदीफ आदि शेर के जरूरी औजार हैं जिनके
जरिए विचार की अभिव्यक्ति होती है और शेर बनता है। उदाहरण
के लिए दुष्यंत कुमार का एक शेर प्रस्तुत है-
कहाँ तो तय था
चरागां हरेक घर के लिए
कहाँ चराग
मय्यसर नहीं शहर के लिए
!
यहाँ विचार इस शिद्दत के साथ संवेदना तक पहुँचा है कि शेर
में ग़ज़लकार की वेदना का फलक व्यापक रूप से व्यक्त हुआ
है। शेर की खूबी यह है कि शेर इकहरा नहीं, कई सारे अर्थ
रखता है। शेर की खूबी यह है कि शेर इकहरा नहीं, कई सारे
अर्थ रखता है। यह शेर दंगे से पीड़ित शहर का सूरते-हाल है
और गाढ़े दुःख का बयान भी। शेर इस लिहाज से भी गौरतलब है
कि ग़ज़लकार शेर के जरिए एक मंजर सृजित करता है्। शब्दों
की फ़िजूलखर्ची से बचते हुए ग़ज़लकार ने मुहावरा गढ़ा है।
‘कहाँ’
शब्द का प्रयोग दोनों मिसरों में है और यही शब्द व्यंजना
पैदा करता है।
‘कहाँ’
शब्द में बहुत कुछ सिमटता चला आया है।
‘कहाँ’
शब्द किसी बच्चे ग़ज़लकार के हाथ लगता तो यकीनन न अखर्थवान
होता न बेचैनी पैदा करता ।
एक सफल शेर की खूबी यह होती है कि उसमें दर्द की लय होती
है और अर्थ की सत्ता यही ग़ज़ल का मिज़ाज भी है। ग़ज़ल के
मिज़ाज को सीधे-शीधे रेखांकित करना कठिन है। वह ग़ज़ल की
आत्मा की तरह है । शेर पढ़ते-सुनते हुए उसे महसूस किया जा
सकता है।
ऊर्दू की रिवायती अथवा जदीद ग़ज़ल में बहुत सारे परिवर्तन
हुए हैं। समय के साथ-साथ बहुत सारी बातों को शामिल किया
गया और बहुत सारी पाबंदियां तर्क भी की गईं। इसी दौरान,
भाषा की दृष्टि से नए प्रयोग हुए और कथ्य की दृष्टि से
क्रांतिकारी तब्दीलियाँ आईं । यथा :
जूगनू को दिन
के वक़्त परखने की ज़िद करें
बच्चे हमारे
दौर के चालाक हो गए
!
-परवीन
शाकिर
चलते रहना तो
यूं भी मुश्किल है
और जब अपने साथ
चलना हो!
-अकबर मासूम
लेकिन ग़ज़ल के रूप (फार्म) और मिज़ाज के साथ छेड़छाड़
करने की हिम्मत किसी ग़ज़लकार में नहीं हुई। बात फिर वही
है। फार्म, ग़ज़ल की देह है तो मिज़ाज रूह। फार्म कीअ
नगढ़ता जिस प्रकार शेर के सौंदर्य को नष्ट कर देती है इसी
प्रकार ग़ज़ल के मिज़ाज से आहत शेर मुख्ता फार्म के बावजूद
प्रभावित नहीं करते। मिज़ाज एक प्रकार से बहती नदी के
संगीत जैसा है।
ग़ज़ल एक पेचीदा सिन्फ है्। यह पेचीदगी उसकी आंतरिक है।
दरअसल होता यह है कि ग़ज़ल का बाह्य फार्म यानी
काफिया-रदीफ बहर इत्यादि को ग़ज़ल की जरूरी (और शायद
आखिरी) शर्त समझ लिया जाता है। ग़ज़लकार शेर कहने लगते
हैं। ग़ज़लें होने लगती हैं। लेकिन ग़ज़ल में तासीर
(प्रभाव) पैदा नहीं होता। चूंकि ग़ज़लकार ग़ज़ल की भौतरी
हलचलों से अनभिज्ञ रहते हैं। ग़ज़ल की बाह्मसंरचना बेशक
अहम है। लेकिन ग़ज़ल के भीतर जो नाद है;
जो तासीर है;
जो अंतधर्वनि है;
