|
हमारे बच्चों
का भविष्य जनतांत्रिक घोड़ों के हाथों कैद है
!
-
ज्ञानरंजन |
ज्ञानरंजन
(22
वर्षों से हिंदी की
बहुप्रतिष्ठि
त साहित्यिक पत्रिका पहले के संपादक।
प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष के रूप में प्रगतिशील
आंदोलन में गहरी सक्रियता । मार्क्सवादी विचारधारा के
प्रति गहरा अनुराग । साहित्य अकादमी से संबंद्ध । 6-6
कहानी संग्रहों के लेखक । कहानियों के भारतीय भाषाओं के
अलावा अंगरेज़ी, जर्मन, जापानी, रुसी, पोल, और उर्दू में
अनुवाद । सैन फ्रांसिस्को, हायडलवर्ग, लंदन, लेनिनग्राद और
पूर्वी यूरोप के अनेक विश्वविद्यालयों में कहानियां
पाठ्यक्रम में सम्मिलित । भारत के एक दर्जन से ज्यादा विवि
व केंद्रीय विद्यालयों में कहानियों का पठन-पाठन । कई
कहानियों पर फिल्म निर्माण । सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार,
साहित्य भूषण सम्मान, अनिल कुमार और सुभद्राकुमारी चौहान
पुरस्कार तथा म.प्र.शासन का शिखर सम्मान। ऐसे कई
उपलब्धियाँ है ज्ञानरंजन के नाम । प्रस्तुत है
गद्य रचनाओं की उनकी चर्चित कृति
'कबाड़ख़ाना' का
खास आलेख जो संस्मरणात्मक गद्य का जीवंत उदाहरण है । -
संपादक )
बचपन को केवल एक उम्र कहकर नहीं समेटा जा सकता । बचपन कब
पकड़ में आया और कब एक डोर बना, यह बहुत दिलचस्प है । रात
को जैसे सुबह की किसी संभावित खुशी में कई बार नींद टूटी
हो और एक लंबे नींद के टूकड़े ने चौंककर देर सुबह को उठाया
हो । उस वक्त धूप बेशुमार थी । चिड़ियों ने तिनके लाना
शुरु कर दिया था । एक फेरी वाले की आवाज़ भी आ रही थी और
मैं भागा सीधे आम के बगीचे की तरफ । यहाँ शाम को पत्तों के
झुरमुट में एक चुरा हुआ आम देखा था । कहीं वह लुट न गया
हो, इस आशंका से मैंने उस दूरी को तीन डग में नापा । चैन
मिला जब देखा कि वह आम महफ़ूज है । इसके बाद अपना जांघिया
कसा और घर लौटे ।
मेरा बचपन अकोला, अजमेर और दिल्ली होते इलाहाबाद पहुँचा था
। इलाहाबाद के खुमार के अलावा मुझे किसी दूसरी जगह ने कभी
इतना नहीं लुभाया । आप एक से अधिक शहर को प्यार कैसे भी कर
सकते हैं । इस कथन को मैं एक अच्छी बात और आप बेकार बात
नें तकसीम नहीं कर सकते, लेकिन यह जरुर है कि एक समय तक
मैं इस शहर के शोहदों और वेश्याओं का भी समर्थक था ।
इलाहाबाद के अच्छे लगने का एक कारण यह भी था कि उन दिनों
यह हिंदुस्तान का सबसे कम चमकीला शहर था । इसमें पेरिस
जैसी अकड़ और गरीबी थी । उत्तर भारत में यह एक सबसे आधुनिक
दरवाज़ा था । धीरे-धीरे यह खून मेरी नसों में आने-जाने लगा
।
लेकिन बचपन बड़ा गड्डमड्ड था, बशर्ते कि आज की सजग निगाह
उस पर न डाली जाए । बचपन से ही जीवन की राह में गड्ढे आने
लगे थे । जैसे घर के अंदर ही एक मंदिर था । मंदिर मेरे
जीवन के बाहर था । इस जीवन से ज्यादा सुंदर और रहस्यपूर्ण
मंदिर नहीं है । आप किसी भी खुली खिड़की में देखें, एक
चेहरा झांककर चला जाता है । झलक की तरह आता है और झलक की
तरह जाता है । यह जीवन का भूत है, जिसे आप एक पीतल की घंटी
बजाते रहने के कारण देख नहीं पा रहे हैं । फिर जीवन भी
आपके साथ मक्कारी करने लगता है ।
मेरे या किसी के लिए भी बचपन में केवल दो ही जगहें होती
हैं, जिनका एक बच्चे को सामना करना होता है । एक घर और
दूसरा स्कूल । मेरे लिए भी यही दो जगहें थीं । मेरे घर में
