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परम्परा और समकालीनता के बीच ग़ज़ल |
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अनिरुद्ध सिन्हा |
अमीर
खुसरो से लेकर समकालीन परिवेश
तक ग़ज़ल ने ढेर सारे सवालों का
उत्तर दिया है
। विचार एवं तर्क के साथ
सामंजस्य करते हुए
व्यवहारवाद से तर्कवाद तक का लम्बा
रास्ता तय किया है
इसने । विभिन्न कालखंडों में इसके बदले स्वभाव का समग्र
मूल्यांकन असंभव है, फिर भी कुछ मह्त्वपूर्ण बिंदुओं को
छूकर इसकी समग्रता को परिभाषित किया जा सकता है, जैसा कि
आज तक होता आया है
। ग़ज़ल को सिर्फ दुल्हन कहने वालों
ने ग़ज़ल के साथ कितना बड़ा अन्याय किया है इसका अनुमान गालिब
के इस शेर से लगाया जा सकता है
-
इस नजाकत का
बुरा हो वो भले हैं तो क्या
हाथ आये तो
उन्हें हाथ लगाये न बने
।
वहीं दूसरी ओर
अदम गोंडवी कहते हैं
-
माफ करिये सच
कहूँ तो आज हिन्दुस्तान में
कोख ही जरखेज
है अहसास बंजर हो गया ।
गालिब असामान्य
रूप से बहुमुखी व्यक्तित्व के धनी थे, उनका व्यक्तित्व
सृजनात्मक दर्शन, आत्मिक संस्कृति की जड़ों तक समाया हुआ
था, सहज या हल्के ढंग से गालिब का मूल्यांकन असंभव है, जबकि
अदम गोंडवी सीधे-सीधे कहने वाले ग़ज़लकार हैं
। रचनात्मक प्रगति के प्रति निष्ठावान होते हुए उन्होंने समकालीन
सामाजिक विसंगतियों पर करारा प्रहर किया है जिसकी आवाज़ दूर
तक जाती है ।
हिन्दी
और ग़ज़ल
? इस
बात पर कुछ लोगों को एतराज होगा, होना भी चाहिये क्योंकि
ये वही लोग हैं जिन्होंने कविता को छंद रूप आवरण से
निकालकर इसकी आत्मा को लहूलुहान किया है, अन्य भाषाओं की
तुलना में हिन्दी कविता के पाठकों का पलायन इस बात का
संकेत है, यह सच है कि स्थापना काल में ग़ज़ल को
ग़ज़लकारों से ही ज्यादा प्रताड़ित होना पड़ा
। इसके मूल
संस्कार के साथ छेड़छाड़ की गई, किसी ने इसे हिन्दी ग़ज़ल
कहा, किसी ने तेवरी और किसी ने गीतिका, परिणाम के नाम पर
शून्य । हाँ भले छंदों के विरुद्ध चलाये गये अभियान को इससे
थोड़ा बल मिला
। साहित्य में धीरे-धीरे सीमित प्रतिबद्धता
समाप्त होने लगी है
। यह यह सृजन के लिये शुभ संकेत है,
प्रतिबद्धता गुणात्मक विकास का कारक नहीं बन सकती, जीवन की
बात करने के बावजूद जीवन के कई पक्ष अधूरे रह जाते हैं
। उदाहरणार्थ रीति काल, भक्ति काल, छायावाद, अधोषित
साम्यवाद काल
। समकालीन परिवेश में साम्यवाद की चर्चा
अपेक्षित हो जाती है
। साम्यवाद से मेरा आशय उस साहित्यिक
गिरोह से है जिसके चंगुल में आज पूरा हिन्दी साहित्य फंसा
हुआ है, कभी-कभी रचनाकार मुख्य धारा में आने के लिये भी
प्रतिबद्ध लेखन का सहारा लेता है, यह जानते हुये कि
समग्रता प्रभावित होगी, साहित्य में आजकल प्रतिबद्धता
तकिया कलाम की तरह है ।
ग़ज़ल
की कलात्मक स्वाभाविक अभिव्यक्ति पाठकों के साथ-साथ
ग़ज़लकारों को भी आन्दोलित करती है
। इसकी सकारात्मक
उपलब्धियों की जितनी प्रशंसा की जाये कम है
