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लोक-आलोक

 

लोक-संस्कारों में जल की भूमिका - डॉ. श्यामसुंदर दुबे


        , जीवन का पर्याय है। जल से ही जीवन का उद्भव है और जल से ही जीवन संवर्ध्दित होता है। जल की स्तुति में मनुष्य ने अनेक गीत रचे हैं। लोक-विश्वासों में जल की महत्ता के अनेक प्रयोग, परम्परा से प्रचलित हैं। इन प्रयोगों से स्पष्ट होता है  कि मनुष्य ने अपनी स्वास्थ्य-रक्षा, अपनी समृध्दि-संवर्ध्दना एवं अपने कुशल-क्षेम के लिए जल की अनेक शक्तियों का बहुविधि आह्वान किया है। लोक, अपने सभी शुभ  अवसरों पर जल का पूजन करता है। ऐस अवसरों पर जल-केन्द्रों की अभ्यर्थना-अभ्यर्चना का भी विधान है। नदी-सरोवर, कुआ-बावड़ी का पूजन करके ही उनका जल, पवित्र कार्यों के लिए आहरित किया जाता है।

 

       सद्य:प्रसूता जब प्रसूति कक्ष से पहली बार बाहर निकलकर घरेलू कार्यों में प्रवृत्त होती है, तब सम्पूर्ण उत्तर भारत में इस प्रसंग को एक उत्सव की तरह मनाया जाता है। इस अवसर पर प्रसूता कुएं पर जल भरने जाती है। उसके साथ गाती-बजाती स्त्रियों का समूह भी रहता है। कुंओं के घाट पर पहुंचकर पहले ये स्त्रियां कुएं का पूजन करती हैं। फिर प्रसूता स्त्री अपने स्तन से दूध की बूंदें कुएं के जल में निचोड़ती हैं। इस रस्म के बाद ही वह कुएं से जल भरती है। वह सिर पर जल से परिपूर्ण कलश लेकर घर लौटती है। द्वार के समक्ष खड़ी होकर वह अपने देवर का सिर से कलश उतारने हेतु आमंत्रित करती है देवर कलश उतारने आता है, किन्तु वह इस कार्य के लिए नेग लेने के लिए अड़ जाता है। भाभी जब उसे उसकी मनचाही वस्तु नेग के रूप में  प्रदान करती है तब वह भाभी के सर से कलश उतारता है। एक लोकगीत में इस लोक-प्रसंग की चर्चा है-  न्नदेवरा मोरे सिर से गगरी आकर आज उतारो। गगरी तोरी तबई उतर है, जब देही नेग हमारो। न्न   देवर-भाभी का यह संवाद जल के साथ जुड़े  हास-परिहास का प्रदर्शक भी है। शिशु-जन्म के सभी संस्कार इसी जल से सम्पन्न होते हैं।

 

       विवाह के अवसर पर भी पूजन-संस्कारों के लिए जिस जल का प्रयोग होता है, वह भी समारोह पूर्वक नदी, सरोवर या कुआं से लाया जाता है। विवाह-उत्सव में मातृ-पूजन के समय स्त्रियां जल-आहरण के लिए जलाशय की ओर प्रस्थान करती हैं। इस यात्रा में अनेक तरह के लोकगीत गाती हैं। इन लोक गीतों में जल की प्रार्थना तो होती ही है।  कुछ लोक-गीत हंसी-मजाक वाले भी गाये जाते हैं। ऐसे लोकगीतों में काम देवता को प्रसन्न करने के भाव विद्यमान रहते हैं। जल से चूंकि जीवन उत्पन्न हुआ है, इसलिए उसकी स्तुति तो होना ही चाहिए, किन्तु जीवन  के सातत्य की जिम्मेवारी तो काम-चेताना ही निभाती है, इसलिए इस अवसर पर जल के  साथ काम का स्मरण करना प्रासंगिक ही है। इस अवसर पर बुंदेलखंड में जो लोकगीत गाया जाता है, उसमें स्पष्ट किया गया है कि पनहारिन पानी भरने के लिए निकली है किन्तु मार्ग में एक अड़ियल सर्प उसको रोक रहा है। वह पनहारिन के शरीर से लिपटना चाहता है।  न्नपनहारिन की गैल में जो पड़े अरंगी सांप री-जे नैना तोरे वान दी। काहे को जो लौटे-पौटे काहे, को मन्नाय, जे नैना तोरे वान री। न्न