जो सांकेतिकता है, उसकी समझ जरूरी है। यही कुल मिलाकर
ग़ज़ल का
मिज़ाज
है। हर विधा का अपना चरित्र होता है । मिजाज ऐसा तत्व है
जो यकीनन ग़ज़ल के चरित्र को बनाता बिगाड़ता है।
दुर्भाग्य से
हिंन्दी ग़ज़लों में मिज़ाज की अनदेखी की जाती है। ग़ज़ल
की बाह्य संरचना अथवा रूप को समझने और शास्त्रीयता पर खरा
उतरने के प्रयास तो दिखाई देते हैं और इस लिहाज से ग़ज़लों
को मुकम्मल समझ लिया जाता है। शायद यही वजह है कि दुष्यंत
के बाद निरंतर ग़ज़लें तो लिखी जा रही हैं, लेकिन दुष्यंत
जैसा ताप, बेजैनी, मुहावरेदारी, हिंदी के बाद के
ग़ज़लकारों में कम दिखाई देता है।
प्रश्न फिर वही मिज़ाज का है। हिंदी ग़ज़लों में विचार है,
मिज़ाज नहीं । स्थिति एकदम विपरीत भी है। जिन ग़ज़लकारों
को ग़ज़ल के मिज़ाज की समझ है, वहां विचार तत्व को अहमियत
नहीं दी गई। एक रूमानीपन है या कहें कि खालीपन है। हिन्दी
के युवा ग़ज़लकार अशोक अंजुम की ग़ज़ल के अनुसार इस तथ्य
की कुछ पुष्टि के लिए :
तेरा मेरा
रिश्ता क्या
तूने अब तक
सोचा क्या
कागज भीगा
अश्कों से
इससे ज्यादा
लिखता क्या
हर मौसम में
देखा है
जग में तुमसे
अच्छा क्या
वाकिफ़ हूँ मैं
सीरत से
अब सूरत पे
पर्दा क्या
!
ग़ज़ल के
मिज़ाज के बावजूद उपरोक्त ग़ज़ल यदि प्रभावित नहीं करती तो
इसलिए कि यहाँ ग़ज़ल कही नहीं गई, निपटाई गई है । यहाँ
वैचारिकता की बात तर्क भी कर दें तो भावनात्मक आवेग भी
नहीं है। इसके विपरीत लक्ष्मीशंकर वाजपेयी काएक सेर गौरतलब
है । शेर में सादगी है, नाद है, भावनाओं का आवेग और शेर को
सुघड़ तरीके से कहने का सलीका भी :
मुझको तो सिर्फ
उसकी खामोशी का था पता
हैरां हूं पास
आ के समंदर के शोर से
!
इसी मुद्दे को विस्तार देते हुए बालस्वरूप राही की ग़ज़ल
के कुछ शेर गौरतलब हैं । बालस्वरूप राही जिस शऊर के साथ
ग़ज़ल कहते हैं, वह न केवल मिज़ाज की पैरवी होती है, बल्कि
एक मुहावरा भी बनता है :
हमने बौनों की
जेब में देखी
नाम जिस चीज का
सफलता है ।
एक धागे का साथ
देवे को
मोम का रोम-रोम
जलता है ।
काम चाहे जेहन
से चलता हो,
नामी दीवानगी
से चलता है
!
मिज़ाज ग़ज़ल का ऐसा तत्व नहीं कि जिससे आतंकित हुआ जाए।
वह कोई बाह्य वस्तु नहीं जिसे आरोपित किया जा सके ।
वस्तुतः मिज़ाज ग़ज़ल को ठस्सपन से मुक्त करता है । इसे
यूं भी कह सकते हैं कि हिंदी में ठस्स और बेलौस ग़ज़लों की
मात्रा इसलिए अधिक है कि मिज़ाज खारिज़ है । ग़ज़ल की
नासमझी मुख्य कारक है । ग़ज़ल का हो जाना महत्त्वपूर्ण
नहीं । ग़ज़ल में ग़ज़ल का मिज़ाज पैदा करना महत्त्वपूर्ण
है । ग़ज़ल का मिजाज शिल्प की चुस्ती से नहीं, सघन अनुभूति
और नुकीली एकाग्रता से हासिल होता है । कई बार शिल्पगत
सौंदर्य के बावजूद शेर प्रभावित नहीं करते । क्योंकि अच्छा
