रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

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हस्ताक्षर

 

समय के हस्ताक्षर

घनानंद

(इस माह से हम 'समय के हस्ताक्षर' नामक नया स्तम्भ प्रारंभ कर रहे हैं । यह हिंदी के अतिमहत्वपूर्ण रचनाकारों पर केंद्रित होगा । इस स्तम्भ के माध्यम से पाठक अपने युग के महान रचनाकारों के बारे में वह बातें भी जान सकेंगे जो खासकर हिंदी इंटरनेट पर अब तलक अनुपलब्ध हैं। इस बहाने हिंदी के उज्ज्वल अतीत की समृद्ध परंपरा पर दृष्टि भी डाली जा सकेगी ।- संपादक)

 

         रीतिकाल की तीन प्रमुख काव्यधाराओं-रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त में घनानन्द अंतिम काव्यधारा के अग्रणी कवि हैं। रीतिबद्ध कवियों के लिए आवश्यक शर्त यह थी कि उन्हें ग्रंथ-रचना के नियमों से बँधा और जकड़ा रहना पड़ता था। अपने मनोभावों को वे लक्षण के अनुसार अभिव्यक्त करते थे। दूसरी कोटि के कवि अर्थात् रीतिसिद्ध कवियों के लिए इस प्रकार की कोई आवश्यक शर्त न थी कि उन्हें रीतिग्रंथ ही लिखना है-परंतु वे कवि भी स्वतंत्र भावाभिव्यक्ति के लिए उन्मुक्त न थे। ये कवि लक्षणबद्ध ग्रंथ की रचना नहीं करते थे, परंतु इनकी काव्य-रचना में रीति का पूरा-पूरा प्रभाव था, जैसे बिहारी, रसनिधि इत्यादि । ये कवि रीतिबद्ध काव्य-रचना के मार्ग पर नहीं चलते थे - पर उसी मार्ग के साथ-साथ ही इनको बचना पड़ता था। फलतः इनकी काव्य-रचना में वे नियम कुछ शिथिल थे, जिन्हें रीतिबद्ध कवियों ने प्राणप्रण से अपना रखा था। तीसरे प्रकार के कवि वे थे, जो न तो रीतिबद्ध थे, न रीतिबद्ध अर्थात वे रीतिमुक्त कवि थे - जिन्हें रीति के नाम से ही घृणा थी - वे रीति का छायामात्र से भी दूर भागते थे। अपने हृदय की उमंगपूर्ण, स्वानुभूत भावनाओं को इन कवियों ने उसी रूप में अभिव्यक्त किया, जैसी उनकी अनुभूति थी । फलतः अपनी स्वच्छंद वृत्ति के कारण ये कवि रीतिमुक्त कवि कहलाए। घनानन्द, बोधा ठाकुर आदि कवि इसी धारा के सितारे हैं।

 

घनानन्द का जीवन-वृत्त

        हिंदी साहित्य के प्रथम तीन कालों अर्थात् आदिकाल, भक्तिकाल और रीतिकाल के प्रमुख कवियों के जीवन के विषय में शायद ही कुछ ऐसा हो, जिसे दृढ़ता से कहा  जा सके। लगभग इन कालों के सभी कवियों ने अपने विषय में बहुत कम लिखा है। इसे हिंदी साहित्य का दुर्भाग्य कहा जा सकता है कि इन कवियों का जीवन अस्पष्ट और अंधकारमय है। आदिकाल के चंद कवि को लें या नरपति नाल्ह को, किसी का भी पूरा जीवन-परिचय नहीं मिलता। इस काल के पश्चात् यदि भक्तिकाल की ओर दृष्टि डाली जाए तो वहाँ भी यही निराशा होती है। कबीर हो या सूर अथवा तुलसी-सभी कवियों ने अपने विषय में इतना कम लिखा है कि वह उनके जीवन पर पूर्ण प्रकाश नहीं डालता । इसी प्रकार रीतिकाल की रीतिमुक्त काव्यधारा के कवि घनानन्द भी अपवाद नहीं। उनका प्रेमवत्सल हृदय अपने प्रेमी की महिमा का वर्णन करने में ही मग्न रहता था, अपने लिए कुछ लिखने का उनके पास अवकाश ही कहाँ रहा होगा ?

