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लेखक का काम पाठक
बनाना भी है -
डॉ.दामोदर खड़से |
राजभाषा के क्षेत्र में कई तरह के
लोग कार्यरत हैं। कुछ केवल राजभाषा
तक सीमित हैं, तो कुछ
राजभाषा के अलावा खेल, साहित्य,रंगमंच आदि अन्य क्षेत्रों
में भी अच्छा दखल रखते हैं। इनमें से साहित्य के क्षेत्र
में पैठ रखने वाले वे लोग ही, जो राजभाषा की कीमत पर
साहित्य नहीं रचते या कम से कम दोनों में संतुलन बनाकर
चलते हैं, राजभाषा की चुनौतियों और अपेक्षाएँ पूरी कर पाते
हैं और अपने कर्तव्य के सात न्याय भी। डॉ. दामोदर खड़से
उन्ही विरली विभूतियों में से एक हैं। अनेकानेक पुरस्कारों-सम्मानों से
नवाजे, गए प्रतिष्ठित कवि-कथाकार-अनुवादक डॉ. खड़से से
चर्चित युवा कवि और बैंक के स्थानीय प्रधान कार्यालय, पटना
में उप प्रबंधक (राजाभाषा) के रूप में कार्यरत मुकेश
प्रत्यूष द्वारा की गई विचारोत्तेजक बातचीत ।-
संपादक
आप हिंदी के एक
महत्वपूर्ण लेखक हैं और एक लंबे समय से राजभाषा के
प्रचार-प्रसार से भी जुड़े हैं। राजभाषा अधिकारी के रूप
में कैसा अनुभव रहा आपका
?
आरंभ में तो
मैं आध्यापन से जुड़ा था, उसके बाद राजभाषा के
प्रचार-प्रसार से जुड़ गया। अध्यापन से जुड़ा रहता तो
साहित्य की बातें चलतीं । राजभाषा विभाग से जब जुड़ा, तो
हिंदी को लेकर एक नया अनुभव हुआ । दफ्तर के कामकाज केलिए
एक स्थापित भाषा के स्थान पर अपनी भाषा को बढ़ावा देना एक
चुनौतीपूर्ण कार्य है, क्योंकि इसके लिए अधिकार का प्रयोग
कम करना है, विचार-विमर्श से लोगों की मानसिकता में
परिवर्तन लाना है। यह एक अलग किस्म का दायित्व है, जो
संघर्षमय है । असंभव है, यह कहना तो निराशाजनक होगा
– पर
हाँ. कठिन है । इसे अच्छी तरह निभाने की कोशिश कर रहा हूँ
। उम्मीद है कि मीडिया, अन्य दूसरी ताकतों कथा अपने अनवरत
प्रयास से हम अपनी भाषा को दफ्तर में कामकाज की भाषा के
रूप में विकसित करने में , स्थापित करने में सफल हो जाएँगे
।
अंग्रेजी के
बढ़ते दबाव के बीच क्या करेंगे इसके लिए?
परिवर्तन हो
रहा है और बड़ी तेजी से हो रहा है । वैश्विक दबाव से हम बच
नहीं सकते । बाजार की चीजें तो नैसर्गिक पद्धति से ही
बढ़ती हैं, इस सच से हम इनकार नहीं कर सकते । इसी के बीच
अपनी भाषा के लिए काम करना है। हमें दफ्तरों में वातावरण
का निर्माण करना होगा । हिंदी में लोगों की रुचि तो है
लेकिन हिंदी बोलकर, लिखकर वे गौरवान्वित महसूस करें ऐसी
कोशिश हमें करनी है । और उसके लिए हम प्रयास कर रहे हैं।
आप राजभाषा के प्रचार-प्रसार के लिए बनी कई समितियों के
सदस्य रहे हैं । इन समितियों के संबंध में क्या अनुभव रहा
आपका?
अच्छा रहा । ये
समितियाँ तो बनाई ही गई हैं सहायता के लिए । इनका
सकारात्मक उपयोग किया जाए तो इनका लाभ है ।
आपको ऐसा नहीं
लगता कि कभी-कभी कुछ समितियों की भूमिका जाने-अनजाने
नकारात्मक होती है और उसका दुष्प्रभाव भी हिन्दी के
प्रचार-प्रसार पर पड़ता है
?
