आखिर
करे भी तो क्या करे बिस्सेसर, किसे सुनाये अपने दिल का
दुखड़ा,
अपनी पत्नी को
? अपने
बच्चों को
? अपने
मित्रों को या फिर पड़ोसियों को
? सब के
सब कन्नी काट जाते हैं, सबके पास अपने-अपने बहाने हैं ।
आखिर वह चाहता क्या है
? यह
किसी को जानने की आवश्यकता नहीं है, वह क्यों, रात जागकर,
गुज़ार देता है
? उसके
कलेजे में छायी दुःख की बदली क्यो गरजती-बरसती रहती है
? यह
जानने के लिए किसी के पास फ़ुर्सत हो तब न
! कितना
व्यस्त हो गया है आज का आदमी, उसके पास यदि किसी
चीज़ की
कमी है तो वह समय है, कितना टोटा हो गया है समय का आदमी के
पास । सामने से आता दोस्त भी, उसे देख रास्ता बदल लेता है,
ऐसे कठिन समय में, आखिर करे भी तो क्या करे बिसेस्सर ।
एक दिन उसकी पत्नी ने उसकी आँखों में आँखें डालते हुए तथा
अपनी नाजुक व नर्म अंगुलियों से बालों को सहलाते हुए, उसकी
पीड़ा को जानने की कोशिश की थी,
बड़ा अच्छा लगा था उसे उस
वक्त,
‘कोई तो
है उसके दिल का हाल पूछने वाला,
सोचते हुए वह भावुक हो उठा था, और उसके सीने से चिपट गया
था, कलेजे में वर्षों से जमे हिमखंड पिघल-फिघलकर बहने लगे
थे ।
चालीस-बयालीस साल का वह अधेड़, एकदम बच्चा बन गया था, अपनी
व्यथा-कथा सुनाते हुए वह अपने अतीत की तीस बरस की घाटी में
उतरने लगा था, और उसने चारों ओर स्मृतियों का बीहड़-जंगल
उग आया था । सारी बातों को गंभीरता से सुनने के बाद, उसकी
पत्नी ने अफ़सोस जताते हुए कहा था,
“तीस
बरस का समय कम नहीं होता, यदि वे जीवित होते तो तब तक लौट
आते अथवा चिट्ठी
–पत्री
से अपने होने का सबूत देते, आदमी इतना पत्थर दिल भी नहीं
होता कि उसे अपनी मातृ-भूमि की याद ही नं आये, मेरी मानो
तो आप बच्चों को साथ लेकर, गयाजी हो आओ, उनका पिंड-दान
करवा आओ, ताकि उनकी आत्मा को शांति मिल जाये और आपकी आत्मा
को भी, मृत-आत्माएं, आदमी का पीछा तब तक नहीं छोड़ती, जब तक
विधि-विधान से क्रिया-कर्म न करा दिया जाये
।”
पत्नी की सपाट बयानी पर उसे बेहद क्रोध हो आया था, सुनते ही
वह उबलने लगा था, उसका चेहरा तमतमाने लगा था, पैर पटकते
हुए वह यह कहकर उठ खड़ा हुआ था,
“तुम भी
औरों की तरह सोचती हो, मेरा भाई जिंदा है, देखना ....एक दिन
वह लौट आयेगा
।”
टोह लेने की मंशा से एक दिन उसने बेटों को बुलाया, पास
बिठाया और पूछा कि वे क्या सोचते हैं, बेटे जानते थे कि
पिता अपने भाई के बारे में वह सब कुछ सुनना नहीं चाहेंगे जो
वे कहना चाहते हैं, जवाब तो आखिर उन्हें देना ही था,
शब्दों को तौलते हुए बड़े बेटे ने कहा,
“पिताजी,
अतीत को अतीत ही रहने दें, इसमें ही भलाई है, आप वर्तमान को
जियें, जो पीछे ठूट गया, सो छूट गया, हम सबके बारे में
सोचिए, हम आपका वर्तमान हैं और भविष्य भी
।”
ऐसा कहते हुए उसने अपना नन्हा सा बेटा उसकी गोद में डाल
दिया था ।
शब्दों की जादूगरी वह समझ रहा था, वह यह भी समझ रहा था कि
उसका मंतव्य क्या है ।
निराशा भरी व