तीन तरफा बरामदा और एक तरफ आँगन था । यह घर जैसा भी रहा
हो, पर इसमें बाहर जाने के लिए पाँच दरवाजे थे । यह घर
गनीमत है कि जेल के डिजायन से नहीं बना था । इसकी भवन-कला
का जन्म चोरों-डाकुओं या चरित्रहीन हो जाने के भय से नहीं
उपजा था । इसके नक्शे में आर्थिक और सांप्रदायिक दिमाग भी
नहीं था । इस खुलेपन के कारण ही शायद मैं बाद में एक तरह
के जीवन का आलोचक बना और दूसरी तरह के जीवन का समर्थक । उन
दिनों बस इस फिराक में रहते थे कि कब बड़ो की नज़र चुके और
हम दोपहरी में छलांग लगा दें । जिन तलुओं में सुबह की ओस
लगती थी, उन्हीं में पिघलता हुआ कोलतार चिपकने लगा ।
उन्हीं दिनों भद्रलोक के अलविदा का बीज भी भीतर पड़ रहा था
। उन्हीं दिनों कला के पवित्र कंगूरों और बेलबूटों पर लात
पड़ रही थी।
ये दोपहरें और इसमें पुराने किस्म के
बंगलों का हमारा यह मुहल्ला लगता था कलकत्ते के
टामीगंज मुहल्ले का एक फिल्मी सेट है । वयस्क होने पर
गजेन्द्रनाथ मित्र का उपन्यास 'कलकत्ते
के नजदीक ही' पढ़ा तो भ्रम होने
लगा कि मेरा मुहल्ला भी कलकत्ते के नजदीक है । आप विश्वास
करें कि हमारा मुहल्ला इलाहाबाद के खाते-पीते लोगों का
होने के बावजूद 1930 से 1980 तक एक जैसा बना रहा । अब यह
जीवन तो नहीं, म्यूजियम ही हो सकता है । यह बंगलेवाले
बंगालियों का इलाहाबाद में एक जाना-माना मुहल्ला था । पीतल
की परात में मछली बिकती थी सुबह से । विधवाएं बाहर तख्त पर
सफेद मटमैली साड़ी में ऊंघती फिरती थीं । ज्यादा से ज्यादा
कपड़ा किनारी वाला पंखा होता उनके हाथ में । इससे मक्खी
उड़ती थी दिन में और रात में मच्छर और उमस में हवा मिलती
थी । सबसे ज्यादा यह कि उनके कठिन वैधव्य का रेगिस्तान उस
पंखे से थोड़ा आसानी से पार हो जाता था । वे शरतचंद्र की
विधवाएं लगती थीं । उनकी कमर में लोहे की चाभियों का एक
सुस्त गुच्छा होता था, जिनसे उनकी ताला लगी लोहे की
संदूकचियों का अंदाजा लग सकता था । वे रवीन्द्रनाथा की
वृद्धाएं नहीं हो सकती थीं । जो शरत की लगती हों, वे
रवीन्द्रनाथ की लग भी कैसे सकती थीं । यहाँ सब तार बाबू,
रेल बाबू, डाक बाबू, कोर्ट बाबू लोगों के ही घर थे । मेरा
बचपन इसी मनहूस लोक के पालने में पला । आज भी मेरी
आधुनिकता में जो मनहूसी है, वह शायद इसी बचपन का परिणाम है
।
यहाँ लड़कियाँ लगातार पीली जर्जर पड़ती गईं । वृक्ष ने ही
फल दिए और वृक्ष ने ही फल खा लिए । लड़के कबूतर उड़ाते थे
और गुड्डी । कनहल खेलते और गुलैल । यहाँ कुछ भी तड़ातड़ी
नहीं थी । आज जब मैं बंगला फिल्म देखता हूँ तो दम घुटता है
। वास्तव में किसी बंगला फिल्म को पूरा देखना आज भी मेरे
लिए एक सजा है । एक कमरा है, दस बाई दस फिट का । इसमें
काली पालिस वाला भरकम और वज़नदार पाँच बाई सात फीट का एक
पलंग है । ऊँचाई इतनी कि बैठनेवाला लंबू भी हो तो पैर
झूलते रहें । दरवाज़े के पास एक पिंजरा है सुग्गे या मैना
का । चौड़े पाड़ की साड़ी है और नायिका 45 फीट की दूरी को
पाँच मिनट में पार करती है । पार करते ही पार करने का
उद्देश्य गायब हो जाता है । इस धीमी मौत को मैं कभी
बर्दाश्त नही कर सका ।
बनती हुई चीजों पर समय और लोगों का असर था मेरा वह स्लीपर,
जो काला और लंबोतरा होता था, जिसमें आगे बराबर आँख जैसे दो
छेद होते, जो बिलकुल मत्स्य मुख लगते थे । सभी के पास यह