यह इस बात पर
निर्भर करता है कि इनका इस्तेमाल कैसे किया जाता है । यह
बात सही है कि स्वाधीन बारत में हिन्दी का प्रचार-प्रसार
जितना होना चाहिए था, उतना नहीं हुआ । काम करने की गुंजाइश
अभी भी है ।जितनी अपेक्षाएँ थी., हम वहाँ तक अभी नहीं
पहूँच पाए हैं । लेकिन जो भी काम हुआ है, विशेषकर
बैंकिंग-उद्योग में, वह इन समितियों की वजह से ही हुआ है ।
समितियों को श्रेय देने में मुझे कोई संकोच नहीं । लेकिन
अधिकांश समितियाँ हिन्दी में मुल काम पर जोर दिने के बदले
अनुबाद पर जोर देती हैं । और होता यह है कि उनक्
निर्देशानुसार अनवाद जब तक आता है, तब तक स्थितियाँ ही बदल
जाती हैं और अनूदित सामग्री की कोई उपयोगिता नहीं रह जाती
है । बीच में इस प्रकार की कोशिश की गई कि मुल काम हिन्दी
में हो । लेकिन हमारी व्यवस्था मूल काम हिन्दी में हो ।
लेकिन हमारी व्यवस्था की मानसिकता अंग्रेजी की ओर झुकी हुई
है । यही कारण है कि हम आज भी अनुवाद की प्रक्रिया से गुजर
रहे हैं । कई संचों से मैंने यह बात कहने की कोशिश की है
कि
‘क’
क्षेत्र में यदि मूल कार्य हिन्दी में होता है तो अंग्रेजी
का आग्रह न किया जाए और इसके लिए नियमों में जो परिवर्तन
किए जाने हों, किए जाएँ ।
आप जिस
अंग्रेजी-मानसिकता की बात कर रहे हैं, मुझे नहीं लगता कि
भविष्य में इसमें कोई बड़ा परिवर्तन होने जा रहा है । जो
पीढी़ अपने संस्कारों तक को अपनाने से इंकार करती है, वह
अपनी भाषाओं के लिए क्या आग्रह करेगी
?
इसके कई आयाम
हैं । पहला तो यह कि हिन्दी का प्रयोग नियमों के तहत
बाध्यता में किया जा रहा है । बहुत सारी बातें बाध्यता से
शुरू होकर उपयोगिता में तब्दील हो जाती हैं । बहुत पहले
मेर बैंक के एक कार्यपालक ने मुझे एक पुस्तक दी थी, जो
1936 में लिखी गई थी- हिन्दी में बैंकिंग पर । उस समय
राष्ट्रियकरण का सवाल तो क्या, हिन्दी के लिए कोई
प्रोत्साहन, कोई अनिवार्यता या कोई बाध्यता नहीं थी ।
लेकिन उस पुस्तक की उपयोगिता थी । तो कोई तीज यदि बाध्यता
की वजह से हो रही हो और उसकी उपयोगिता हो तो हमें उसे
स्वीकार कर लेना चाहिए । आज जो बाध्यता दिख रही है, कल
उसकी उपयोगिता हो सकती है ।
नहीं, मेरा
प्रश्न यह है कि आपने जिस अंग्रेजी-मानसिकता की बात की है,
उसमें कोई परिवर्तन की संभावना आपको दिखती है
?
आज की पीढ़ी की
मानसिकता को अपनी धारा में, जिसे मैं मूल धारा कहूँ तो
अन्यथा नहीं होगा, मोड़ना है । मानसिकता बदलने का दायित्व
तंत्र का है । यदि किसी कार्यालय का वरिष्ठतम अधिकारी किसी
बात का संकेत करता है तो उसका असर निश्चित रुप से पड़ता है
। मानसिकता बदलने के लिए इस व्यवस्था का उपयोग किया जा
सकता है । और उसके कारण समिति, उसके सदस्यों और राजभाषा
अधिकारियों के दायित्व पहले ती तुलना में बढ़ गए हैं ।
प्रायः ऐसा
देखा जाता है कि निजी क्षेत्र की संस्थाएँ या बहुराष्ट्रीय
कंपनियाँ हिन्दी में विज्ञापन पर जोर देती है, लेकिन जहाँ
हिन्दी-विज्ञापनों के प्रवधान या कहें नियम हैं, वहाँ
अंग्रेजी का मोह है ।
जिन्हें बाजार
में रहना है, वे हिन्दी अपना रहे हैं । संपूर्ण देश में
यदि अपनी बात को फैलाना है, तो हिन्दी का उपयोग करना ही
पड़ेगा । इसके सिवा और कोई विकल्प नहीं ।
यह तो
सिद्धान्त की बात हुई!