मिचमिचाती आँखों से उसने आसमान को देखा, हमेशा की तरह
निर्मल-शांत और अपना नीलापन लिये हुए आसमान एकाएक मटमैला
हो गया था, हवा का चलना एकदम बंद हो गया था और आसमान में
उड़ती चीलें, गिद्ध अधर में लटकर गये थे, मानों उन्हें
किसी ने कीलों से जड़ दिया हो ।
निराशा और
हताशा के बीच के पतले से सूराक के बीच गुज़रते हुए उसने एक
ऐसे व्यक्ति को खोज निकाला जो न तो भाग सकता था
। जिसे, न तो
भूख सताती थी, न ही प्यास और न ही वह पेशाब करने का बहाना
बताकर रफू-चक्कर ही हो सकता था ।
वह एक आईना खरीद लाया था और उसे अपने शयन कक्ष में लगा
दिया था, आईने के सामने बैठकर वह अपने मन की पीड़ा उज़ागर
कर देता था, जानता था वह, वह उसका अक्स है, उसकी
प्रतिच्छाया है, लेकिन कोई तो है सुनने वाला, अपनी बात,
पूरी तरह उगल देने के बाद वह एकदम खाली हो जाता, ऐसा करते
हुए वह प्रसन्नता से भरने लगता था ।
उसे अब भी याद है
। भइया रामेश्वर के इस तरह चले जाने के
बाद, सके माता-पिता पर क्या गुज़री थी, माँ तो जैसे
विक्षिप्त सी हो गयी थी, वह बोलती बतियाती नहीं थी, वह
अक्सर कहती,
“मेरे
राम-लक्ष्मण की जोडी़ बिछड़ गयी,”
पिता कहते
“मेरी
अयोध्या राम के बगैर सूनी हो गयी,”
बावजूद इसके वे माँ को समझाने का प्रयास करते, माँ कहती,
“कैसे
भूल जाऊं...कैसे कह दूं कि वह मेरे शरीर का हिस्सा नहीं
रहा, कैरे भूल जाऊं कि वह मेरे कोख में नौ माह नहीं रहा
।”
कुछ दिनों बाद
पिता ने अपने आपको एक कमरे मे कैद कर लिया था
। वियोग के
विषधर की फुंफकार से उनका गोरा बदन एकदम काला पड़ गया था ।
पिता अक्सर यह
कहते सुने गये,
“शरीर
एक बार बिगड़ जाये तो इसे सुधारा जा सकता है एक से बढ़कर
एक डॉक्टर हैं आज देश में, मन, अगर एक बात दबक खा जाये, तो
उसे सुधारना मुश्किल
। कहते हैं कि इसकी दवा हकीम लुकमान के
पास भी नहीं थी
।"
सबको
सीख देने वाले पिता का मन भी टब़का खा गया था।
बिसेस्सर जब भी गहरी नीद में होता है वह तीस साल पुरानी
घटना, सपना बनकर आँखों के सामने घूमने लगती है, ठीक सिनेमा
की रील की तरह, एक-एक पल, एक-एक क्षण जीवंत हो उठते हैं, जब
वह अचेतन अवस्था में रहता है
। उसे कुछ भी याद नहीं रहता
। यदि
नींद खुल गयी, तो वह जागती आँखों से वह सब देखता रहता है,
क्योंकि यही तो वे क्षण होते हैं, जब वह अपने भाई की छवि
देख पाता है ।
उसके सपने में उभरता है एक गाँव
। गाँव के किनारे
बहता चमार
नाला । इसी चमार नाले मे उतरकर उसके पूर्वज मरे जानवरों का
चमड़ा उतारा करते थे
। उसके परदादा एक
कुशल चर्मकार थे
। उन्होंने उस समय के ज़मीदार को एक ऐसी अनोखी जूती बनाकर
नजराने में पेश की थी
जिसे समय पड़ने पर काग़ज़ की तरह
मोड़कर जेब मे रखा जा सकता था
। उसकी कलात्मक नक़्काशी और
बेलबूटे बनाने में पूरे छः माह का समय लगा था ।
ज़मीदार ने खुश
होते हुए उन्हे उसे नाले के पास की ज़मीन बतौर पुरस्कार में
देते हुए कहा था कि एक अभिशप्त और उजाड़ा भूमि को एक
कलाकार ही संवार सकता है
