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कौन से डिटरर्जेंट से
धुलेगा पुलिस का दाग |
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अशोक
रहाटगांवकर |
आज
जब हम टी.व्ही. पर अनेक डिटरर्जेंट के विज्ञापन देखते हैं
तो
हमारा मन उन डिटरर्जेंट की विशेषता जानने के लिये आतुर
हो उठता है । कभी सर्फ एक्सेल की बात होती है तो कभी चकित
कर देने वाले टाईड की । कभी रिन शक्ति की तो कभी निंबू से
भरा व्हील । कभी निरमा तो कभी जिद्दी दाग निकालने वाले
वेनिस शक्ति ओडू की । सारे ही डिटरर्जेंट अपने अपने तरीके
से कपड़ों पर लगे दाग को निकाल देने का दावा करते हैं ।
ऐसे समय में सहज रुप से हमारे दिमाग में एक प्रश्न उपस्थित
होता है कि काश ऐसा भी कोई साबुन या डिटरर्जेंट निकला होता
जो पुलिस की वर्दी पर लगा गहरा दाग धो सकता ।
पुलिस विभाग बहुत समय से अपनी कार्य प्रणाली को लेकर चर्चा
में रहा है और अब लगभग वह दागदार और भ्रष्ट समझा जाने लगा
है । पुलिस बर्बरता के किस्से मीडिया के माध्यम से दर्शक
कई बार सुन चुके हैं । उसका मुख्य कारण यह है कि अंगरेज़ों
के ज़माने से चले आ रहे नियम कायदे और उसकी कार्य प्रणाली
में कोई कभी बदलाव नहीं आया है । देश को स्वतंत्र हुये कई
दशक का बीत चुके हैं परंतु इस ओर किसी भी सरकार ने
गुण-दोषों को परखने की जरुरत ही नहीं समझी ।
ज़माना था कि मुंबई की पुलिस को लोग स्काटलेंड की पुलिस का
दर्जा दिया करते थे उसे आज भ्रष्ट और बर्बर कहते हैं । आये
दिन उसके किस्से देखने और सुनने को मिलते हैं । पुलिस की
कार्य प्रणाली को लेकर देश के सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की
है कि पुलिस की छवि को हर हालत और किसी भी क़ीमत में
सुधारना होगा । जाहिर है कोर्ट ने ये टिप्पणी इसलिये भी की
होगी कि उसे पुलिस बर्बरता को देखने परखने का अवसर मिला
होगा । सुप्रीम कोर्ट भ्रष्टाचार के मामले में भी टिप्पणी
करने मे नहीं चुका । माननीय न्यायाधीश महोदय ने अपने फैसले
के दौरान हरियाणा के एक प्रकरण पर टिप्पणी करते हुये कहा
था कि थानेदार ही पीड़ित से मामले की रिपोर्ट लिखने के
लिये 3500/-घूंस
मांगे तो ऐसे विभाग से क्या उम्मीद की जा सकती है ।
भ्रष्टाचार का और कैसा उदाहरण चाहिये
?
सुप्रीम कोर्ट की इस बेबाक टिप्पणी से आहत केन्द्र सरकार
और गृहमंत्रालय ने समस्त राज्य सरकारों को पुलिस की छवि
सुधारने के लिये कार्य योजना बनाने का निर्देश भी दिया ।
दोनों सरकारें इस पर गंभीरता से विचार कर ही रही थीं कि
पुलिस बर्बरता के कई किस्से एक के बाद एक मीडिया में
प्रसारित होते रहे । दूरदर्शन पर यदि सारा विश्व इसे देख
रहा हो तो विभाग या सरकार के लिये इसे छिपाना भी मुश्किल
हो जाता है ।
नागपुर के खैरलांजी प्रकरण में जनता और पुलिस आमने-सामने
हुई । हरियाणा, लखनऊ में भी पुलिस बर्बरता का सामना वहाँ
की जनता को करना पड़ा । जनमानस में बढ़ता आक्रोश उसकी
कार्यप्रणाली के लिये आग में घी डालने जैसा काम करता है ।
ये माना की सिधाई से काम नहीं हो सकता परंतु उसकी आड़ में
पुलिस सारी हदें पार कर लेती है । मीडिया तो समाचारों को
बढ़ाचढ़ा कर बताता है - ऐसा आरोप हर वो विभाग लगाता है
जिसके बारे में समाचार प्रसारित होता है । परंतु पुलिस
बर्बरता की इंतेहा तो उस दिन हुई जब मुंबई में नेत्रहीनों
को उसने बेरहमी से पीटा और अपनी व्हेन में ठकेल दिया । ये
अभी पिछले दिनों का किस्सा है पूरे विश्व ने अपनी आँखों से
पुलिस का नंगा नाच देखा है । नेत्रहीनों के साथ इस प्रकार
का व्यवहार मानवता को लज्जित करने वाला है । अरे, पुलिस
वाले ये क्यूं भूलते हैं कि वे स्वयं भी एक इंसान है ।
वर्दी के नशे में ऐसा व्यवहार करना क्या उस वर्दी
का, उस मोहकमे का, उस राज्य का, उस देश का अपमान नहीं है
?
