रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

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ग़ज़ल

 

इक्कीसवीं सदी यानी ग़ज़ल की सदी

गिरीश पंकज

        जिस विधा में रचनाकार अपने आपको अभिव्यक्त करने में सर्वाधिक सुविधा का अनुभव करता है, जाहिर है कि उस विधा से उसका रागात्मक रिश्ता कायम हो जाता है। साहित्य की अनेक विधाएँ हैं और तमाम रचनाकार अपनी-अपनी विधाओं में खुद को सम्प्रेषित करने की कोशिश कर रहे है, करते आए हैं । कबीर, तुलसी ने दोहे, चौपाइयों और दिगर छंदों के सहारे खुद को प्रस्तुत किया तो सौदा, मीर, ग़ालिब जैसे शाइरों ने ग़ज़लों के माध्यम से अपनी भावनाओं को स्वर दिया । मैं दोहे और ग़ज़ल को काव्य-परंपरा की दो निर्मल नदियों की तरह देखता हूँ । एक है गंगा तो दूसरी है जमुना । आज अगर उर्दू वाले दोहे या गीत लिख रहे हैं और हिन्दी वाले ग़ज़ल कर रहे हैं तो ये हमारी गंगा-जमुनी तहजीब का ही प्रमाण है । साम्प्रदायिक सद्-भाव का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि रचनाकार एक-दूसरे की भाषाओं की लोकप्रिय विधाओं में रचना करें। अब ये बात और है कि किसी एक भाषा पर पूरा का पूरा अधिकार मातृ-भाषा के जानकार का ही हो सकता है। लेकिन सिर्फ़ इसी आधार पर हम किसी लेखक को ग़ज़ल या दोहा लिखने से वंचित नहीं कर सकते । भाषा पर पूरा अधिकार भले न हो, उस विधा की निर्धारित शर्तो का अगर पालन किया जा रहा हो तो हमें इतनी उदारता तो बरतनी ही चाहिए कि उसके लेखन को प्रोत्साहित किया जाए। दोहे, चौपाई या अन्य छंदों की निर्धारित मात्राओं के अनुरूप ही लिखा जाए और ग़ज़ल भी रदीफ़, काफिया समेत निर्धारित उन्नीस बहरों के तहत ही लिखी जाए तो निस्संदेह भाषाई सद्-भावना की दिशा में एक उल्लेखनीय कार्य हो सकता है। अगर किसी हिन्दी भाषी लेखक की ग़ज़ल में रदीफ़-काफ़िया, वज़न, मीटर कसौटी पर खरे उतर रहे हों तो फिर उसे ग़ज़ल मानने में किसी को क्या एतराज़ हो सकता है। लेकिन दुर्भाग्य तो यही है कि हिन्दी और उर्दू-दोनों क्षेत्र में कुछ ऐसे मूढ़-मति मिल ही जाते हैं जो अपनी-अपनी भाषाओं की विधाओं की शुद्धता को लेकर कुछ ज़्यादा ही वर्जना या शु्द्धतावादी हो जाते हैं। उर्दू वाला कहता है - हिन्दी वाला क्या ख़ाक ग़ज़ल कहेगा तो हिन्दी वाले चीखेंगे कि उर्दू वाले क्या खाक लिख पाएंगे, दोहे, चौपाई या गीत। प्रख्यात शायर सौदा की ये पंक्तियाँ देखिए-

सावन के बादलों की तरह से भरे हुए,

यह वह नयन है जिनसे जंगल हरे हुए ।

 

        ये गीत की पंक्तियाँ हैं या ग़ज़ल की ? ज़ाहिर है, ग़ज़ल की जो अपने ठेठ हिन्दीपन के कारण गीत का आभास दे रही है। कहने का तात्पर्य यह कि दोहों या ग़ज़ल को किसी धर्म या भाषा की दीवार में क़ैद करके नहीं रखा जा सकता । सौदा भी विशुद्ध हिन्दी में ग़ज़ल कह सकते हैं। भारतेंदु हरिश्चद्र ने भी ग़ज़लें कहीं थीं। विधा किसी की बपौती नहीं हो सकती । फूल की खुशबू पर, उसके सौंदर्य पर सबका अधिकार है। हवा, पानी, सूरज, चंदा सबके लिए हैं । हर कोई इनका उपयोग कर सकता है। ठीक उसी तरह कोई दोहा लिख सकता है तो कोई ग़ज़ल । लेकिन इस बात का भी ध्यान रखा जाए कि कोई भी लिख तो सकता है लेकिन भगवान या अल्लाह के वास्ते कोई कुछ भी न लिखे । विधा के मानदंडों का पालन निहारत ज़रूरी शर्त है।