। उसके परदादा ने, न सिर्फ कड़ी
मेहनत की बल्कि अपने कठिन परिश्रम से उसे खेती लायक भी बना
डाला । उस समय से वह भूमि उनके परिवार के अधिकार में रही ।
देश आज़ाद हुआ
। गाँव, एक औद्योगिक नगर के रूप में विकसित होने लगा, ज़मीन
की क़ीमतें आसमान छूने लगी
। तब ज़मीदार के वंशज अपने प्रभाव
एवं ताकत के बल पर उस ज़मीन को हथियाने के लिए प्रपंच रचने
लगे ।
गर्मी के दिन
थे । कटाई के बाद गेहूं खलिहानों में रख दिया था
। खेत ख़ाली
पड़े थे । उचित अवसर देख लठैतों ने उसके पिता को घेर लिया
और धमकी दी कि
वह तत्काल गाँव छोड़कर भाग जाये अन्यथा जान
की ख़ैरियत नहीं
। जब पिता नहीं माने तो खेत खलियानो में लगा
दी गयी । लाठियां बरसायी जाने लगी, आग की विकराल लपटों व चीख
पुकार की आवाज़े सबसे पहले
बिसेस्सर ने ही सुनी
। वह चिल्ला
उठा,
“भइया
आग
! किसी
ने हमरे खेतों में आग लगा दी है।”
रामेस्सर उससे मात्र चार साल बड़ा था
। अल्पवय के
बावजूद वह
कद्दावर होने के साथ ही वलिष्ठ भी था, उसकी चाल मे चीते
की सी उछाल थी
। पल भर मे वह वहाँ जा पहुँचा था
। उसने देखा
कि ज़मीदार का पोता उसके पिता को जूतो-चप्पलों से पीट रहा
है और भद्दी-भद्दी गालियाँ भी दे रहा हैं
। देखते ही उसका
खून खौल उठा था
। उसने एक बड़ा सा पत्थर उठाया और निशाना
साधकर पोते की ओर उछाल दिया, पत्थर निशाने पर पड़ा था और वह
ज़मीन पर मछलियों की तरह तड़प रहा था
। शायद उसकी खोपड़ी चटक
गयी थी । फिर उसने एक लठैत से लाठी छीनकर बार करना शुरू
किया, कुछ लठैत भाग खड़े हुए कुछ जमीन की
धूल चाटते, औंधे
पड़े थे । ज़मीन पर पड़े ज़मीदार के पोते को उसने तीन-चार
लाते जमायी, इस तरह उसने पिता के अपमान का बदला ले लिया था
इसी बीच पुलिस भी आ पहुँची थी, इस बार भी विसेंस्सर
चिल्लाया था,
“भइया
पुलिस आ गयी है,”
इतना सुनते ही वह भाग खड़ा हुआ था,
बिसेस्सर की नज़रें
अपने भाई का पीछा तब तक करती रही थी, जब तक वह आँखों से
ओझल नहीं हो गया था।
स्मृति के बतौर केवल वह एक घटना है,
जिसमें उसने अंतिम बार अपने भाई को देखा था, वह बार-बार इस
घटना को अपनी स्मृति में दोहराता रहता है, ताकि वह अपने
भाई की उस छवि को देखता रहे ।
वह मुकदमा जीत चुका था, उस कीमती ज़मीन की वजह से ही उसके
पास आज आलीशान बंगले हैं, मोटर गाड़ियाँ हैं, बैंक-बैलेंस
है और नौकर-चाकरों की
भीड़ भी। सब कुछ होते हुए भी वह
अपने आपको अनाथ ही कहता है क्योंकि इस प्रकरण को जीतने से
पहिले उसने अपने माता-पिता और भाई को खो दिया था, उसे अब
भी विश्वास है कि उसका भाई, एक न एक दिन वापिस लौट आयेगा
।
रोज़ की तरह उसने एक सपना देखा
। वह भयंकर और अज़ीब सपना था
वह । वह उठ बैठा और बगीचे में चला आया था भोर की उजास अभी
फैलनी बाक़ी थी
। तभी उसे लगा कि कोई उसकी ओर आ रहा है, कौन
है वह
? यह
स्पष्ट तो देख नहीं पाया था, आवाज़ नज़दीक आती जा रही थी,
वह पास आ गया था और ऊंचे स्वर में उसने उसे पुकारा
–बिसेस्सर...