नहीं, हमारे
देश की जो भाषिक और वैचारिक स्थिति है, वह पेचीदा है ।
निजी क्षेत्र केवल दृश्य और श्रव्य माध्यमों में हिन्दी का
उपयोग करता है । जब लिखने की बात आती है, तो वहाँ केवन
अंग्रेजी का उपयोग होता है । सार्वजनिक क्षेत्र के
उपक्रमों में भी मूल वार्तालाप हिन्दी में होता है ,
कठिनाई तभी होती है जब लिखना होता है । और इसके लिए मानसिक
स्थिति में परिवर्तन होना आवश्यक है । हमारे पास परंपरा से
हिन्दी का वातावरण उपलब्ध नहीं, हमें उसे बनाना है । और जब
तक उसका निर्माण नहीं हो जाता, हम असुविधा महसूस करते
रहेंगे ।आपको क्या लगता है, किसी संस्थान का हिन्दी
अधिकारी तब तक कुछ नहीं कर सकता, जब तक कि उस कार्यालय का
वरिष्ठतम अधिकारी उसके साथ न हो ।
क्या आपको कभी
ऐसा लगता है कि अनुवाद का कार्य राजभाषा विभाग से हटा दिया
जाए तो हिन्दी का विकास ज्यादा तेजी से होगा
?
पूरी तरह कैसे
हटा सकते हैं
? जो
अनिवार्यताएथँ हैं, वे तो रहेंगी ही । हाँ, राजभाषा विभाग
की भूमिका में परिवर्तन किया जा सकता हे । उसे लोगों को
अपना काम स्वयं हिन्दी में करने किलिए प्रेरित-प्रोत्साहित
करना होगा । लेकिन यहाँ भी वही बात है, वातावरण के निर्माण
की । सब-कुछ उसी पर निर्भर करता है ।
आप
बैंकिंग-शब्दावली के निर्माताओं में से एक रहे हैं । इस
शब्दावली में तकनीकी शब्दों के विकल्प के कारण एक ही
संस्थान में एक ही शब्द के अलग-अलग पर्याय प्रचलन में आ
जाते हैं । एकरुपता नहीं रह जाती । विकल्पहीन पर्याय की
कोशिश आप क्यों नहीं करते
?
अभी जो काम चल
रहा है नए संस्करण के लिए, उसमें यह ध्यान रखा जा रहा है
कि विकल्प कम हों । विकल्पों को एकदम समाप्त तो नहीं कर
सकते, लेकिन कम कर सकते हैं । बैंकिंग में अनेक शब्द ऐसे
हैं, जो भिन्न अवसरों पर भिन्न अर्थों में प्रयोग किए जाते
हैं । इसलिए कोशिश यह की जा रही है कि नए संस्करण में इस
आशय के संकेत भी दिए जाएँ कि इस अवसर पर इस शब्द का यह
अर्थ होगा ।
कविता, कहानी,
उपन्यास... आपने साहित्य की लगभग सभी विधाओं में लिखा है ।
किस विधा में लिखकर आपको लगता है कि जो कहन चाहता था, उसे
कह दिया या स्वयं को अभिव्यक्त कर दिया
?
ऐसा तो नहीं है
कि सोचकर बैठें कि आज कविता लिखनी है और आज कहानी । स्थिति
की जैसी माँग होती है, उसके अनुसार अभिव्यक्ति का माध्यम
तय होता है । यदि कोई बात कविता में कही जा सकती है तो
कविता लिखता हूँ और यदि लगता है कि इस विषय को और गूँथा
जाए और बुना जाए तो कहानी । विषय के हिसाब से विधा तय करता
हूँ ।
यानी क्या लिखना है, यह आप विषयगत दबाब में तय करते हैं ।
हाँ।
लेकिन आपकी
कहानियों के संबंध में तो माना जाता है कि वे व्यक्तित्व
ज्यादा हैं । विषय उनके केंद्र में नहीं होता
?