। भारतेंदु जैसे
कवि को भी नाम बदलकर (रसा) ग़ज़ल कहने के लिये विवश होना
पड़ा । बुनियादी कसौटी पर वे भले ही पिछड़ गये हों मगर उनके
ग़ज़ल लेखन को खारिज नहीं किया जा सकता
। कोई भी लेखन काफी
सत्यभाषी रहने के बाद भी अगर उसमें गुणात्मक विकास के
लक्षण नहीं हैं तो उसे ज्यादा दूर तक खींचकर ले जाना
मुश्किल होता है
। लेखन में
लेखकीय प्रतिबद्धता की काफी गुंजाइश रहती है ।
‘रसा’
ग़ज़ल के प्रतिबद्धत ग़ज़लकार नहीं हो सके
। जाहिर है उनकी
लेखकीय प्रतिबद्धता वैचारिक नहीं है
। कहीं न कहीं अवश्य
भ्रमित हुई होगी
। फैशन के साथ उनका नाम
जोड़ना साहित्यिक अपमान होगा । फैशन का दूसरा नाम है रचनाकार की
आत्मपरक मनमानी
। कहीं-कहीं यह मनमानी सकारात्मक रूप
भी
अख्तियार कर लेती है, ग़ज़ल लेखन की श्रृंखला में लोग कबीर
का भी नाम लेते हैं, मगर कबीर की साहित्यिक समग्रता को
देखने के बाद यह कहीं से न्यायसंगत नहीं लगता कि कबीर को
ग़ज़लकार के रूप में प्रस्तुत किया जाये
। तुक संयोजन और
सैद्धांतिक शास्त्रीयता दोनों अलग-अलग हैं
। इसी अलगाव के
बीच कबीर खड़े नज़र आते हैं
।
प्राचीन
साहित्यिक धारणाओं की ओर दृष्टिपात करें तो लगता है ग़ज़ल
भी वादों से मुक्त नहीं रही है
। निराशावाद, श्रंगारवाद,
रूपवाद आदि ऐसे कई वाद आये और चले गये
। सत्तर के दशक तक
ग़ज़ल पर श्रृंगारवाद का प्रभाव रहा
। उसके बाद यह पूरी
तरह यथार्थवाद की ओर मुड़ गई
। पूर्व व उत्तरवर्ती सृजन के
अन्तर को इसने साफ-साफ विभाजित किया
। सिद्धांत के चले हुये
मुहावरे अभिव्यक्ति में नरम होने लगे
। मानवीय संवेदना का
विस्तृत पक्ष जो करुणा के अधिक निकट है, विकसित और चिन्हित
हुआ । विषय और विचार ही मगर पहले शब्दों और शीर्षकों में
तकियाकलाम बनकर उद्घोषित, उच्चारित होते थे
। वे सम्पूर्ण
सृजन संसार में समाहित होने लगे
। सिद्धांत या सोच की जड़
में प्रवेश कर बाहर की तरफ प्रकाशित होना यह ग़ज़लकारों की
उपलब्धि मानी गई
। सिद्धांत या सोच का सम्पूर्ण सृजन की
दुनिया में हमेशा कठिन कर्म रहा है, लेकिन ग़ज़ल को ऐसी
विवशता तोड़ने में सफलता मिली है
। पाठकीय स्वीकृति इसका
पुख्ता प्रमाण है, मोटे तौर पर सत्तर के दशक को ग़ज़ल का
नव जागरण काल भी मान सकते हैं
। नव जागरण का सीधा-सीधा अर्थ
होता है
‘नई
चेतना का उदय’
जिसका मुख्य स्वर होता है समाजवादी विचारधारा के माध्यम से
समस्याओं का बेहतर समाधान
।
सत्तर के दशक में ग़ज़लकारों की
जो पीढ़ी उभरकर सामने आई उसमें ज्यादा प्रखर दुष्यंतकुमार
माने गये । ग़ज़ल का हिन्दी में प्रवेश का काल भी इसी को
माना जाता है
। इसी दशक में कई समर्थ गीतकार ग़ज़ल की ओर
मुड़े जिनके नामों का क्रमवार उल्लेख करना मुश्किल है
। कुछ
ऐसे कवि, ग़ज़लकार ही थे जो मुक्तछंद कविता में भी हाथ-पाँव
मार रहे थे और ग़ज़ल में भी
। उनकी दुखद परिणति का लेखा-जोखा काफ़ी प्रयास के बाद भी उपलब्ध नहीं हो सका
। वैसे भी