बिसेस्सर मेरे भाई ....देख में लौट आया हूँ आवाज़ रामेस्सर
की ही थी, वह आवाज़ को ठीक से पहचान सकता था ।
एक अस्पष्ट बिंब, स्पष्ट होता जा रहा था। वह लौट आया था।
खून ने खून को पहचान लिया था
। दोनों भाई एक दूसरे में लिपटे
रहे, आँसुओं की धारा बहती रही और मौन संवाद चलता रहा
।
आस्थाओं का मृतप्राय जंगल फिर लहलहाने लगा
था तथा मधुमास
की मादक गंध फैलने लगी थी
। चौदह साल से कुछ
ज़्यादा......दो गुणा वनवास काटकर राम अपनी आयोध्या में
लौट आये थे
। परिवार का हर छोटा-बड़ा सदस्य अपने दादाजी के
चरणों में नतमस्तक था ।
देर रात तक बिसेस्सर अपनी तीस साला कहानी सुनाता रहा था,
ज़मीन के प्रकरण से लेकर, अपने माँ-बाप का करुण अंत और बाद
की बातें उसने एक सांस में कह सुनायी थीं
।
अब रामेस्सर की
बारी थी, घर छोड़ने से लेकर घर बसाने तक की दास्तान उसने
कह सुनायी, सारा कुनबा अपने दादाजी की बातों को परी-कथा की
कहानी की भांति सुन रहा था । राम-कथा सुनने
के बाद बिसेस्सर ने बड़े ही विनीत भाव से कहा कि वे सीता
जैसी भाभी और बच्चों को यहाँ ले आयें, बातों को स्पष्ट
करते हुए उसने यह भी कहा कि उसका आधा हिस्सा आज भी अमानत
के तौर पर मेरे पास सुरक्षित है, वह भी आप ले लीजिए। सारी रात दोनों
भाई बातें करते रहे और रात मोमबत्ती की तरह सुलगती पिघलती
रही ।
आठ दस दिन कैसे
बीत गये, पता ही नहीं चल पाया
। रामेस्सर अब लौट जाना चाहता
था । उसे अपनी बीबी-बच्चों की याद सताने लगी
थी । उतावली में
वह बिना बतलाये ही चला आया था
। वह हर हाल में लौट जाना
चाहता था ।
बिसेस्सर ज़िद
लगाये बैठा था कि वह अब किसी भी क़ीमत पर उसे जाने नहीं
देगा । वह कोर्ट से स्टैंप-पेपर भी खरीद लाया था और यह
चाहता था कि जितनी जल्दी हो सके,
वह अपने भाई का आधा
हिस्सा, उसे सौपकर, शेष जीवन निश्चिंतता से काट देगा
।
रात का सन्नाटा
पसरा पड़ा
। रामेस्सर गहरी नींद में सोया ख़र्राटे भर रहा था
।
बिसेस्सर के बड़े बेटे
ने बड़ी सावधानी के साथ, दादू के बगल में
सोये अपने पिता को लगाया और उस कमरे मे ले आया, जहाँ पहले
से ही उसकी पत्नी और परिवार के शेष जन वैठे हुए थे
।
बिसेस्सर का माथा ठनका था इस हरकत पर । शंका-कुशंका की घनी
बेलें उसके शरीर में तेज़ी से लिपटने लगी थीं और चिंता की
मकड़ी उसके चेहरे पर जाल बुनने लगी थीं ।
एक कुर्सी में
धंसते हुए उसने धड़कते दिल से पूछा,
“इतनी
रात गये, इस तरह बुलाने का
मलतब
?” सभी
के म्लान चेहरों पर नज़रें घुमाते हुए उसने पूछा था ।
बड़े बेटे ने पहले करते हुए कहा,
"पितीजी....
