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इतिहास

 

इतिहास के पन्नों में झिलमिलाता झारखंड


           
प्रागैतिहासिक काल में छोटानागपुर घनघोर जंगलों से आच्छादित था । परन्तु यह क्षेत्र बाहर से अलग नही था । भागोलिक स्थिति से इस क्षेत्र को काफी लाभ मिला । कैमुर और विन्ध्य की श्रेणियों ने उत्तर से होनेवाले आक्रमणों से अभयदान दिया । वास्तव में गुप्त वंश के शासकों और शशांक को छोड़कर प्राचीन भारत के किसी राजवंश ने इस क्षेत्र में अधिक समय तक राज्य नहीं किया ।

           
खरिया, विरहोर तथा असुर छोटानागपुर की प्राचीनतम जनजातियाँ हैं । मुण्डा, उराँव, हो जनजातियाँ बाद की हैं । कोरवा प्राचीन एवं बाद के बीच की है । चैरो, खेरवार, भूमिज तथा संथाल आदि और भी परवर्ती काल के हैं । खरिया और विरोहर संभवत: कैमूर की पहाड़ियों से होकर छोटानागपुर मे प्रविष्ट हुए थे । वे विरजिया और असुरों की तरह छोटानागपुर मे प्रविष्ट होने वाली प्रारम्भिक जनजातियों में से एक है ।

           
मुण्डा जनजाति का प्रवेश पथ और समय अनिश्चित है । मुण्डा परम्परा के अनुसार वे लोग मध्य भारत और उत्तर प्रदेश से भागकर आये थे जब उस क्षेत्र में आर्यों का आगमन हुआ । आर्यों के विस्तार के बाद वे रोहतास क्षेत्र और बाद मे छोटानागपुर भाग गये । एक अन्य मान्यता के अनुसार मुण्डा तिब्बत से दक्षिण बिहार आये । वहाँ से उराँव, चैरो और खरवारों द्वारा भगाये जाने पर वे छोटानागपुर क्षेत्र में चले आये । आगे चलकर मुण्डाओं ने ऐतिहासिक नागवंश की स्थापना में योगदान दिया ।
 

उराँव जनजाति संभवत: दक्षिण भारत के निवासी थे क्योंकि भाषाविदों ने कुरूख और कन्नड़ तथा तमिल के अनेक शब्दों में एकरूपता पाई है । वे घुमक्कड़ किस्म के थे और कई जगहों पर घुमते हुए छोटानागपुर पहुँचे थे । ऐसी भी मान्यता है कि मुण्डा और उराँव आर्यों के आने के पूर्व उत्तर पश्चिम भारत से छोटानागपुर आये थे । जो भी हो उनके प्रवजन का एक पड़ाव निश्चित है और वह रोहतागढ़ है । संभव है कि मुसलमानों के आक्रमण के कारण उन्हें यह स्थान छोड़ना पड़ा लेकिन वे स्वीकार करते हैं कि फणिमुकट राय के राजा बनाये जाने से पूर्व ही वे छोटानागपुर में बस चुके थे । रोहतास से निकाले जाने के बाद उराँव दो शाखाओं मे बंट गये ।

           
एक शाखा गंगा के किनारे चलती हुई राजमहल की पहाड़ियों के पास पहुँची और वहाँ बस गई । इन्हीं का वंशज वर्तमान में मालेर जनजाति है । दूसरी शाखा सोन पार कर उत्तरी कोयल की घाटी में प्रविष्ट हुई । कुछ लोग पलामू में बस गये और शेष छोटानागपुर आ गये ।

           
इस युग में 'भूमिज' और संथाल बहुसंख्यक थे । इनकी मिली जुली संख्या कई लाख थी । ये दोनों आर्यों के विरोधी थे । यही कारण है कि आर्य उन्हें 'स्वान पूजक' ब्राह्नण विरोधी आदि कहते थे । उन्हें 'अदर्शनीय', 'अमानवीय', 'मांसभक्षक', 'जीवभक्षक' और जादू-टोना के ग्याता के रूप मे जाना जाता था । मुण्डा और उराँव की तरह भूमिज और भूइयां जनजातियाँ भी छोटानागपुर में अत्यन्त प्राचीन काल से बसी थी । दक्षिण बिहार में दूर-दूर तक इनकी आबादी फैली हुई थी । अंतत: भूमिज मानभूम क्षैत्र में और हो तथा भूइयाँ क्रमश: सिंहभूम तथा पलामू क्षेत्र में सिमटकर रह गये । वे काफी दिनों तक बाह्य लोगों को अपने क्षेत्र में प्रवेश करने से रोकते रहे ।
 