अभी एक दैनिक ने कुछ दिन पहिले पुलिस हिरासत में जो मौंते
होती है उसके आँकड़े प्रकाशित किये थे जो चौकाने वाले थे ।
उन आंकड़ों को पढकर ऐसा लगता था मानो वह हवालात न होकर
कसाई खाना है जहाँ कसाई उन्हें बड़े आसानी से कत्ल कर देता
है । अब तो महिलाओं के साथ बदसलूखी, बलात्कार की धमकी जैसे
समाचार तो आम हो गये हैं । जो विभाग महिला का सम्मान नहीं
कर सकता भला उससे न्याय की क्या अपेक्षा की जा सकती है ।
गरीब और अनपढ़ की तो बात ही और है वह तो बेचारा चुपचाप
इनकी बर्बरता को सह लेता है ।
कानून और वर्दी का डर ही जब न हो तो उसकी किसी भी समस्या
का समाधान ढूढा़ ही नहीं जा सकता बदमाश गुंडो के साथ
मिलीभगत और सभ्रांत के साथ बदसलूखी यही चित्र आजकल आमतौर
पर उभर कर जनता के सामने आ रहा है । माना कि आजकल के अपराध
भी हाई टेक होते चले जा रहे हैं जिससे निपटने के लिये वह
सीधाई से पेश नहीं आ सकती । परंतु इसके लिये दोषी भी वही
है । यदि उसने समय समाज को उनकी बातें सुनकर उसके साथ
अच्छा व्यवहार किया होता और बदमाशों के साथ कड़ाई बरती
होती तो आज उसकी वर्दी पर यह बदनुमा दाग न लगा होता । आज
उसे खुले आम जनता के आक्रोष का सामना नहीं करना पड़ता ।
उसकी कार्य प्रणाली को स्काटलेंड का दर्जा देकर इतने नीचे
नहीं ढकेला जाता । सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से सरकार को
सजग होना चाहिये । उस विभाग का मनोविज्ञान क्या है जानने
की अत्यंत आवश्यकता है ।
भला हो उस सुप्रीम कोर्ट का जिसने ऐसे पीड़ितों को राहत
दिलाई है जिनके एफ.आई.आर पुलिस नहीं लिखती या लिखने में
टालमटोल करती है । आजकल इस रवैय्ये को देखते हुये मुख्य
न्यायाधीश ने स्पष्ट किया है कि ऐसी दशा में पीड़ित की
शिकायत लिखा पत्र ही याचिका समझकर स्वीकार किया जावेगा और
उस पीड़ित को न्याय दिलाया जावेगा । उसकी कर्य प्रणाली के
कारण ही उसे चश्मदीद गवाह नहीं मिलते जिसके चलते अपराधी
छूट जाता है । संभ्रात व्यक्ति तो इस विभाग की बर्बरता को
देखकर ही अपने हाय खींच लेता है ।
आवश्यकता है पूरे तस्वीर को बदलने की जिससे लगा बदनुमा दाग
धुल सके । या तो सरकार तय करें या सामाजिक संगठन कि किस
तरह का बदवाल या परिवर्तन लाया जा सके जो विभाग का अपना
खोया हुआ विश्वास सम्मान वापस ला सके ।
घर नं 30/29,
“सुखसागर”
कुलकर्णी
क्लिनिक के पास,
हनुमान मंदिर,
गली, तात्यापारा, रायपुर