क्राफ्ट वर्क, अच्छी ग़ज़ल के लिए जरूरी शर्त तो है लेकिन
अंतिम नहीं य़ कुंअर बेचैन की ग़ज़लें इसका बेहतर उदाहरण
हैं । उनकी ग़ज़लें शिल्प की दृष्टि से परिपक्व होने के
बावजूद कई बार तासीर पैदा नहीं करतीं । चूंकि शिल्पगत
प्रौढ़ता के साथ-साथ कथ्यगत नवीनता, भावनाओं का आवेग बेचैन
करता नाद और कल्पनाशीलता कुछ अन्य जरूरी तत्व हैं । यहाँ
दोनों तरह के अश्आर(तासिर पैदा करते और सतही) उदाहरण
स्वरूप देना इसलिए जरूरी है ताकि अंतर स्पष्ट रूप से समझा
जा सके -
आँख गायब है,
कान गायब हैं
चुप्पियाँ हैं,
बयान गायब हैं ।
बयान के लिए कान की बेशक जरुरत थी लेकिन आँख का प्रयोग शेर
में व्यर्थ है ।
हम तो कब से
खड़े हैं मंदिर में,
देवताओं के
ध्यान गायब हैं।
ध्यान जैसे कोई मूर्त चीज हो ।
आजकल इश्क की
कहानी से
इश्क के
इम्तिहान गायब हैं ।
जैसे केवल दो मिसरों को जैसे-तैसे शेर जैसी कोई चीज बनाने
की लाचारी हो । इश्क की कहानी में इश्क के इम्तिहान का
क्या मतलब हुआ-यह स्पष्ट नहीं होता । कुंअर बेचैन भी इस
बात से जरूर सहमत होंगे कि उनकी इस ग़ज़ल में सब कुछ
‘फिट’
है, लेकिन शेर तासीर पैदा नहीं करता । यानी ग़ज़ल के
मिज़ाज
के बावजूद ग़ज़ल प्रभाव नहीं छोड़ती ।
इसी प्रकार के
कुछ अन्य ग़ज़ल कारों के शेर प्रस्तुत हैं
:
पेड़ के पास
आंधियाँ रख दो,
पेड़ के
पात-पात बोलेंगे।
-उर्मिलेश
जैसे आंधी न
हुई मेज, कुर्सी हो गई । जब चाही, जहां रख दी ।
ताज को गौ़र से
जो देखेंगे
जो कटे थे वो
हाथ बालेंगे ।
-उर्मिलेश
उर्मिलेश(ग़ज़लकार) इतिहास संदर्भित शेर कहते तो हैं लेकिन
स्पष्ट नहीं कह पाते कि वह क्या कहना चाहते हैं । कटे
हाथों का बोलना बेशक प्रतीकात्क है लेकिन प्रतीक अस्पष्ट
है । यह शेर की असफलता है कि वह ताज के सौंदर्य के बरक्स
ताज बनाने वाले की वेदना (ऐसा कहा जाता है कि उनके दोनों
हाथ काट दिए गए थे) को नहीं उभार सके । विरोधाभास शिद्दत
से उभरकर आना चाहिए था ।
इसी प्रकार
जहीर कुरैशी के दो शेर प्रस्तुत हैं । अश्आर केवल मिसरे
हैं- न सुगम अनुभूति, न तासीर । मिज़ाज की बात करना बेमानी
है
:
जो प्रचारों से
दूर रहते हैं
इश्तिहारों से
दूर रहते हैं ।
पेड़ का हो या
एक पत्ते का
हम सहारों से
दूर रहते हैं ।
ग़ज़ल में और भी शेर हैं । इसी प्रकृति के हैं । यहां दो
अश्आर पर बात करेंगे । ठीक-ठाक से नज़र आने वाले अश्आर यदि
प्रभावित नहीं करते तो इसलिए कि उनमें ग़ज़ल का मिज़ाज
नहीं । इसलिए कि वह तासीर नहीं जो शेर में चमक पैदा करती
है।
जहीर कुरैशी अच्छे-खासे चर्चित ग़ज़लकार हैं । लेकिन इस
ग़ज़ल (जिसके दो-दो शेर यहाँ प्रस्तुत किए गए हैं) में
जल्दबाजी हैं । ताप नहीं वह अनुभव नहीं जो शेर में घटना
बनकर उभरता है । पहले शेर में दो मिसरे हैं । दोनों में एक