        इस प्रकार यह स्पष्ट है कि एक हज़ार ई०पू० तक चैरो-खरवारों तथा संथालों को छोड़कर यहाँ उपलब्ध प्राय: सभी जनजातियाँ छोटानागपुर क्षेत्र में बस चुकी थी । छोटानागपुर खास में मुण्डा-उराँव, सिंहभूम तथा हज़ारीबाग में हो, मानभूम में भूमिज, पलामू में उराँव तथा विरजिया जनजाति की प्रधानता थी । पूर्व मध्यकाल में हजारीबाग में संथाल तथा पलामू में चैरों खरवार आके बसे ।

            गौतम बुद्ध के जन्म स्थान के बारे में एक लेखक अमरनाथ दास का विचार है कि उनका जन्म छोटानागपुर में ही हुआ था और यह उनकी कर्मभूमि थी । उन्होंने पलामू मे उन स्थानों का ज़िक्र किया है जो उनके विचार मे बुद्ध के जीवन से संबंधित थे । लेकिन पुरातात्विक साक्ष्य इस बात का समर्थन नहीं करते हैं । फिर भी यह कहा जा सकता है कि छोटानागपुर क्षेत्र पर बौद्ध धर्म का गहरा प्रभाव पड़ा था । अनेकों स्थानों पर बौद्ध धर्म से सम्बद्ध अवशेष बिखरे पड़े हैं । उनमें से कुछ को रांची विश्वविद्यालय के स्नातोकर इतिहास विभाग में देखा जा सकता है । स्नातोकर इतिहास विभाग मे उन पुरातात्विक सामग्रियों का रख-रखाव ठीक नहीं है । उसे किसी संग्राहालय में रखना चाहिये ।

        झारखण्ड के कई क्षेत्रों में बौद्ध धर्म के अवशेष पाये जाते हैं - धनबाद के दालसी और बुद्धपुर में अनेक स्मारक बने हुए हैं । दालसी स्वर्णरेखा नदी के उत्तरी तट पर स्थित है और यह स्थान दियापुर दालसी के नाम से जाना जाता है । टी. ब्लाश के अनुसार उपरोक्त स्थान के पाँच-सात किलोमीटर क्षेत्र में बौद्ध अवशेष मिले थे । बेगलर ने उन अवशेषों को दसवीं सदी का बताया है । पुरूलिया (पश्चिम बंगाल) के इर्द-गिर्द भी अनेक बौद्ध खंडहर देखे गये थे । पाकबीरा और बारहमिया गांवों के बीच लाथोनटोंगरी नामक पहाड़ी है जहाँ बेगलर ने कुछ अवशेष पाये थे ।

        पुरूलिया से ६ किलोमीटर दक्षिण कर्रा ग्राम है । वहाँ से तीन किलोमीटर उत्तर पश्चिम घोलमारा नामक स्थान में एक ऊँची जगह पर एक बाग में ए० शास्त्री ने कुछ खंडहर देखे थे । उसी प्रकार हजारीबाग जिले में बरही के निकट सूर्यकुंड ग्राम में चार ग्रम झरने हैं । वहाँ 1918 में एक एम. होलो ने कई आकृतियों को देखा था जिसमें एक पर पत्थर पर बुद्ध की आकृति थी ।


 
        राँची जिला के खूटी नगर से तीन किलोमीटर दक्षिण पश्चिम में बेलवादाग ग्राम है जहाँ एक टीलहा बौद्ध बिहार के अवशेष की तरह दिखता है । टीलहा के दो मीटर अन्दर में ईंट की नींव है जिसमें 17"x10"x3" ईंट का प्रयोग किया गया हे जो राँची स्तूप के ईंट 16"x10"x3" से मिलता जुलता है । इसी प्रकार अनेकों स्थानों पर बुद्ध की मूर्तियाँ मिली हैं । राँची के जोन्हा जल-प्रपात, गुमला जिले के बानो रेलवे स्टेशन से पाँँच किलोमीटर दूर कुटगा ग्राम में, जमशेदपुर के निकट पतम्बा ग्राम के भूला नामक स्थान पर, धनबाद के ईचागढ़ आदि स्थानों पर भी प्रतिमाएँ मिली हैं ।

