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माचिस का आतंक
समीकरण ये आग के, राख धुएँ के अंक,
बस्ती में छाया रहा, माचिस का आतंक । 
रोटी के भूगोल थे, रोटी के
इतिहास,
थे रोटी की पीठ पर, इक रोटी के क्रास ।
रोया आधी रात में, एक गुलाबी फूल,
हत्यारे हँसते जला, सपनों के स्कूल ।
सबसे बड़ी बीमारी, एक गरीबी नाम,
कहने को संसार में, जिसके नाम, अनाम ।
भय से लगभग काँपते, और झूठ से दूर,
झूठ बोलने के लिये, लोग यहाँ मजबूर ।
बोझ उठा सिर-फिरों का, इक काँधों पर रोज,
काँधों ने ढोया यहा, रोज सरों का
बोझ ।
लाए दुख के गाँव तक, हर मुश्किल को खींच,
दुख भी बड़े विनम्र थे,
संघर्षों के बीच ।
सत्य कठिन, उससे कठिन, यहाँ सत्य के बोल,
जिसमें सिमटी पृथ्वियाँ,
सिमटे थे भूगोल ।
दिनेश शुक्ल
भरे समन्दर बीच
फूली सरसों पर लिखे, सूरज ललित निबंध,
सोने को सौभाग्य से, जैसे मिले सुगन्ध ।
जलते-बुझते दर्द की, जैसे हो कन्दील,
सबके आँखों चल रही, अब आँसू की रील ।
कायम है संवाद भी, दूरी भी है ध्यान,
हम दोनों के बीच में, इक पुल है वीरान ।
पूजा छूटी बाहरी, भीतर है आराम,
माला मनका मंत्र सब, हुआ तुम्हारे नाम ।
आवभगत के नाम पर, मिल जाती है चाय,
हुई सिमटकर ज़िंदगी, हलो हाय गुडबाय ।
दुःख के दाने देखकर, चमक उठी तक़दीर,
लगी फुदकने ख़्वाब में, गौरइया-सी पीर ।
हरदम रहती ज़िंदगी, अपनों से हैरान,
जूता काटे पाँव को, सोना काटे कान ।
सुख को तरसाता रहा, सपनों का मारीच,
मछली प्यासी आज भी, भरे समंदर बीच ।
डॉ. विनय मिश्र
क्या इन्सानी दर्द
मंदिर से उड़े कपोत, मस्जिद की मीनार,
भेद करे इन्सान पर, वो करते हैं प्यार ।
जात-पात औ' धर्म
तो, बने यहाँ हथियार,
राजनीति की जंग में, कूदे जब मक्कार ।
ये मनुजता है यारों, जीवन की बुनियाद,
काश, समझ लेती अगर, राजनीति जल्लाद ।
रीति-नीति सब ताख में, पहने सर पर ताज,
जन-सेवा की आड़ में, वह भूप हुए आज ।
पत्रकारी, जन-सेवकी, करली सब से राम,
फोकट में सब मिल गये, दौलत सत्ता नाम ।
अश्क अपने ख़ुद पी ले, मत कर आँखें जर्द,
सियासत की बिसात पर, क्या इन्सानी दर्द ।
ख़ान आर 'दर्द'

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