 

       पनहारिन जल-स्रोत का पूजन करती है। उसे विवाह में सम्मिलित होने का आमंत्रण देती है। फिर अपनी सात सहेलियों के साथ जल भरकर वापस होती है। इन सातों के सिर पर जल से भरी गगरियां रहती हैं। इसी जल का प्रयोग, विवाह-कार्य में प्रयोजनीय मृद्भांडों के बनाने में किया जाता है। इसी जल से पूजन-सामग्री के रूप में प्रयुक्त होने वाले पकवानों को बनाया जाता है।

 

       विवाह में सप्तपदी के समय पर जो पूजन-विधान किया जाता है, उसमें भी जल से भरे सात मृत्तिका कलशों का पूजन किया जाता है। ये सात मृत्तिका कलश वर-पक्ष की ओर से वधू-पक्ष को प्रदान किये जाते हैं। बारात के सात युवक इन सातों कलशों को वधु-पक्ष के मंडप में रखने जाते हैं। वधु -पक्ष की स्त्रियां इन युवकों की बेलनों से पिटाई  करती हैं। इस पिटाई से बचते-बचते या उसे सहते हुए  ये युवक इन सात कलशों को विवाह-मंडप में स्थापित कर ही देते हैं।  सप्तपदी के पहले इन सात कलशों का पूजन किया जाता है। प्रकारान्तर से यह पृथ्वी के सप्त समुद्रों का ही प्रतीक-पूजन है। लोकाचार में यह विधान वर-वधू की जल-मिलाई है। जल ही इस तरह दो कुटुम्बों को एक करता है।

 

       सप्तपदी की रस्म में पंडित पूजन करने के लिए जिस जल का प्रयोग दूर्वा या कुश से छिड़कने हेतु करता है, वह गंगा-जल होता है। लोक में हर जगह गंगाजल उपलब्ध नहीं रहता है। इसलिए इसके संदर्भ में भी एक नाटकीय प्रतीक परम्परा विकसित हो गयी है। समूचे मध्य भारत में यह परम्परा प्रचलित है। पूजन प्रारंभ होते ही नाई घराती और बारातियों से राम-राम करके उनकी जुहार करता हुआ गंगा-जल भरने के लिए गंगा-यात्रा पर चल देता है। गांव के ही जल स्रोत से यह अपना कलश भरकर लाता है और लौटकर फिर घरातियों-बारातियों को जुहार करता है। गंगा-जल लाने का नेग लेता है।  पंडित विवाह की सम्पूर्ण पूजा-पध्दति में इसी जल का प्रयोग करता है। लोक में गंगा-जल की महत्ता इस आख्यान से प्रतिपादित होती है।

 

       सात समुद्रों और गंगा परिणय संस्कार में उपस्थित होना जल के साक्षी भाव का प्रकटीकरण है। कन्यादान के समय भी गड़वा ढराई की एक रस्म सम्पन्न होती है। इस रस्म में भी जल को साक्षी भाव से प्रस्तुत किया जाता है। इसके अंतर्गत वर की हथेली पर वधू की हथेली रखी जाती है। इन दोनों की हथेलियों के नीचे कन्या के माता-पिता की हथेलियाँ रहती हैं।   कन्या की हथेली पर बेसन  की हथलोई दूर्वा-कुश रखा जाता है। पंडित कन्या-दान का संकल्प पढता है, और वधू का भाई इन संयुक्त हथेलियों पर लोटे से गंगा-जल उड़ेलता है। इस जल-अर्पण विधि को ही  गड़वा ढराई   कहा जाता है।

 