ही बात है । यहां शब्दों का ही नहीं, मिसरों का भी अपव्यय
है । प्रचारों से दूर रहना या इश्तिहारों से दूर रहना-एक
ही विषय को दोहराया गया है । प्रचार शब्द ठूंसा गया प्रतीत
होता है । सबसे बड़ी बात यह कि विषयगत नवीनता नहीं । दूसरे
मिसरे में मुहावरा है, लेकिन उसका गलत प्रयोग किया गया है
। मुहावरा डूबते को तिनके का सहारा है लेकिन जहीर पेड़ और
पत्ते को सहारे के रूप में लेते हैं । जाहिर है, पेड़
सहारा नहीं देते, छाँव देते हैं । इस प्रकार की ग़ज़लें या
अश्आर बेशक हो जाते हैं लेकिन
-मिज़ाज
की पैरवी नहीं करते ।
इन ग़ज़लों के विपरीत हिंदी ग़ज़लकारों की ग़ज़लों के कुछ
ऐसे शेर प्रस्तुत हैं जिनमें ग़ज़ल का लबो-लहजा अख्तियार
किया जाए । वह शायद / ग़ज़लकार की एकाग्रता, अनुभवशीलता पर
भी निर्भर करता है। सूर्यभानु गुप्त की ग़ज़ल के दो अश्आर
इस लिहाज से पेश हैं (कि कल्पना किस कलात्मक लेकिन सादा
ढंग से शेरों में ढलती है। विषयगत पेचीदगी नहीं । चूंकि
शेर कहते वक़्त ग़ज़लकार ने ज़ेहनी तौर से पूरी तैयारी कर
ली थी :
ऐसी काई है अब
मकानों पर
धूप के पाँव भी
फसलते हैं
!
हम तो सूरज हैं
सर्द मुल्कों के
मूड आता है तब
निकलते हैं ।
-सूर्यभानु गुप्त
आखिर वो आदमी
है कोई जानवर नहीं,
लाठी से उसे इस
तरह क़िबला न हांकिए
-अश्वघोष
चाहें तो निकल
आएंगे मुट्ठी से हमारे
ये लालकिल और
कई ताजमहल और
!
तथा
सजा के जिस्म न
बेचें तो और क्या बेचें
ग़रीबे-शहर है,
घर में दुकान रखते हैं।
-नूर मुहम्मद नूर
छोड़कर अपनी
हक़ीकत अब ज़माने के लिए
चल यहाँ से फिर
कभी वापिस न आने के लिए ।
मुझसे मेरी
हसरतों का आईना नाराज़ है
!
और आमादा है
किरकर टूट जाने के लिए ।
तथा
दस्ते-दुआ हूँ
मादरे-हिंदुस्तान का
मेहनत की
रोटियों में झलकता सवाब हूँ ।
-शलभ श्रीराम सिंह
शलभ श्रीराम सिंह की ग़ज़लों में उर्दू शब्दावली और
इज़ाफ़तों के प्रयोग के बावजूद मुहावरा और अंदाजे-बयां
निजी है। जिस मिज़ाज की बात की जा रही है, शलभ श्रीराम
सिंह की ग़ज़लों में उपस्थित है। बेशक शलभ की ग़ज़ल जनवादी
रुझान की ग़ज़लें वे न स्थूल होती हैं न सपाट। बल्कि
शेरीयत और मिज़ाज की हर सूरत पैरवी करती हैं। उर्मिलेश
ताजमहल को केंद्र में रखकर शेर करते हैं लेकिन अधूरी
तैयारी के साथ । चुनांचे, दो बिखरे हुए मिसरे तो होते हैं,
शेर और उसकी शेरीयत या मिज़ाज नष्ट हो जाता है ।
लेकिन इसके
विपरीत युवा ग़ज़लकार हिंदी में शऊर और संवेदना के साथ
ग़ज़लें लिख रहे हैं। अखिलेश तिवारी का शे’र
ताजमहल बनाने वालों की वेदना को केंद्र में रखकर रचा गया
है लेकिन जिन संकेतों से शे’र
कहा गया है वह कलात्मक ऊँचाई प्रदान करता है :
छुपाऊं शाहजहां
से मैं खुद को लाख मगर
जो ताज गढ़ती
हैं वो उंगलियां कहाँ रक्खूं
!
