रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

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एक शब्द

 
उड़ना/उड़ाना

डॉ. गंगा प्रसाद बरसैया

ये दोनों शब्द एक से लगते हैं पर अन्तर्निहित भाव में बड़ा अन्तर है। पक्षी और हवाई जहाज उड़ते हैं लेकिन हम उन्हें उड़ाते हैं । जहाज को पायलट चलाता है उसी को उड़ाना कहते हैं और हम उसमें बैठे हों तो हम अपने लिये भी कहते हैं कि हम उड़कर दिल्ली से बम्बई गये थे जबकि हम तो  बैठे थे और चालक ने चलाया था। पक्षी कहीं बैठे हों तो हम उन्हें भगाते हैं। यह भगाना ही उड़ाना कहा जाता है जबकि पक्षी स्वयं अपने पंखों के सहारे उड़ते हैं। कई लोग हवा में उड़ते हैं, हवाई मारते हैं यानी कल्पना में रहते हैं जबकि कुछ लोग हवा उड़ाते हैं। हवा उड़ाना या अफवाहें उड़ाना बड़ा घातक होता है। एक बार हवा उड़ जाये तो नियंत्रित करना मुश्किल होता है। हवा में उड़ना और हवा उडाना अथवा हवाई जहाज उडा़ना एक नहीं है । कुछ लोगों का ऊँची उड़ाने भरने का स्वभाव ही होता है। वे सदा बड़ी-बड़ी बातें करते हैं।

 

कुछ लोग फुरसत में पतंगे उड़ाते हैं और कुछ मक्खियाँ उड़ाकर अपनी बेकारी दूर करते हैं। मक्खियां वही उड़ाते या मारते हैं जो बेकार हैं। कुछ शातिर लोग किसी का सामान लोग उड़ा उड़ा देते हैं, न चोर का पता चलता है, न चोरी का और कुछ चंट लोग सीधे-सादे लोगों को बातों में ही उड़ाते रहते हैं । उनकी बदमाशी को समझना कठिन होता है । कई लोग केवल उड़ती-उड़ती बातें करते हैं। उनमें कोई गंभीरता नहीं होती और न तारतम्य होता है। कई कवि लेखक दूसरों के भाव और पंक्तियाँ ही नहीं पूरी की पूरी रचनाएँ उड़ाकर अपने नाम से छपवा लेते हैं । उनका दुस्साहस गज़ब का होता है। कुछ हिम्मती लोग अपनी फूंक से पहाड़ उड़ाने का असंभव दावा करते हैं। जब लक्ष्मण ने बड़ी-बड़ी बातें की तो परशुराम को कहना पड़ा-चहत उडा़वन फूंकि पहारा।

 

उड़ाने का एक अर्थ खेती-किसानी से भी जूड़ा है। गहाई या मड़ाई के बाद भूसा से अनाज को अलग करने को उड़ाना, ओसाना या उड़ावनी कहते हैं। बाप की कमाई में सभी लोग मौज-मजा उड़ाना चाहते हैं। तब उन्हें पता ही नहीं रहता कि पैसा कमाने में कितना श्रम या कष्ट उठाना पड़ता है। कुछ लोगों की दृष्टि इतनी पैनी होती है कि वे उड़ती चिड़िया पहचान लेते हैं। आप अपने भीतर के भाव या रहस्य को कितना ही छिपायें, वे बड़े दावे से कहते हैं - श्रीमान् हम तों उड़ती चिड़िया पहचानते हैं। हमें चराने की चेष्टा मत करो । जब से एक रानी को लोक कथा में कौवे उड़ाने का काम दिया गया तब से कौवे उड़ाना गुलामी का प्रतीक बन गया। वैसे कई लोग बैठ-बैठे फाख्ते भी उड़ाते हैं । बेकारी में तो मक्खी उड़ाना संभव होता है पर बीमारी हालत में मक्खियाँ भी नहीं उड़ती। आदमी बहुत असमर्थ हो जाता है।

 

कुछ लोग लड़कियाँ उड़ाने में बड़े माहिर होते हैं । आये दिन पढ़ने-सुनने को मिलता है कि अमुक लड़की उड़ा दी गई। यहाँ उड़ाने का आशय भगाने से है जबकि अन्य सामान उड़ाने का मतलब चोरी करने से या गायब करने से है। कोई लोग जल्दी पहुचने के लिये भी उड़कर पहुँचना कहते हैं। कुछ लोग मन की उड़ाने भरकर अपने को बहलाते रहते हैं। मन बड़ा अस्थिर, कल्पनाशील और गतिवान है। कहीं से कहीं पहुँचता है और जाने क्या-क्या सोचता है. लोग कहते हैं जितने पंख फैलाओगे उतना ऊँचा उड़ोगे। बिना पंख जरूरी के उड़ना असंभव है । दुश्मनों की उड़ा बंद करने के लिए पंख काटना जरूरी माना जाता है। न पंख़ रहेंगे, न उडान भरेंगे। रावण ने जटायु के पंख काट दिये तो बेचारा धराशायी हो गया। हमेशा के लिए उड़ना बंद हो गया।

जहाँ तक संभव हो आदमी को हवा में उड़ना नहीं चाहिये । ज़मीन से टिका रहना अधिक श्रेयष्कर होता है। कई लोग बेसिर पैर की निराधार बातें उड़ाते हैं, हमें उन पर विश्वास नहीं करना चाहिये।

       

 

 

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