       
मौर्य काल में चन्द्रगुप्त मौर्य इस क्षेत्र से परिचित थे क्योंकि शिलालेख संख्या 13 में 'आटवी' अथवा 'आटवा' के नाम का उल्लेख किया है । डी आर भंडारकर ने आटवी प्रदेश की पहचान करते हुए लिखा है कि आटवी प्रदेश बघेलखंड से उड़ीसा के समुद्र-तट तक फैला हुआ था । निश्चित रूप से छोटानागपुर इस क्षेत्र के अन्दर पड़ता है । छोटानागपुर पर एक अन्य उल्लेख अशोक के अभिलेख संख्या -२ में मिलता है । इसमें यह कहा गया है कि उड़ीसा की समीपवर्ती अविजित जनजातियों को धर्म का आचरण करना चाहिए जिससे वे लोक तथा परलोक की प्राप्ति कर सकें । चर्चित जनजातियाँ संभवत: छोटानागपुर की थीं ।

 

            झारखण्ड क्षेत्र में समुद्रगुप्त के प्रवेश के पश्चात् बौद्ध धर्म का प्रभाव शुरू हुआ । जब कट्टर शैव शशांक बंगाल, बिहार और उड़ीसा पर प्रभुत्व हो गया तो उसने बौद्धों का उत्पीड़न शुरू कर दिया । ह्नेनसांग के वर्णन से पता चलता है कि शशांक का साम्राज्य बंगाल के मिदनापुर से छत्तीसगढ़ के सरगुजा तक फैला हुआ था । इसके अन्तर्गत समस्त आच्छादित प्रदेश शामिल थे । कनिंघम ने बड़ा बाजार तथा हेविट ने दुलसी को उसकी राजधानी बताया है । कालान्तर मे छोटानागपुर के सभी बौद्ध स्थलों को नष्ट कर दिया गया । बंगाल के पाल शासकों के समय बज्रयान बौद्ध छोटानागपुर क्षेत्र में भी फलते - फूलते रहे । कहा जाता है कि इसी काल मे हजारीबाग जिले के रामगढ़ अनुमण्डल के अन्तर्गत छिनमस्तिका शक्तिपीठ की स्थापना हुई । इस प्रकार शशांक के प्रयासों से झारखण्ड क्षेत्र में बौद्ध धर्म का सफाया और उसके स्थान पर हिन्दू धर्म की प्रधानता हो गई । दशमी शताब्दी तक हिन्दू धर्म का पूर्ण प्रभुत्व स्थापित हो गया । फलत: इस क्षेत्र के अनेक स्थानों पर हिन्दू देवी देवताओं के मन्दिर बनाये गये ।

 

            बौद्ध धर्म के साथ-साथ जैन धर्म का भी व्यापक प्रचार हुआ । जैनियों के 23वें तीर्थोंकर का निर्वाण हजारीबाग जिला की पार्श्वनाथ पहाड़ी पर 8वीं शताब्दी ई०पू० में हुआ था । डेविड मकटासियन ने लिखा है कि समृद्ध मंदिरों और मूर्तियाँ पाकवीरा, तुईसामा, देवली, पवनपुर, पलमा, चर्रा, गोलमारा आदि स्थानों पर थे । बी. विरोत्तम का विचार है कि छोटानागपुर क्षेत्र में मानभूम जैन सभ्यता और संस्कृति का केन्द्र था । इस प्रकार छोटानागपुर स्थित पाशर्वनाथ की पहाड़ी जैनियों का प्रमुख पूजा स्थल था ।