व्यक्ति और
विषय को अलग करना मुश्किल है, क्योंकि हर व्यक्ति
किसी-न-किसी विषय से जुड़ा होगा और हर विषय किसी-न-किसी
व्यक्ति से । लेकिन उससे रचना के ट्रीटमेंट में फर्क आ
जाता है । जैसे आपकी पार्टनर कहकानी को ही लें । आपने
स्वयं लिखा है कि उसे लिखने में अपको पाँच वर्ष से ज्यादा
समय लग गया । उसके बदले आपने एक और कहानी लिख डाली, लेकिन
वह कहानी केवल इसलिए रुकी रही कि उसके अंत का पता आपको
नहीं था । एक रचना कि शुरुआत कर उसका स्वभाविक विकास होते
देने और उसे एक तयशुदा अंत तक पहुँचाने में फर्क होता है ।
कई बार
लिखते-लिखते छोर खो जाते हैं । पार्टनर के साथ ऐसा हि हुआ
। मैं कहानी लिखने बैठा और वह उपन्यास बनता गया । चूँकि
मैं उसे एक विशिष्ट शैली में लिख रहा थआ, इसलिए मेरे साथ
समस्या शैली और विषय दोनों को बरकरार रखने की थी । इसी
क्रम में उसका अंत मुझसे छूट गया ।
आप उस रचना का स्वभाविक अंत होने देते । किसी तयशुदा अंत
तक पहुँचाने का आग्रह क्यों
?
अंत तो तयशुदा
था, लेकिन मैं यह तय नहीं कर पा रहा था कि यह अंत ठीक है
या नहीं । कई बार ऐसा होता है कि पात्र ही लेखक की उँगली
पकड़ लेते हैं । मैं यही सोचता रहा कि यदि अभी इसे पूरी
करता हूँ तो यह वैसी रचना नहीं बन पाएगी, जैसी मैंने
कल्पना की है । मुझे शैली के अनुरुप अंत की तलाश थी ।
यानी आपका,
आग्रह शिल्पगत था, परिणामगत नहीं
?
दोनों था । इस
कहानी का अंत एकदम मानवीय है । इस कहानी में यदि कहीं
भगदड़ है, तो वह बी मानव के भीतर की संवेदनाएँ हैं । कुछ
घटनाएँ, कुछ भावावेश, कुछ दबाव आदमी के भीतर होते हैं,
उन्हें भी बाहर आने का अवसर मिलना चाहिए । अपने भीतर के
आदमी से परिच्त होने की कोशिश करनी चाहिए ।
आपने लिखा है
कि आपका मन खरगोश को रोएँ-सा सपने देखता है और जब नींद
टूटती है तो पंकवाली कँटीली राह मिल जाती है । आपके पात्र
प्रायः संघर्ष करते हुए नहीं, पालायन करते हुए दिखते हैं ।
क्या वे सपने और यथार्थ में तानमेल नहीं बिठा पाते
?
नहीं, मेरे
पात्र भागते नहीं, वे अपने भविष्य को थामने की कोशिश करते
हैं । वे अपने दुःस्वप्न को पीछे छोड़कर सपने के साथ जाते
हैं । गरीबी, अभाव और अपने जीवन के तनाव के साथ उनका
संघर्ष होता है, लेकिन वे उससे उबरने की कोशिश करते हैं ।
आप लिखते हैं
कि विद्रोह सृजन का कारण होता है, इसका तात्पर्य कहीं यह
तो नहीं कि सृजन विद्रोह के लिए होता है
?
सृजन विद्रोह
के लिए ही होता है । उन हालात से विद्रोह के लिए, जिन पर
किसी एक व्यक्ति, समाज या समुदाय ने कब्जा कर रखा है । यह
एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है ।
क्या इसीलिए
अनुवाद करते समय आपने उन किताबों का चयन किया, जिनके
रचयिताओं ने अपनी परिस्थितियों से उबरने कि लिए एक लंबा
संघर्ष किया
?