 

समय और नाम के विषय में विवाद

        घनानन्द कब हुए, कहाँ हुए, यह सब लिखने से पूर्व यह आवश्यक हो जाता है कि उनका असली नाम क्या था-यह जान लिया जाए। वास्तव में हिन्दी साहित्य में केवल एक ही घनानन्द नहीं हुए, इस नाम के अन्य कवि भी मिलते हैं। इसी से स्वच्छंद काव्यधारा के घनानन्द के नाम की प्रामाणिकता का प्रश्न हमारे सामने उपस्थित होता है। इस विषय में विद्वानों में बड़ा मतभेद है। घनानन्द, आनन्दघन और आनन्द-इन तीन नामों में विवाद है कि आलोच्य घनानन्द वास्तव में कौन-से हैं ?

 

        घनानन्द  के नामकरण पर यदि शोध किया जाए तो ज्ञात होगा कि विद्वानों की एक लंबी कड़ी है, जो इस विषय पर विभिन्न प्रकार से प्रकाश डालती है। वे विद्वान हैं - डॉ. ग्रियर्सन, अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध, श्री क्षितिमोहन सेन, डॉ. श्याममुंदर दास, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, श्री हजारीप्रसाद द्विवेदी,  इत्यादि ।

डॉ.ग्रियर्सन ने आनन्द को ही रीतिमुक्त काव्यधारा के कवि घनानन्द माना है। उनके मत में घनशब्द आनन्द के साथ नहीं, पर वे आनन्द ही घनानन्द हैं । परंतु अत्याधुनिक शोध ने यह सिद्ध कर दिया है कि आनन्द एक स्वतंत्र कवि थे, जिन्होंने कोकमंजरी काव्य की रनचा की थी

कायस्थ कुल आनन्द कवि

       वासी कोट हिसार।

कोककला इहिरुचि करन

जिन यह कियको विचार।।

 

        आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र के मत में भी ग्रियर्सन वाले आनन्द घनानन्द नहीं हैं, क्योंकि दोनों के रचना-काल में लगभग चालीस वर्षों का अंतर है।

घनानन्द के नामकरण के संबंध में दूसरा मुख्य विवाद आनन्दघन नाम को लेकर है। आनन्दघन नाम के तीन व्यक्ति मिलते हैं-

1.        जैनधर्मी घन आनन्द

2.        वृंदावन के आनन्दघन

3.        नंदगाँव के आनन्दघन

        श्री क्षितिमोहन सेन ने नवंबर सन् 1938 में वीणा में जैनधर्मी आनन्दघन शीर्षक के एक लेख में वृंदावन के आनन्दघन और जैनधर्मी घन आनन्द-दोनों के ही व्यक्ति के नाम होने की संभावना प्रकट की है। श्रीमती ज्ञानदेवी त्रिवेदी ने भी दोनों को एक ही व्यक्ति माना है, किंतु आचार्य विश्वानाथ प्रसाद मिश्र ने अपनी पुस्तक घनानन्द और आनन्दघन की भूमिका में इस विवाद को समाप्त करते हुए यह सिद्ध किया है कि जैनधर्मी घन आनन्द और वृंदावन के आनन्दघन दोनों एक व्यक्ति नहीं थे-भिन्न-भिन्न व्यक्ति थे। इस मत की पुष्टि उन्होंने इस तर्क के द्वारा की है कि दोनों व्यक्तियों के काव्य-रचना काल का समय एक नहीं और न ही उनके काव्य में कोई समानता ही है। मिश्र जी ने दोनों व्यक्तियों के काल में कम से कम सौ वर्ष का अंतर माना है। जैनधर्मी घन आनन्द का समय विक्रम की सत्रहवी शताब्दी का उत्तरार्द्ध है। इनकी रचनाओं में प्रीति विमल सं. 1671, समय सुंदर सं. 1672 तथा जिनराज सूरी सं. 1678 के के जिनस्तवन की अन्क पंक्तियाँ मिलती हैं। श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र ने जो सौ वर्ष का अंतर माना है, वह संभवतः इसी कारण है कि वृंदावनवासी आनन्दघन का समय विक्रम की 18 वीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध जनधर्मी  घन आनन्द  और वृंदावन के आनन्दघन के पश्चात तीसरा नाम शेष रहता है और वह है -नंदगाँव के आनन्दघन। इनका समय श्री चैतन्य महाप्रभु का है अर्थात् यह महाप्रभु के समसामयिक कवि ठहरते हां, जिनकी सं. 1553 मेंमहाप्रभु से भेट भी हुई थी और इनके वंशज आज भी मथुरा के निकटवर्ती  खरोट गाँव में मिलते हैं । रीतिमुक्त काव्यधारा के घनानन्द के समय में और नंदगाँव के आनन्दघन में लगभग दो सौ वर्ष का अंतर है। रीतिमुक्त घनानन्द का समय 18वीं शताब्दी है और नंदगाँव के आनन्दघन का समय 16वीं शताब्दी।