स्लीपर होता था उन दिनों । फेरीवाला खोवे का पेड़ा भी जो
बेचता था, उसे पीतल की मछली के सांचे से ही निकालता था ।
अब बचपन में क्या पसंद था और क्या नागवार तो आज भी वही
पुरानी तस्वीर बरकरार है । सायकिल नई ली और सबसे पहले घंटी
को अलग किया । कभी बटुआ नहीं रखा जेब में और घड़ी नहीं रही
कलाई पर । जब-जब छाता लेकर चले तुरंत गुमा । जूतों से पैर
छाले-छाले हो जाते थे । कुत्ता नहीं पाला और रूमाल नहीं
रखा । आसपास डाक्टर का नहीं रहना कभी खला नहीं ।
मुंडेर पर सोए, गाना गाया, चाँदनी देखी और चाँद को देखकर
कभी दुखी नहीं हुए । क्रिकेट कभी नहीं खेला । एक स्थान से
दूसरे स्थान तक हमेशा दूर और लंबे रास्तों से गए । पैंट
होलडॉल जैसा था और सरकता - उठता था । वह इतना भद्दा हो
सकता है, यह तब पता चला, जब उन दिनों का अपना एक फोटो देखा
? पर तब लोग कितने भले थे कि
हँसते नहीं थे । आज हँसी से लुह-लुह करते थे । कुत्ता नहीं
था, इसलिए हवा में लुह-लुह करते थे । जब आप कुछ बंदर जैसे
होते है, तभी आदमियों जैसे भी कैसे हो सकते हैं । बहुत
शिष्ट और पेड़ चढ़ना न जानने वाले भविष्य में कब पालतू बन
जाएं, कहा नहीं जा सकता । हमने पेड़ पर आम तोड़ा । पेड़ पर
आम खाया । कोमल शाखों वाले जामुन के पेड़ पर भी चढ़ लेते
थे । उस पर चढ़ते वक्त शरीर का वज़न उस तरह कम हो जाता था
जैसे हौज में घुसने के बाद आर्कमिडीज को लगा था कि वह
भारहीन हो गया है, लेकिन मैंने कभी किसी प्रकार की खोज
नहीं की, जबकि प्रकृति से वास्ता गहरा था । हमारे घर आम,
अमरूद, कटहल, अनार, बेल आँवला, पीपल सब तरह के पेड़ थे ।
इसके बीच एक घर था ।
घर और मुहल्ले से जब मैं बाहर आया तो अच्छा लगा । बाहर
ताजगी थी । कॉफी हाउस में इलाहाबाद का सूर्य चमकता था ।
वहाँ ज्ञान और गहमागहमी थी । सार्वजनिक स्थान बहुत अच्छे
लगते । निराला को देखने जाते थे और फ़िराक को सुनते थे ।
फ़िराक किसी की नहीं सुनते थे । सुबह से दोपहर कर देते थे
। साहित्य की जितनी बड़ी आधुनिक कशमकश और हलचल इलाहाबाद
में पैदा हुई, वैसी पहले या बाद में कभी नहीं रही । यह
दूसरी बात है कि इलाहाबाद अपनी ही कब्र में सो गया, लेकिन
कब्र में सोता हुआ इलाहाबाद दिल्ली, भोपाल, लखनऊ, पटना की
खिलंदरी से आज भी ज्यादा सुंदर है ।
जब मैं पहली बार किसी का दोस्त बना तो यह इतराने जैसी हालत
बन गई । बुखार और भूख की परवाह नहीं होती थी ।
मैं उससे प्यार करने लगा था । स्त्रियों से प्यार करना एक
विवशता है, दुर्घटना है, अन्यथा यह मेरा पहला मित्र प्रेम
का पहला स्पर्श था । उसे हर किसी ने रोते-गाते,
हंसते-खिलखिलाते, उदास सभी तरह की मुद्राओं में देखा था ।
वह एक सारंगी की तरह भरपूर था, लेकिन वह सारंगी की तरह
मैला और साधारण था । उसका घर गोबर मिट्टी का था । उसके पास
ऊंट की कूबड़ जैसी एक ऊँची सायकल थी । घर में उसके सभी
अगवानी करते थे, छिपते थे । वह हमजोली था, पर बड़ी मशक्कत
से जिंदा था, क्योंकि उसके पैर सायकिल की पैडल
पर कठिनाई से पहूँचते थे और इसीलिए एक दिन वह भरी दोपहर
में जानसेनगंज में लगभग अपने घर के पास असंतुलित हुआ और
ट्रक के नीच खून का थक्का बन गया । मैंने उसका सपना जैसा
देखा था और उसके घर का, वह बिल्कुल जैसे का तैसा हुआ । हाथ
से तोता उड़ गया था, तोता जैसे पिंजड़े में चला गया । उसकी
कोई भी बात आज तक भूलती क्यों नहीं
?