हाँ । सबसे
पहले मैंने दया पवार की आत्मकथा का अनुवाद किया । अनुवाद
करते वक्त यह बात मेरे ध्यान में थी कि समाज के सभी वर्गों
को इस बात की जानकारी मिल सके कि महाराष्ट्र के दूर-दराज
के इलाके में बैठे हुए एक व्यक्ति के भीतर कितना बड़ा
ज्वालामुखी धधक रहा है ।
आपके द्वारा
अनूदित अधिकांश पुस्तकें दलित लेखकों की आत्मकथाएँ हैं ।
क्या आपके कभी इस बात पर गौर किकया है कि अधिकांश दलित
रचनाकार सृजनात्मक साहित्य के बदले आत्मकथाएँ क्यों लिखते
हैं
?
अपने भीतर छिपे
दर्द का बयान करने के लिए उन्होंने प्रथम पुरुष का सहारा
लिया है । उनका दर्द भयानक है । एक तथाकथित सभ्य समाज में
एक व्यक्ति को अपनी पहचान छिपानी पड़े, यह कितने शर्म की
बात है । कई रचनाकारों मे सृजनात्मक साहित्य भी लिखा है,
लेकिन उसमें भी यही दर्द है । एक लेखक का मैं जिक्र
करूँ-बाबूराव बाबूल । उनकी कहानियों ने पूरे समाज को झकझोर
दिया । एक व्यक्ति जो अपनी जात छिपाकर रहता है, जब उसकी
जाति का पता लोगों को लगता है तो वही लोग जो उसे एक सभ्य,
सुसंस्कृत समझते थे, आरोप लगाकर पीटते हैं । जाहिर है,
बाबूराव ने इस तरह की स्थिति को देखा-महसूस किया होगा, तभी
लिखा ।
लेकिन उनके
लेखन की मुख्य चिंता यह है कि मैं कौन हूँ और मुझे क्या
होना चाहिए था, इस बात की नहीं कि मैं इस स्थिति में क्यों
हूँ ।
यह एक
प्रतिक्रिया है । समाज ने, जमाने ने, स्थितियों ने जो
दिया, उन्होंने वही लौटाया है । उनके दुःख, उनकी वंचना ने
उन्हें आत्मकथा लिखने के लिए मजबूर किया । इसे उनका
विद्रोह भी मान सकते हैं ।
जो दुःख
उन्होंने झेला हैं, उसे औरों को न झेलना पड़े, इसके लिए इन
लोगों ने कोई प्रयास किया क्या
? लिखना
और परिवर्तन के लिए संघर्ष करना, दोनों को एक करके नहीं
देखा जा सकता ।
यह एक
सीधी प्रक्रिया नहीं है । परिवर्तन एक लंबी, निरंतर चलने
वाली प्रक्रिया है । इसी क्रम में कुछ लोग समाज में समता
लाने की कोशिश करते हैं, जैसे महात्मा फूले । समाज में जो
विसंगतियाँ हैं, जो विरोधाभास हैं, शोषक और शोषित जो दो
वर्ग हैं, जब तक ये रहेंगे तब तक वर्ग या वर्ण-संघर्ष होगा
।
और कट्टरता या
असहिष्णुता बढ़ने का यही कारण भी है
?
यह हमारे समय
का दुर्भाग्य है । दरअसल जहाँ समानता के सिद्धांत पर
एक-दूसरे का सम्मान होता है, वह एक बेहतक समाज होता है ।
दूसरे के विचारों का सम्मान करने की उदारता हमारे भीतर
होनी चाहिए और अगर अपने विचारों को हम निर्भिकता के साथ
सामने रखते हैं, तो उसका आदर भी होना चाहिए ।
लेखक को क्या
केवल लिखने तक सीमित रहना चाहिए या कि पाठक-वर्ग के
निर्माण की भी कोशिश करनी चाहिए?
लेखक का काम
पाठक बनाना भी है । पाठक-वर्ग के अभाव के लिए रचनाकार बी
दोषी है । क्योंकि हमारे जिवन में जो मूल सवाल हैं, उन
सवालों को जब हम अपने लेखन में लाएँगे और पाठक को ऐसा
लगेगा कि उससे वह समृद्ध हो रहा है, तभी वह उससे जूड़ेगा ।
वैसे आज भौतिकता के दबाव से थोड़ी उदासीनता आ गई है, लेकिन
स्थिति निराशाजनक नहीं है ।
मुकेश
प्रत्यूष
उप
प्रबंधक (राजाभाषा)
प्रधान
कार्यालय, भारतीय स्टेट बैक
पटना,
बिहार