           
कर्नल डाल्टन के अनुसार कुसाई नदी के तट पर और पाकवीरा में उन्हें कई जैन की मूर्तियाँ मिलीं थी । कुसाई नदी के तट पर पालमा तथा बोड़ाम और कर्रा तथा पाकबीरा में उसने जैन मन्दिरों के अवशेष देखे थे । इन सब तथ्यों से लगता है कि पलामू और गढ़वा के क्षेत्रों में जैन धर्म का असर कम पड़ा । परन्तु बी. वीरोत्तम का कहना है कि उतबरवा के निकट हनुमांड़ कुताम मे जैनियों के कुछ पूजा स्थल मिले थे ।

 

        पलामू मे प्रारम्भ में रक्सैलों का आधिपत्य था । ये रक्सैल राजपुताना क्षेत्र से रोहतासगढ़ होते हुए पलामु पहुँचे थे । उनका शासनका काफी दिनों तक चला लेकिन बाद में उन्हें चैरों द्वारा अपदस्थ कर दिया गया । रक्सैलों ने कुछ समय तक सरगुजा को अपने राज्य मे मिला लिया था और उस पर उनका आधिपत्य था । इस समय की महत्वपूर्ण जनजातियाँ खरवार, गोंड, माहे, कोरवा, पहाड़िया तथा किसान थी । इनमें सबसे अधिक संख्या खरवारों की थी जिसके शासक प्रताप धवल थे । उन्होंने चपला में अधिक दिन तक राज्य किया ।

           
इसी काल में झारखण्ड में ऐतिहासिक राजवंशों की स्थापना हो रही थी जैसे छोटानागपुर में नागवंश, पलामू में रक्सैल औष सिंहभूम में सिंहवंश आदि । यहाँ की जनजातियों में मुण्डाओं की प्रधानता थी और राज्य निर्माण भी इन्होंने ही सर्वप्रथम शुरू किया । बी. बिरोत्तम के अनुसार छोटानागपुर में रिता मुण्डा प्रथम मुण्डा जनजातीय नेता था जिसने राज्य निर्माण की प्रक्रिया शुरू की । उसने सुतना पाहन को मुण्डाओं का शासक चुना और नये राज्य का नाम दिया गया "सुतियानागखण्ड" । सुतना ने अपने राज्य को सात गढ़ों में विभक्त किया था - (1) लौहागढ़ (वर्तमान लोहरदगा), (2) हजारीबाग (हजारीबाग), (3) पालुनगढ़ (पलामू), (4) मानगढ़ (मानभुम), (5) सिंहगढ़ (सिंहभूम), (6) केसलगढ़ , (7) सुरमुगगढ़ (सुरगुज्जा) । इन सात गढ़ों को 21 परगनों से विभक्त किया गया था, ओमदंडा, दोइसा, खुखरा, सुरगुजा, जसपुर, गंगपुर, पोरहट, गिरगा, विरूआ, लचरा, बिरना, सोनपुर, बेल खादर, बेलसिंग, तमाड़, लोहारडीह, खरसिंग, उदयपुर, बोनाई, कोरया और चंगगंगकर । उपरोक्त विवरण से यह साफ है कि सुतना पाहन द्वारा स्थापित राज्य सम्पूर्ण झारखण्ड में फैला था । दुर्भाग्यवश सुतना पाहन का राज्य अधिक दिन नहीं टिक सका ।
 

        कालान्तर में झारखण्ड के विभिन्न भागों में नये राज्य की स्थापना की गई । इनमें मुख्य थे - पलामू, सरगुजा, कोरम्वे तथा बरवे के रक्सैल राज्य, छोटानागपुर के नागवंशी राज्य और परहट का सिंह राज्य । अन्य उल्लेखनीय राज्य थे - पंचेत और क्योंझर । छोटानागपुर में स्थापित नागवंश राज्य इस मामले में महत्वपूर्ण था कि यह मुख्यत: जनजातियों का राज्य था । उस समय इसकी राजधानी 'खुखरा' थी ।