 

        आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने रीतिमुक्त घनानन्द का समय सं. 1746 तक माना है। इस प्रकार आलोच्य घनानन्द वृंदावन के आनन्दघन हैं । शुक्ल जी के विचार में ये नादिरशाह के आक्रमण के समय मारे गए। श्री हजारीप्रसाद द्विवेदी का मत भी इनसे मिलता है। लगता है, कवि का मूल नाम आनन्दघन ही रहा होगा, परंतु छंदात्मक लय-विधान इत्यादि के कारण ये स्वयं ही आनन्दघन से घनानन्द हो गए । हिंदी साहित्य में यह अपवाद नहीं, क्यों कि पुष्टिमार्ग के जहाज सूरदास के भी सूर, सूरजदास, सूरजश्याम और सूरज आदि नाम मिलते हैं ।

 

जन्म-तिथि

        घनानन्द के जीवन के लगभग सभी महत्वपूर्ण तथ्य विवादास्पद हैं । जैसे नाम, जन्म-स्थान, रचनाएँ, जन्म-तिथि इत्यादि । इनकी जन्म-तिथि के संबंध में भी विद्वानों की विभिन्न मान्यताएँ हैं । लाला भगवानदीन ने घनानन्द का जन्म संवत् 1715 माना है, परंतु शुक्ल जी ने इस जन्म सवंत को न मानकर सं, 1746 में इनका जन्म माना है । इसी प्रकार अन्य आलोचकों ने इनकी जन्म-तिथी के विषय में अपने मत दिए हैं, परंतु इनकी जन्म-तिथि का अभी तक कुछ पता नहीं चला है- केवल सवंत के विषय में विवाद है । अतः हम केवल जन्म के सवंत के विषय में ही लिख सकते हैं - जन्म-तिथि अतीत के अंधकार में पूर्णतः लुप्त हो चुकी है । विभिन्न आलोचकों के मतों की आलोचना करने के पश्चात् डॉ. मनोहरलाल गौड़ ने अपनी पुस्तक घनानन्द और स्वच्छंद काव्यधारा में लिखा है- सम्वत् 1730 में इनका जन्म मान लेने पर दीक्षा के समय ये 26 या 29 वर्ष के होते हैं, जो इनके जीवन-वृत्त को देखकर ठीक प्रतीत होता है ।

 

जन्म-स्थान

        जन्म-तिथि की ही भाँति घनानन्द का जन्म-स्थान भी विवाद का विषय बना हुआ है । कुछ आलोचक इन्हें हिसार-निवासी मानते हैं तो अन्य इन्हें बुलंदशहर का मानते हैं । अधिकांश विद्वान् घनानन्द का जन्म दिल्ली और उसके आसपास का होना मानते हैं । जगन्नाथदास  रत्नाकर ने इन्हें बुलंदशहर का निवासी माना है और श्री बहुगुणा के विचार में ये कोट-हीसिर के रहने वाले थे । घनानन्द के काव्य में कहीं भी इसका संकेत नहीं मिलता कि ये कहाँ के रहने वाले थे ? ये भटनागर कायस्थ थे और दिल्ली छोड़कर वृंदावन चले गए थे - इस बात को सभी आलोचकों ने स्वीकार किया है । इन्होंने  अपने काव्य में ब्रज और वृंदावन का वर्णन जिस सजीवता के साथ किया है, उसे पढ़कर यह अवश्य लगता है कि इनका अधिकांश जीवन यहीं बीता, अन्यथा उनके काव्य में (ब्रज-संस्कृति) इतना सुंदर ब्रज का चित्रण न मिलता । हाँ, इतना अवश्य कहा जा सकता है कि सुजान की बेवफाई के कारण ही ये वृंदावन गए होंगे ।