हमारे घर और स्कूल के पास या बीच समझें, एक रेल लाइन भी थी
। हर दस मिनट पर गाड़ी निकलती थी । मिलेट्री का
यार्ड भी था, जहाँ गाड़ियाँ, बड़ी नावें और छोटे टैंक
चढ़ाए जाते थे । कभी-कभी मालगाड़ियाँ लंबे समय तक खड़ी हो
जाया करती थीं और हम उनके नीचे से निकलने का खेल खेलते थे
। बंगाली बच्चे कोयला चुराते थे । कभी-कभी पूरी
मालगाड़ी केलों से लदी खड़ी रहती । शहर के बीच नहीं, लगभग
एकांत में, सिगनल के लिए खड़ी हुई । लोहे की मोटी चादरों
को भेदकर केला महक रहा है । कहाँ से नंगे बुचे पहुँच गए हैं
और उन्होंने लौह कपाट खोल लिए हैं । एक गश्ती पुलिस
है और एक गार्ड । वे क्या कर लेंगे । अब केलों पर इन नंगे
बूचों का हक नहीं बनता क्या । कितना केला खाएंगे । उससे
ज्यादा नहीं जितना खुशबुओं का ब्रह्मांड है । उससे बहुत
कम, बहुत-बहुत कम लगभग नापता । फिर रेलगाड़ी तो चली जाएगी
। यह एकांत और ज्यादा एकांत होगा । हम मध्यवर्गीय
बच्चे तो केले इस तरह से नहीं खा पाते थे, पर केलों के
संसार की लूट देखकर बहुत तृप्ति होती थी । केले के
व्यापारियों का मुनाफा तो कम नहीं होता, भले चोर पर
अखबार वाले लेख छापते हैं ।
हाँ, इस बीच घर के बाद स्कूल भी आया था । स्कूल ज्यादा दूर
नहीं । घर और स्कूल को कभी भूल नहीं सके । तब स्कूल बहुत
फीकी जगह था । उस समय तक स्कूल आज जैसी हत्यारी जगहें नहीं
बने थे । ज्यादा से ज्यादा वे एक बेबस जगह थे । घर से
स्कूल के बीच हम टमाटर या खीरे का टुकड़ा होते थे या ज्यादा
से ज्यादा दो गोल पोस्ट के बीच की गेंद । फिर भी घर
से निकलकर स्कूल जाना नयापन तो देता ही था । स्कूल में
हमारे एक सहपाठी थे, हरिप्रसाद । बहुत गरीब घर के थे,
लेकिन इस तंगदस्ती में मुरली बजाने की लत पड़ी । निकर के
अंदर छिपा कर बंसी स्कूल लाते थे । बंसी लाने पर उसकी
पिटाई हुई । अब वह या तो किताब खरीद सकता था या बंसी
। उसकी बंसी में आत्मा का सूर था । वह कृष्णजी जैसी बंसी
बजाता था । आज यही लड़का विश्व प्रसिद्ध हरिप्रसाद
चौरसिया है । बाधा दौड़ में विजयी होने वाले यही
इक्का-दुक्का बचपन के लोग हैं, बाकी तो सब काल के गाल में
समा गए ।
आजकल तो अखबारों से काफी पता चल जाता है कि उस स्कूल के
बच्चे ने 'अलविदा
मेरे स्कूल' लिखकर भूसे की
एक निर्जन कोठरी में आत्महत्या कर ली कि एक बच्चे ने
परीक्षाफल के तुरंत बाद कुएं में अपने को फेंक दिया कि एक
बच्ची क्लास रूम की दीवारों पर यह लिखते-लिखते पिंजर हो गई
कि मां भूख लगी है, माँ मुझे प्यास लगी है, मुझे इस
कोठरी से बाहर निकालो । उस दिनों किताबों का आतंक
उतना नहीं था । हाँ पिट-पिटकर बुखार बहुत से बच्चों को आ
जाता था या पिकर चोट और दाग लिए लौटने वाले बालक बहुत सारे
होते थे । स्कूल अनाथालय तो नहीं लगता था, पर एक जल्लाद
अध्यापक स्कूल में सदा मंडराता रहता था । इस बात को अच्छी
तरह याद रखना जरुरी है कि थानों के बाद सबसे ज्यादा
क्रुरता के अड्डे हमारे स्कूल ही हैं । मेरे स्कूल में दंड
