रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

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कविता

 

संस्कार

पक्षी लोहे के पिंजरों में

फड़फड़ाते हैं

और जवानियाँ

संस्कारों के पिजरों में

 

जिस जवानी को

प्यार हो जाए

वो सोहनी हो जाती है

वो अंदर-बाहर उड़ती फिरती

चुपचाप गाती रहती है

पिंजरा लेकर उड़ जा बलीए

मैं जाना उस पार

अपने आपको साथ लेकर

मैं जाना उस पार

 

अपनी सोहनी को - अपनी जाई को

अजनबी अनचाहे के साथ

क्यों भेज देते हो ?

और मनचाहे के साथ

क्यों नहीं

ज़िंदगी पूछती है

 

सोहनी अनचाहे के साथ

कभी भी नहीं रहती

वो मनचाहे के पास

चली जाएगी

चाहे उसको डूबकर भी

जाना पड़े ।

· 

इमरोज

के - 25, हौज खास

नई दिल्ली

...............................

 

सब कुछ बचा रहेगा

सब कुछ बचा रहेगा

तीनों लोक

दसों दिशाएं

ऊपर चिडियाँ

नीचे वनस्पतियाँ

महानंदा और मेघना

छाया और धूप

 

जिस वृक्ष को काटा जाएगा

वह फिर खड़ा हो जाएगा

जिस स्त्री को शाप दिया जाएगा

वह शापमुक्त हो जाएगी

जो नदी सूख गयी है

वह याद की जाएगी

किसी गाथा

किसी किंवदंती में ।

· 

शाहंशाह आलम

बदरून मंजिल, गुलजार पोखर

मुंगेर, बिहार

...............................

 

स्टेशन पर

ट्रेन आकर रुकी और लोग उतर कर चले गए

केवल बूढ़ा रहता है सबसे पीछे धीरे-धीरे चलते हुए

 

काला कोट गंदा और भारी तल्ले रखे हुए काले जूते

एड़ी कुछ मुड़ी हुई पंजा कुछ अपमानित सा सिर उठाए

उसकी गंदी पैंट चैक के किसी कपड़े की है

लगता है उसने चलने के बाद कहीं धोई नहीं

 

बूढ़ा चल रहा है अपनी कमर सीधी किए

शाम का वक़्त है और उसकी छाया बहुत लंबी हो चुकी है

कुछ देर बाद पृथ्वी थोड़ी और अपनी धुरी पर घूम जाएगी

तब बूढ़े की छाया पूरे शहर पर छा जायेगी

 

फिलहाल मैं जिस कुर्सी पर बैठा हूँ

बूढ़ा उसी के सामने से जा रहा है

पता नहीं वह शहर से बाहर जा रहा है या उसमें व्याप रहा है

 

वह प्लेटफार्म से जाता हुआ मानो अभी सबके खिलाफ़ है

चेहरे पर कोई सुख नहीं कोई दुख भाव नहीं

 

वह रेललाइन पार कर रहा है

और शहर में प्रवेश करने के लिए उसका रास्ता अनिर्धारित हो चुका है ।

· 

रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति

222, राजीव नगर,

विदिशा मध्यप्रदेश

...............................

 

बचपन

वो जो बच्चा है

पाषाण को

तराशता है और

बना देता है

एक अदद स्लेट

वह स्लेट जिस पर वह कभी नहीं लिखेगा

वह जो बचपन है

बनाता है सुहाग चिन्ह

अग्नि-भट्टी पर काँच को

रूप देता है - एक गोल चूड़ी का

 

रेत से थापता है वह तीसरा बच्चा

ईंट, जो बना देता है - एक घर

वह घर जिसमें उसका आवास नहीं है

पत्ते से बना देता है वह मार्किट को बीड़ी

जो बीड़ी  धुएं में उड़ा देती है

उसके बचपन, आशा और भविष्य को ।

· 

महीपाल कैन

23, मोती बाग गाँव

नानकपुरा, दिल्ली - 110021

...............................

 

बहुत कठिन होता है

बहुत कठिन होता है

जान कर अनजान बनना

सुनके भी बहरा हो जाना

सबकुछ देखकर आँखें मूँद लेना

सचमुच बहुत कठिन होता है

होठों तक आकर अंदर का ज्वार पुनः लौट आता है

होकर गतिहीन मानव से दिनानुदिन-अनुक्षण

बनते जा रहे हैं पशु होकर बलहीन

बहुत कठिन होता है

मुखर होते हुए भी मौन-मौन रहना

मौन-मौन सहना

शायद कभी था कठिन

लेकिन चेतन से जड़ की पीड़ामय यात्रा की

शेष हैं परछाइयाँ

वैसे तो मदमस्त झरना

फिर से पत्थरों में खो गया है

बाकी है बस

रिसती हुई तनहाइयाँ

· 

संतोष रंजन शुक्ल

207, सागर होम्स 2

सर्वधर्म कॉलोनी, सेक्टर - ए, कोलार रोड़

भोपाल, मध्यप्रदेश

 

 

 

 

 

कविता

 

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