हर काव्य विधा का अपना चरित्र और अपना स्वभाव होता है।
ग़ज़ल में गेयता के गुण मौजूद हैं। वह गीतात्मक होने के
बावजूद गीत नहीं । दोनों विधाओं की परस्पर निकटता होने के
बावजूद मूलभूत भिन्नताएं हैं। ग़ज़ल को गीत के चश्मे से
देखना-परखना बेमानी होगा, बेशक कुछ गीतकारों, नवगीतकारों
ने ग़ज़ल को गीत के मुहावरे में लिखने का प्रयास किया ।
बिल्कुल यहीं ग़ज़ल का मिजाज आहत हुआ।
विनय संकोची की आजकल में प्रकाशित एक लेख की कुछ पंक्तियां
इसी संदर्भ में गोरतलब हैं-हिंदी में आजकल धड़क्के से
ग़ज़लें लिखी जा रही हैं। लेकिन यदि हम फारसी और उर्दू
ग़ज़ल को सामने रखें तो हिंदी कवियों द्वारा इस विधा को
अपनाने में और इसका साहित्यक रूप बनाए रखने के लिए यह
जरूरी है कि वे उर्दू ग़ज़ल के
मिज़ाज
और उसके सही स्वरूप को समझें । अगर वे ऐसा नहीं करते हो
ग़ज़ल लिखना उनके लिए आसानतरीन हो सकता है।’
आसानतरीन यों कि हिंदी ग़ज़लकारों के लिए फिर ग़ज़ल की
परंपरा, तग़ज़्जुल, मिज़ाज जैसा कुछ नहीं बचता । उर्दू
ग़ज़ल, ऊर्दू ज़बान, ग़ज़ल का उरूज़(व्याकरण)-इन सबका
निषेध करके हिंदी ग़ज़ल लिखी जाएगी तो वह ग़ज़ल जैसी कोई
अन्य विधा होगी या फिर हिंदी के आत्ममुग्ध ग़ज़लकार अपनी
सतही रचनाओं पर कुछ इस तरह रीझा करेंगे:
हिंदी ग़ज़ल
विराट ने लिखी है कामयाब
आलोचकों का
एकमत ये फैसला हुआ
!
चंद्रसेन विराट डंके की चोट पर अपनी ग़ज़ल को न सिर्फ
कामयाब कहते हैं बल्कि आलोचकों से भी इसका फैसला करवाते
नज़र आते हैं।लेकिन प्रश्न यह है कामयाब ग़ज़ल या ग़ज़लें
कौन-सी होती हैं
?
प्रश्न यह भी है कि हिंदी ग़ज़ल में आलोचना है कहाँ
?
बहरहाल, हिंदी
ग़ज़ल में
मिज़ाज
की कमी का एक अन्य कारण सपाट बयानी है। ग़ज़ल मूलतः कोमल
और कुछ हद तक रूमानी विधा है। भाव और कल्पना के जरिए ग़ज़ल
का शे’र
होता है। ग़ज़लकार किसी एक विषय या वस्तु को जेहन में रखते
हुए भाव और कल्पना के जरिए शे’र
को इस कलात्मकता से कहता है कि वह शिल्प और कथ्य की दृष्टि
से नवीन और मौलिक प्रतीत हो। दिवंगत कुमार पाशी का एक शे’र
भाव, कल्पना, शिल्प और कथ्य की परिपक्वता का खूबसूरत नमूना
है गौरतलब है :
पाँव कमरे से
निकाला तो मैं बाज़ार में था
है ये हसरत कि
मेरे घर का भी आँगन होता
!
बाज़ारवाद का विरोध शायर किस अनूठे लहजे में करता है-यही
तग़ज़्जुल है, यही ग़ज़ल का मिज़ाज । दूसरे मिसरे में शायर
की वेदना को भी महसूस किया जा सकता है जिसके घर के आँगन तक
बाज़ार आ पहुँचा है।
इसके विपरीत
हिंदी के ग़ज़लकार ग़ज़ल की प्रवृति को मुकम्मल तौर से
समझे बगैर शे’र
कहते हैं । वहाँ आक्रामकता बेशक हो, ग़ज़ल का
मिज़ाज
नहीं होता । यथाः
बनी जब से यहाँ
पर आपकी सरकार राजाजी
किया है हम
गरीबों पर बड़ा उपकार राजाजी
!
-किशन तिवारी
ग़ज़ल का यांत्रिक हो जाना ग़ज़ल के स्वभाव,
मिज़ाज
और तग़ज़्जुल को आहत करता है। शे’र
अभिव्यक्ति की बहुत छोटी-सी दुनिया होता है। इस दुनिया में
अनुभवों की तीव्र अनुभूति, भावनाओं की हलचल और एक बहुत
महीन-सी घटना घटती है और दो मिसरों में एक शे’र
हो जाता है। इसके पीछे ग़ज़लकार की एकाग्रता, यथार्थ की
समझ और संज्ञान कार्य कर रहे होते हैं।