 

घनानन्द और सुजान

        घनानन्द के काव्य में सुजान का ही वर्णन मिलता है- पर यह सुजन कौन थी, इसका विवेचन भी आवश्यक हो जाता है । घनानन्द मुहम्मदशाह रंगीले के दरबार में खास-कलम (प्राइवेट सेक्रेटरी) थे । इस पर भी - फारसी में माहिर थे- एक तो कवि और दूसरे सरस गायक । प्रतिभासंपन्न होने के कारण बादशाह का इन पर विशष अनुग्रह था । मुहम्मदशाह रंगीले के दरबार की एक नृत्य-गायन विद्या में निपुण सुजान नामक वेश्या से इनको प्रेम हो गया । इधर सुजान की इन पर अनुरक्ति और दूसरी ओर बादशाह के खास-कलम-इन दोनों बातों से-घनानन्द की उन्नति से सभी दरबारी मन ही में ईर्ष्या करते थे । अंततः उन्होंने एक ऐसा षड्यंत्र रचा, जिसमें घनानन्द पूरी तरह से लुट गए । दरबारी लोगों ने मुहम्मदशाह रंगीले से कहा कि घनानन्द बहुत अच्छा गाते हैं। उनकी बात मानकर बादशाह ने एक दिन इन्हें गाने के लिए कहा, पर ये इतने स्वाभिमानी और मनमौजी व्यक्ति थे कि गाना गाने से इन्होंने इनकार कर दिया । दरबारी लोगों को इस बात का पता था कि बादशाह के कहने से ये कभी गाना नहीं गाएँगे और हुआ भी वही। दरबारी लोग इसी घड़ी की तो प्रतीक्षा कर रहे थे। उनहोंने बादशाह से कहा कि यदि सुजान को बुलाया जाए और वह घनानन्द से अनुरोध करे तो ये अवश्य गाना गाएँगे और यह हुआ भी। बादशाह की आज्ञा से सुजान वेश्या दरबार में बुलाई गई और उसके कहने पर घनानन्द ने गाना सुनाया - सुजान की ओर मुँह करके और बादशाह की और पीठ करके, परंतु इतनी तन्मयता से गाना सुनाया कि बादशाह और सभी दरबारी मंत्र-मुग्ध हो गए। परंतु बादशाह जितने ही आनंद-विभोर गाना सुनते समय हुए थे, उतने ही कुपित गाना समाप्त होने के बाद हुए । यह उनकी बेअदबी थी कि सुजान का कहा उनसे बढ़कर हो गया । फलतः क्रोधित  होकर उन्होंने तत्काल घनानन्द को दरबार व राज्य छोड़ने का आदेश दिया । दरबारियों की चाहत पूर्ण हो चुकी थी ।

 