       जल जोड़ने का काम करता है। जल समाहित्य का पोषक है। हमारे अधिकांश मेले और धार्मिक आयोजन जल-केन्द्रों के आसपास ही आयोजित किये जाते हैं। जल हमारे देश के सांस्कृतिक समन्वय का आधार रहा है। विभिन्न नदियों और सरोवरों से कावरों में जल लेकर विभिन्न क्षेत्रों में स्थित शिव-लिंगों पर यह जल अर्पित किया जाता है। महाकवि तुलसीदास ने तो अपने रामचरितमानस में उत्तर-दक्षिण को जोड़ने का आधार ही जल माध्यम में तलाशा। इस देश के बहुरंगी सांस्कृतिक परिदेश को एकता का सूत्र जल ही  प्रदान करता है। श्री राम ने दक्षिण के समुद्र तट पर शिव की स्थापना करते हुए उद्धोषणा की कि जो हिमालय स्थित गंगोत्री से गंगा-जल लेकर, रामेश्वरम् के शिवलिंग  पर अर्पण करेगा, वह मुक्ति का अधिकारी होगा।   न्नजे गंगा जलु आनि चढै हैं। ते सामुज्य मुक्ति नर लहि है। न्न   इसी सूत्र के आधार पर असंख्य नर-नारी, गंगा-जल को लेकर निरन्तर इस देश की सुषुम्ना नाड़ी का स्पर्श करते हुए उत्तर-दक्षिण की यात्रा करते रहते हैं। जल की इस शक्ति का अनुभव लोक ने  कर लिया था, इसलिए उसका प्रत्येक धार्मिक अनुष्ठान जल के पूजन से प्रारंभ होता है।

 

       जल-विहार से ही इस तरह के पूर्व कलश-यात्रा का आयोजन किया जाता है। जल-विहार से ही इस तरह के आयोजनों का समापन होता है। यज्ञ या विवाह आदि की अवशिष्ट सामग्री जल में ही विसर्जित करने की सांस्कृतिक विधि है।  इस तरह जल की सांस्कृतिक उपस्थिति जहां पूजा-स्थल को प्रभावी सौन्दर्य प्रदान करती है, वहीं पूजन-पाठ एवं विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक आयोजनों में जल का होना वातावरण को  विघ्न रहित बनाता है। जल न केवल भौतिक मैल को साफ करता है बल्कि वह परिवेश में निहित दुष्ट शक्तियों का भी समापन करता है-लोक की ऐसी मान्यता है।

 

       मृत्यु जैसे अंतिम संस्कार में जल अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। शव-यात्रा में जल से भरा हुआ एक मृत्तिका घट भी ले जाया जाता है। शव को मुखाग्नि देने वाला सदस्य जल से भरा यह घट अपने दाहिने कंधे पर रखता है। इस घट में तत्काल इस तरह से छिद्र कर दिया जाता है कि उससे  एक पतली जलधारा प्रवाहित होने लगे। इस घट को लेकर घट-धारी व्यक्ति चिता की सात  परिक्रमायें लगाता है। इन परिक्रमाओं के परिपथ में घट से अजस्र जल-धारा नीचे गिरती रहती है। सातवीं परिक्रमा के बाद घट को नीचे पटक कर फोड़ दिया जाता है। न्नफूटा कुम्भ जल जलहिं समाना यह तथ कथौ गियानी। न्न कबीर की काव्य पंक्ति के अनुसार देह का घट फूट गया। इसमें निहित आत्म-तत्व रूपी जल परमात्म-तत्व रूपी विराट सागर में समाहित हो गया है। शायद इसी तरह की प्रतीक भावना मरघट में फोड़े गए घट से भी प्रतिध्वनित होती है। मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक जल से जुड़े इन लोक-विश्वासों में निहित प्रतीक भावनायें जल की अनेक शक्तियों को उद्घाटित करती हैं।  

0 डॉ. श्याम सुंदर दुबे

प्राचार्य, शासकीय स्नातक महाविद्यालय

हटा, जिला- दमोह, मध्यप्रदेश

 

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