ये क्या पागलपन मचा रखा है आपने ?
लाखों-करोड़ों की जायदाद मुफ़्त में ही बाँट देगें क्या
? इस ज़मीन को लेकर कितने
कष्ट सहें है आपने । हफ़्तों भुखमरी की मार झेली थी आपने ।
इन्होंने आख़िर किया ही क्या था ? और
आप, बड़ी आसानी से इतनी बड़ी जायजाद तश्तरी में रखकर ऐसे
भेंट में दे रहे हैं जैसे वह फुलपत्ती हो । इस धोखेबाज भाई
ने किया ही क्या है आपके वास्ते ?
गुपचुप अपनी गृहस्थी बसा ली और पलटकर भी नहीं देखा कि आप
पर क्या बीत रही है । हम चुप नहीं बैंठेगें और ऐसा होने भी
नहीं देगें । जैसा कि आप सोच रहे हैं ।"
बौलते समय उसके चेहरे पर तनाव की घनी परछाइयाँ देखी जा
सकती थी । वह तैश में था । उसकी आवाज़ में तलखी थी । बोलते
समय उसका शरीर आवेश में काँप रहा था ।
बातें सुनकर बिसेस्सर को लगा कि असंख्य बर्र मक्खियों ने
उस पर अचानक हमला बोल दिया है और सारे शरीर पर दंशों के
निशान उभर आये हैं । उसे तो ऐसा भी लगा कि उसके कपड़े
जबरिया उतार दिये गये हैं और उसे तपती रेत के ऊपर लिटा
दिया गया है । चील और गिद्ध उसके शरीर से मांस-पिंड नोचकर
खा रहे हैं । उसका दम घुटने लगा था । उस कमरे में वह और
ज्यादा देर तक बैठा नहीं रह सकता था वह तेज़ी के साथ
खड़ा हुआ और उस कमरे की तरफ़ भाग चला था जहाँ उसका बड़ा
भाई सो रहा था ।
वह हैरान व हतप्रभ था । यह देखकर कि उसका बड़ा भाई उस कमरे
में नहीं था । कहाँ चला गया होगा वह
? ढेर
सारे प्रश्न उसके दिमाग को मथने लगे थे । इस कमरे से उस
कमरे और उस कमरे से दूसरे कमरों को वह अब तक छान चुका था ।
कहीं भी वह नहीं मिला । उसका दिल तेज़ी के साथ धड़कने लगा
था । तीस बरस की कठिन तपस्या के बाद उसे उसका भाई मिला था
और कितनी आसानी से वह फिर गायब हो गया है । पागलों की तरह
चीखते हुए, भैया तुम कहाँ हो, भैया तुम कहाँ हो ?
कहते हुए वह बाहर निकल आया था । बाहर घना
अंधकार फैला हुआ था और सांय-सांय की आवाज़े आ रही थीं ।
रात्रि अपने अंतिम पहर की बची-खुची सांसे ले रही थी ।
गहन-दुर्गम अंधकार की परतों से टकराकर उसकी आवाज़ वापस लौट
आयी थीं।
सपना
टूटा । आस भी टूटी । धीरे-धीरे अब वह हक़ीकत की दुनियाँ
में लौटने लगा था । थके-हारे भारी क़दमों से वह वापिस लौट
रहा था ........ बुदबुदाते हुए वह इतना ही कह पाया था -
राम .... इस स्वर्ण नगरी में तुम रह भी कैसे सकते थे ।
स्मृतियों का बीहड़-जंगल उसके चारों ओर फैलने लगा था और वह
उसमें समा गया था ।
गोवर्धन यादव
103,
कावेरी नगर, छिंदवाड़ा
मध्यप्रदेश, 480001