 

        यह खुशी की बात है कि इन दिनों हिन्दीभाषी रचनाकार खूब ग़ज़लें लिख रहे हैं । ग़ज़ल को हिन्दी या उर्दू की ग़ज़ल कहने की बजाय हिन्दुस्तानी ज़ुबान या भाषा की ग़ज़ल कहना ज्यादा उचित समझता हूँ। हिन्दी ग़ज़ल या उर्दू ग़ज़ल कहकर विवाद पैदा करने की कोशिशें बंद होनी चाहिए । मुझे लगता है कि जो ग़ज़ल इन दिनों लिखी जा रही है, वह सिर्फ़ ग़ज़ल है। उर्दूवाले जो ग़ज़लें कह रहे हैं उनमें तद्भव एवं तत्सम् शब्दों का उपयोग सहज ही दृष्टव्य होता है, उसी तरह हिन्दी वाले जो ग़ज़ल कर रहे हैं उसमें उर्दू शब्दों की बहुलता आसानी के साथ देखी जा सकती है। दरअसल ऐसा इसलिए भी हो रहा हैं कि इनमें अनेक भाषाओं का गुंफन है। और जैसा कि सब जानते हैं कि पाँच-छह सौ साल पहले हिन्दी नामक कोई भाषा ही नहीं थी। संस्कृत के तत्भव शब्दों और ब्रज भाषा या अवधी, राजस्थानी आदि बोलियों के सहारे धीरे-धीरे जो भाषा विकसित हुई, उसे या तो भाषा ही कहा जाता था या भाखा । मुसलमान जब इस देश में आए तो यहाँ प्रचलित ज़ुबान को एक प्यारा-सा नाम दिया - हिंदवी या हिन्दी । गोस्वामी तुलसीदास के समय तक अपनी भाषा हिन्दी का नामकरण नहीं हो सका था। भाषा भले ही मौजूद थी। तुलसीदास जी ने एक जगह लिखा है-

का भाषा का संस्कृत, प्रेम चाहिए साँचा

 

        सूफी कवि मलिक मोहम्मद जायसी का यह दोहा भी आपके ध्यान में होगा-

आरबी, तुरकी हिन्दवी, भाषा तेती आहि ।

जामें मारग प्रेम का, सबै सराहें ताहि।।

 

        इन दो उदाहरणों से सिद्ध हो सकता है कि हिन्दी नामकरण काफी बाद में हुआ । उर्दू भी फारसी की देन है । संस्कृत से हिन्दी निकली तो अरबी फारसी से रेख्ता और उर्दू । और धीरे-धीरे हिन्दी और उर्दू् आपस में इस तरह समरस होने लगे कि एक नयी भाषा ने आकार लेना शुरू कर दिया और यह भाषा थी-हिन्दुस्तानी । आज हिन्दी प्रदेश में रहने वाले हर हिन्दी भाषी की बोलचाल की भाषा में अधिकांश शब्द उर्दू के रहते हैं, इसी तरह उर्दू वालों की ज़ुबा पर हिन्दी के शब्द । इसे हम भाषाई सद्-भावना कह सकते हैं। हिन्दी-उर्दू या उर्दू-हिन्दी के गंगा-जमुनी संगम से बनी भाषा ही हमारी दिनचर्या का हिस्सा है अब । अपनी पुस्तक दीवान-ए-मीर की भूमिका में अली सरदार जाफ़री ने एक जगह मेरी इन्ही् भावनाओं को कुछ इस तरह व्यक्त किया है- वह ज़माना वास्तव में फ़ारसी के पतन और हिन्दी और ऱेख्ता के उत्थान का था और जिस प्रकार समुद्र की लौटती हुई लहरें किनारों पर सीपियों के ढेर छोड़ जाती हैं, फ़ारसी अपने पीछे बहुत-से जवाहिर पारे छोड़ गई । उनमें मुहावरों, तरक़ीबों और शब्दों के अलावा वह बहरें (छंद) भी थीं जो आज उर्दू ही नहीं बल्कि हिन्दी, गुजराती और मराठी शाइरी तक में लोकप्रिय हो चुकी है और ज़्यादतर ग़ज़ल के द्वारा ही प्रचलित हुई हैं ।