उन्हें तार्किक परिणति पर लाना मनोवैज्ञानिक विकलांगता ही
मानी जायेगी
। नकारात्मक परिघटना को सिद्ध करने से कोई
नियमसंगत परिणाम नहीं निकलता ।
दुष्यंतकुमार ने अपनी ग़ज़लों में वैचारिक क्रमबद्धता का
बेहतर उदाहरण पेश किया है । उनकी लोकप्रियता इस धारणा को
प्रमाणित करती है
। उन्होंने अपने विचार एवं तर्क के माध्यम से
भौतिक, सामाजिक विसंगतियों पर जमकर प्रहार किया है
। उन्होंने
ग़ज़लों में पूरा कथा का अवतरण न कर उसकी दिशा बहुल
सृजनात्मक रंग छाया का आभास देते संवेद्य तनाव को बनाये
रखा । विचार की जगह संवेदना को उन्होंने प्रश्रय दिया
। उनका
रचनात्मक तनाव पारदर्शी समाज की स्थापना पर केन्द्रित रहा
।
प्रयोग के लिये प्रयोग नहीं करना उनकी सबसे बड़ी विशेषता
है । उनकी सरल सीधी ईमानदारी और सच्चाई सदैव पाठकों को अपनी
ओर आकर्षित करती रही
। उन्होंने जो भी कहा साफ कहा, जैसे
-
पुराने पड़ गये
डर फैंक दो तुम भी
।
ये कचरा आज
बाहर फैंक दो तुम भी
।
व्यक्ति के नैतिक कर्तव्यों के बार में धारणायें समय के
साथ बदलती रहती है
।. पुरानी मान्यतायें सदैव काम नहीं
देतीं । मार्क्स ने भी कहा है,
“इसमें
लेशमात्र भी संदेह नहीं कि समाजवादी विचारधारा अपनी प्रकृति
से सामाजिकवर्गीय सर्वहारा विचारधारा होने के बावजूद अपनी
अंतर्वस्तु की दृष्टि से वर्गीय दायरों के भीतर ही नहीं
बंधी रहती और महान सार्वजनीन मूल्य उसमें ही निहित हैं,”
इस शेर में दुष्यंत की यही विचारधारा साफ-साफ दिखलाई पड़ती
है ।वाद का प्रदर्शन किये बिना उसे स्थापित कर देना ही उनकी
विशेषता थी ।
हमारे देश में
गहरी जड़ों के साथ स्थापित मानववादी विचारधारा को दुष्यंत
ने इन शब्दों ने इन शब्दों में व्यक्त किया-
मत कहो, आकाश में कुहरा घना है
।
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है
।
संघर्षशील मानव सदैव जनधर्मी बना रहता है और अपने स्वभाव के
अनुरूप संघर्ष, दुख, परिताप में मुंदी आँखों से विशिष्ट की
झलकियों में निमग्न रहता है और वहाँ विशिष्ट से टकराकर
इष्ट के ठोस धरातल पर खड़ा हो जाता हैः
बहलाके अपने पास बुलाकर फरेब से
नदियों को
लूटना तो समंदर का खेल है
।
-राजेश रेड्डी
कश्तियां मल्लाह की जब कर रही हैं सैर बाबा
।
क्या नदी की मछलियों की पूछते हो खैर बाबा
।
-प्रेम किरण
यर्थाथवादी
समस्याओं के स्थान पर किसी प्रतिबद्ध वाद का हस्तक्षेप
समकालीन ग़ज़लों में दिखाई नहीं पड़ता
। वाद जब फैशन का रूप
धर लेता है तो उसकी स्वाभाविक महत्ता स्वतः ही समाप्त हो
जाती है जिसकी सीधा-सीधा प्रभाव रचनाओं पर पड़ता है
। मिसाल
के तौर पर चंद्रसेन विराट का यह शेर
-
जिनने अपने कंधों पर अक्षय तूणीर जुटाया है
उनके सक्षम हाथों में ही तो गांडीव पिनाक रहे
।
व्यक्ति और परिवेश की चिंता आज की ग़ज़लों का मु्ख्य स्वर
है । बहस और आलोचना की दुनिया में इसे एक
बेहतर प्लेटफॉर्म की आवश्यकता है अन्यथा यह अपने बेहतर
प्रदर्शन के बाद भी पीछे छूट जायेगी।