के लिए हाकी का उपयोग किया जाता था और इसके लिए दो मास्टर
नियत थे । जब चतुरसेन शास्त्री ने सुप्रसिद्ध मास्र
नौरंगीलाल का जिक्र किया था, तब मुझे याद आता है कि
अब नौरंगीलाल नहीं है, बहुतेरे हैं । जगूड़ी की कविता भी
याद आती है कि बच्चों को चारों ओर खींचो, वे
कहाँ-कहाँ से उग रहै हैं ।
और एक कविता मिरोस्लाव होलुब की मैंने छापी थी, जो हमारे
बचपन के स्कूलों की खबर देती है -
एक वृक्ष घुसता है और /
सिर झुकाकर कहता है /
मैं एक वृक्ष हूँ / एक काला आँसू
/ आसमान से गिरता है /
और कहता है मैं एक चिड़िया हूँ /
मकड़ी के जाले के नीचे से / प्यारी
जैसी कोई चीज पास आती है / और कहती
है / मैं खामोशी हूँ /
लेकिन एक राष्ट्रीय जनतांत्रिक घोड़ा /
अपनी सदरी पहने ही /
ब्लैकबोर्ड के सहारे पसर जाता है /
और हर तरफ अपने कानों को / डंटेरे
हुए दुहराता है / बार बार दुहराता
है / मैं इतिहास का इंजन हूँ
/ मैं इतिहास का इंजन हूँ /
क्लासरुम के दरवाज़े के नीचे / खुन
की एक पतली धार रिसती है / क्योंकि
यहीं से शुरु होता है / बेगुनाहों
का कत्ल
मेरे मदरसे में समय और समाज
की कोई धुन या तरंग नहीं थी । यहाँ धार्मिक नैतिकता और
अनुशासन की प्रेत छाया मंडराती रहती थी । मैं तो काफी
दीनदयाल टाइप का बच्चा था, इसलिए मुसीबतें मेरे ऊपर कम
आयीं, पर रेखाओं के बाहर शरीर निकालने वाले बच्चों की शामत
तो आती ही थी । उनमें से कई पिटपिटाकर दुनियादार खबरदार हो
गए ।
जिन बच्चों को पैदा होने मात्र के बाद से ही सजा मिलनी
शुरु हो जाती हो, वे और क्या होंगे इसे ज्यादा । इन सबके
बीच रज्जू, पुक्कू और रघुराज बचे हैं, जिनको मैं बड़े और
ठन-ठन सिक्कों की तरह चमकदार पाता हूँ । एक असली सिक्के की
आज हम सबको कितनी ज्यादा जरुरत होती है ।
अपने बचपन के जिस वक्त को मैं देख हा हूँ, यह गनीमत है कि
उसको देख पा रहा हूँ । स्याह हिंसाओं के साथ अब आपका अपने
अतीत की तरफ देखना कठिनतर होता जा रहा है । मैं इतना
शक्तिशाली तो नहीं हूँ कि बर्बरता के पार बचपन को पारदर्शी
तरह से देख लूं । यह तो मित्रों;
बचपन
की रेखा मात्र है । अब खंडहरों पर ग्रेटा गार्बो और नरगिस
की मुस्कराहट को ज्यादा चिपकाना मुमकिन नहीं है । कैरीकेचर
करते हुए भी जिस तरह चार्ली चैपलिन अपनी बड़ी और उदास
आँखों से मनुष्य को देखते थे, वह अब आज दुर्लभ है । अब
बिना मुखौटे के कोई सच्चाई प्रदर्शित करना कठिन है । यह
मुखौटा लगातार विकसित होता जा रहा है । अब किसके पास है
दौड़ता, छलांग लगाता, तैरता, उड़ता और चढ़ता-गिरता बचपन ।
सभ्यताएं जब विशाल करवट लेती हैं तो इसी तरह हम पिस जाते
हैं । इस करवट को निराशाजनक न मानते हुए भी इतना जरुर
कहूँगा कि आज हमारे बच्चों का भविष्य जनतांत्रिक घोड़ों के
हाथों में कैद है । मेरे साथ यह दिक्कत है कि जब मैं सच
लिखता हूँ तो यह झूठ जैसा लगता है लोगों को । जब झूठ लिखता
हूँ तो सच लगता है सबको । फिर भी कहता हूँ कि बचपन को लेकर
मैंने यहाँ जो कुछ भी लिखा है, वह सच है ।