 

        श्री जाफ़री बताते हैं कि कई बहरें तो संस्कृत के छदों से क़रीब हैं । ग़ज़लों में यह सम्मिश्रण सिर्फ़ इसलिए संभव हुआ कि प्राचीन फ़ारसी और संस्कृत भाषा का मूल एक है । श्री जाफ़री की बात की प्रामाणिकता के लिए हम यह भी देख सकते हैं कि कैसे ग़ज़ल की कुछ बहरें हिन्दी के छंदों के निकट हैं । जैसे बहरेरमल, हरिगीतिका छंद है, बहरे मुताबिक त्रिभंगी छंद तो बहरे .....हिन्दी की जौपाई । भोपाल के जाने माने शायर सैलानी सियोते अब हमारे बीच नहीं हैं । उन्होंने अपने ग़ज़ल संग्रह  “ग़ज़लांजलि में इन सबका सविस्तार उल्लेख किया है ।

 

        आज जो ग़ज़ल हिन्दी भाषी कह रहे हैं वह हिन्दुस्तानी भाषा में ही कह रहे हैं ना कि हिन्दी में । इसलिए जो लोग ग़ज़ल को लेकर भाषाई दीवार खड़ी करना चाहते हैं उनके आग्रह किया जा सकता है कि वे पहले, अपनी परम्परा को समझ लें, बाद में कोई टिप्पणी करें । ये ठीक है कि उर्दू वाला जब ग़ज़ल कहेगा तो उसमें ठेठ उर्दू का ठाठ नज़र आना स्वाभाविक है । इसी तरह हिन्दी वाला जब गीत या ग़ज़ल रचेगा तो उसमें हिन्दी का ठाठ दिखेगा ही दिखेगा । लेकिन अब भाषाई उदार परिलक्षित  होने लगी है । ठेठ उर्दू के शाइर भी हिन्दी भाषी पाठकों तक पहुँचना चाहते हैं । इसलिए उनकी ग़ज़लों में सरल शब्दों की ही बहुलता रहती है । समझ में आने वाले शब्दों के कारण ये शाइर धीरे-धीरे हिन्दी जगत में भी लोकप्रिय होते जा रहे हैं । साहिर हों या मजरुह सुल्तानपुरी, बशीर बद्र हो या निदा फाजली, इन शाइरों ने हिन्दुस्तानी ज़ुबान में ग़ज़लें कहीं हैं और यही कारण है कि उनकी ग़ज़लें पूरे देश में सराही जा रही हैं । ठेठ उर्दू वाले उर्दू साहित्य तक सीमित है लेकिन जिस शाइर ने हिन्दुस्तानी ज़बान में कहने की सद्-भावना दिखाई, वह हिन्दी जगत में उतना ही लोकप्रिय बन गया । और भी अनेक शाईर ऐसे हैं जो हिन्दुस्तानी ज़बान में शाइरी कर रहे हैं । ऐसे शायर सही मायने में हिन्दुस्तानी शायर कहे जा सकते हैं ।

 

        उपर्युक्त विचार-विमर्श के परिप्रेक्ष्य में यह प्रशन स्वाभाविक ही है कि इक्कीसवीं सदी में ग़ज़ल कहाँ होगी ?  समकालीन ग़ज़ल के क्षेत्र में इतनी प्रतिभाएँ उभर कर सामने आ चुकी हैं जो इस दौर को ग़ज़लों  के माध्यम से अभिव्यक्त होने पर मजबुर कर रही हैं । ग़ज़ल का एक-एक शेर हमारी संवेदनाओं को झकझोरने के लिए पर्याप्त होता है । बैसे तो ग़ज़ले मुसलसल भी होती हैं जिसमें किसी खास विषय पर ही हरेक शेर समर्पित रहता है । हर शेर हमारे मन के दर्पण की तरह सामने आ जाता है । इस सदीं में जब आदमी के पास भागते रहने के अलावा कोई चारा नहीं रहेगा तब भी वह जिस जगह रुकने के लिए बाध्य हो जाएगा, वह जगह होगी ग़ज़ल की सघन छाँह, जिसके नीचे कुछ पल रुक कर राही अपनी थकान दूर कर सकेगा ।