           
नागवंशों की प्रारम्भिक कहानी विवादास्पद है । इसकी उत्पत्ति के बारे में कई कहानियाँ प्रचलित हैं । नागवंशी राजाओं की स्थापना तिथि औष कार्यकाल भी असामान्य लगता है जैसे फणिमुकुट का शासनका वर्ष बताया गया है परन्तु इतना निश्चित है कि नागवंशी राज्य की स्थापना दसवीं शताब्दी में हुई जैसा कि छोटानागपुर सर्वे एण्ड सेटलमेन्ट रिर्पोट में जे. रीड ने बताया है । फणिमुकुट राय ने राज्य पर सत्तारूढ़ होकर रामगढ़, गोला, पलानी, तमाड़, हजाम, टोरी, मानकेरी तथा बरवा आदि क्षेत्रों पर अपना आधिपत्य बना लिया । नागवंशी राज्यों में परगने थे - 22 घटवारी, 18 सुखरागढ़, 18 दोईसागढ़ और 8 बरचीगढ़ में ।

 

        फणिमुकुट राय के राज्याभिषेक के समय छोटानागपुर की अधिकांश जनता जनजातीय थी परन्तु ब्राह्नण, राजपूत तथा हिन्दू जातियों की संख्या बढ़ने लगी । उनके नागवंशी राज्य के पूर्व में पंचेत का राज्य था एवं दक्षिण में क्योंझार का राज्य था । चौथा नागवंशी राजा प्रताप राय ने सुतियाम्बे से राजधानी बदलकर सुवर्णरेखा नदी के तट पर चुटिया ले गया । नई राजधानी में बाहर से लोगों को बुलाकर बसाया गया । उसके राज्य में सर्वत्र शांति और व्यवस्था कायम थी ।

       
छोटानागपुर पर पड़ोसी शासकों का काफी प्रभाव पड़ा । कुछ समय तक गुर्जर, प्रतिहार, राष्ट्रकूट और पाल राजाओं ने उस क्षेत्र पर कुदृष्टि लगा रखी थी । हजारीबाग के इटखोरी नामक स्थान पर महेन्द्र पाल के शिलालेख से स्पष्ट होता है कि नवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में गुर्जर, प्रतिहारों ने छोटानागपुर के सीमावर्ती इलाकों पर कब्जा कर लिया था । पाल शासकों ने भी बुरी नज़र डालने का प्रयास किया था । परन्तु बाद मे उनके कमजोर पड़ने के कारण छोटानागपुर पर खतरा टल गया

       
नागवंशी राजा भीमकर्ण को भी सरगुजा के राज के साथ युद्ध करना पड़ा था । सरगुजा राजा ने बारह हजार घुड़सवारों और एक बड़ी पैदल सेना के साथ नागवंशी राजा पर आक्रमण कर दिया था । लेकिन भीमकर्ण ने राजधानी में परिवर्तन किया और उसे चुटिया से खुखरा ले गया । बंगाल पर मुसलिम आक्रमणों का रास्ता छोटानागपुर ही था इसलिए ऐसी आशंका थी कि इस पर भी चढ़ाई का खतरा है ।

 

      प्राचीन काल के अन्त होते तक छोटानागपुर बाह्य हमलों से बच तो गया था लेकिन तात्कालिक घटनाओं से अछूता नहीं रह पाया । बाहरी आक्रमण की आशंका से राजधानी का परिवर्तन करा दिया गया । उस समय तक छोटानागपुर में नागवंशी राज्य की स्थापना हो चुकी थी । निकटवर्ती हजारीबाग और मानभूम मे मान राजाओं का शासन था । मान राजाओं का आतंक और अत्याचार ही संभवत: भूमिज आन्दोलन का एक प्रमुख कारण था ।

       
पूर्व मध्यकाल में रामगढ़, कुडा, केंदी और खड़गडीहा उस समय के उन छोटे राज्यों में शामिल थे लेकिन अभी वे वर्तमान हजारीबाग के अंग हैं । 1368 ई० के लगभग वाघदेव सिंह और उनके भाई सिंहदेव सिंह का नागवंशी राजा से मतभेद हो गया । दोनों भाइयों ने धीरे-धीरे 21 परगनों पर कब्जा कर लिया । उन लोगों ने सिसिया को पहली राजधानी बनाया । बाद मे राजधानी बदलकर उरदा, फिर बादम और अंत में रामगढ़ कर दिया ।

 

        सिंहभूम को पोरहट के सिंह राजाओं की भूमि के नाम से जाना जाता है । सिंह वंश उत्तराधिकारों का दावा है कि सिंहभूम में 'हो' जाति के प्रवेश