 

        ग़ज़ल की रुढ़ परिभाषा (स्त्री से बातचीत) का काफी पीछे छोड़ चुकी जबान ग़ज़ल के ताप को आसानी से महसूस किया जा सकता है । आजा़दी के संघर्ष के दौर में भी गीतों के साथ ग़ज़लों ने भी क्रांतिकारियों को हँसते-हँसते फाँसी पर झूल के लिए प्रेरित किया था । 'सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिन में हैं' जैसी पंक्तियाँ तो आज भी हमें मर-मिटने का हौसला देती रहती हैं । आज की ग़ज़लों में समूचे जीवन की अनुभूतियों का स्पंदन है । हाँ, ये बात ज़रूर है कि इधर की कुछ ग़ज़लों में तात्कालिकता की भरमार है । ये ग़ज़लें कालजयी नहीं हो सकतीं । लेकिन ऐसी ग़ज़लें भी कही जा रही हैं जिनमें शाश्वत मूल्य बरकरार हैं । जैसे-

मैं अकेला ही चला था ज़ानिबे मंज़िल मगर

लोग मिलते गए और कारवाँ बनता गया (मज़रुह)

 

        इसी तरह-

कैसे आसमान में सुराख़ नहीं हो सकता

एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो ।(दुष्यंत)

 

        इक्कीसवीं सदी में, जहाँ हर चीज़इंस्टेंट चाहिए, तत्काल चाहिए का दर्शन जोरों पर होगा, तब ऐसे लोगों के लिए किसी ग़ज़ल का एक शेर ही काफी हो जाएगा, उसकी प्यास बुझाने के लिए । गागर में सागर भर देने वाली पंक्तियाँ हर युग में उपयोगी बनी रहती हैं । मध्य युग के तमाम कवि आज भी तरोताज़ा बने हुए हैं । दो सौ-तीन साल पहले के शायर आज भी हरे-भरे हैं । ये भविष्य में भी हरे-भरे रहेंगे । एक सही रचना मनुष्य को अंधेरे में मशाल थमाती नज़र आती है । कोई गीत, कोई ग़ज़ल, कोई एक शेर कब, कहाँ किसके मन में आस्था-विश्वास एवं आनंद का संचरण कर दे, कहा नहीं जा सकता ।

 

        इन तमाम भावनाओं के परिप्रेक्ष्य में इस नाचीज़ को तो यही लगता है कि इक्कीसवीं सदी के साहित्यिक आकाश में सर्वाधिक चमकती किरण अगर कोई विधा होगी तो वह ग़ज़ल ही होगी । बशर्ते हिन्दी-उर्दू को लेकर कोई भाषाई विवाद पैदा करने की कोशिश न की जाए । हिन्दी वालों की ग़ज़लों को लेकर नाक-भौं न सिकोड़े जाएँ । विधागत खामियों पर बात होनी चाहिए । ग़ज़ल की धार देखें, उसका शाब्दिक या भावनात्मक श्रृंगार देखें, बस!  इतनी उदारता हम बरत सकें और ग़ज़ल कहने के पहले हिन्दी वाले भी ग़ज़ल की परंपरा और उसके शास्त्र को आत्मसात कर सकें तो कोई दो राय नहीं हो सकती कि इक्कीसवीं सदी ग़ज़ल की सदी होगी।

     

        अंत में अपनी ही दो पंक्तियों के साथ अपने विचारों को फिलहाल यही पर विराम दे रहा हूँ कि

लहलहाती हुई मैं फसल देखता हूँ

इसे मैं किसी का फ़ज़ल देखता हूँ ।

  ये न उर्दू की है और ना हिन्दवी की,

            ग़ज़ल को मैं केवल ग़ज़ल देखता हूँ ।       

 

 

 

ग़ज़ल 

विद्वानों के परिश्रम को विद्वान ही जानता है - अश्वघोष

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