        घनानन्द ने चलते समय सुजान से साथ चलने का आग्रह किया, परंतु उसने अपने जातीय गुण की रक्षा की और घनानन्द के साथ जाना अस्वीकार कर दिया । जान और जहान दोनों ही लुटाकर घनानन्द ने वृंदावन की ओर मुख किया । जीवन से इन्हें पूर्ण विरक्ति हो चुकी थी । वृंदावन में उन्होंने निम्बार्क संप्रदाय में दीक्षा ली । इस संबंध में श्री शंभुप्रसाद बहुगुणा ने लिखा है- जीवन की विरक्ति उनके लिए प्रेमपूर्ण राधा-कृष्ण के चरणों की अनुरक्ति बन गई । मरते दम तक वे सुजान को नहीं भूल पाए । राधा-कष्ण को उन्होंने सुजान की स्मृति बना दिया और निरंतर सुजान के प्रेम में आँसुओं के स्वरों में ये गीत, कवित्त-सवैये लिखते रहे । डॉ. श्रीराम अवध द्विवेदी ने लिखा है कि किसी साधारण बात से अप्रसन्न होकर उन्हें देश-निकाला दे दिया गया था ओर इस अपनानजन्य भावना के वशीभूत होकर वे वृंदावन चले गए और मृत्युपर्यंत वहीं रहे । लाला भगवानदीन ने सुजान नामक वैश्या के प्रति घनानन्द की अनुरक्ति का खंडन करते हुए लिखा है- सुजान की इनके प्रति विरक्ति इनके भक्त होने के कारण नहीं थी, अपितु ये स्वयंभगवान् कृष्ण के प्रति अनुरक्त होकर वृंदावन में जाकर कृष्ण की उपासना में लग गए थे और अपने परिवार का मोह भी इन्होंने उस भक्तिके कारण त्याग दिया था । परंतु अधिकांश विद्वानों ने घनानन्द का सुजान से प्रेम, बादशाह रंगीले द्वारा देश-निकाला और सुजान के तिरस्कार को सत्य माना है । इतना अवश्य कहा जा सकता है कि घनानन्द के जीवन का अंतिम समय वृंदावन में बीता ।

 

मुत्यु

        घनानन्द की मृत्यु-तिथि भी उनकी जन्म-तिथि के समान ही विवादास्पद है । इस संबंध में पं.विश्वनाथप्रसाद मिश्र के शोधपूर्ण तर्क एवं प्रमाणपूर्ण निष्कर्ष मान्य हैं । अन्य आलोचकों ने माना है कि घनानन्द के समय हुई थी, परंतु विश्वनाथप्रसाद मिश्र के मतानुसार उनकी मृत्यु नादिरशाह के आक्रमण में न होकर अहमदशाह अब्दाली के मथुरा पर किए गए द्वितीय आक्रमण में सं. 1817 (सन् 1671) में हुई थी । इतिहास साक्षी है, सं.1796 में नादिरशाह ने मथुरा पर नहीं, दिल्ली पर आक्रमण किया था, जबकि अहमदशाह अब्दाली ने मथुरा पर पहला आक्रमण सं.1813 में और दूसरा आक्रमण सं.1817 में किया था । इन दोनों आक्रमणों का वर्णन हमें चाचा हितवृंदावनदास कृत हरिकला बेलि में मिलता है-

ठारह सै सत्रहौं वर्ष गत जानियै ।

साढ़ वदी हरिबासर बेल बखानियै ।।

 

        इन आक्रमणों में अनेक महान् हस्तियों व संतों का वध कर डाला गया था । सं. 1817 मे चाचा हितवृंदावनदास जी ने घनानन्द का शव अपनी आँखों से देखा और उनके शव पर दुखी होते हुए इस प्रकार उसका वर्णन किया-

विरह सौं तायौ तन निबाह्मौ गत साँचौ पर,

धन्य आनन्दघन मुख गाई सोई करी है ।

एह्मे ब्रजराज कुँवर धन्य-धन्य तुमहूँ की

कहा नीकी प्रभु यह जंग में बिस्तरी है ।

गाढ़ौ ब्रज उपासी जिन देह अंत पूरी पारी

रज की कअभीलाष सौं तहाँ ही देह धरी है ।।

वृंदावन हित रुप तुमहूँ हरि उड़ाई धूरि,

ऐ पै साँची निष्ठा जन ही की लखि परी है ।

 

       धनानन्द  की अभिलाषा थी कि वे ब्रज-रज में लोटते हुए ही अपने प्राण त्यागें और उनकी यह इच्छा भगवान कृष्ण ने पूरी कर दी । इस बात की पुष्टिराधा-कृष्ण ग्रंथावली में एक स्थान पर मिलती है- सुना है, मथुरा में कत्लेआम करने वालों से उन्होंने कहा कि मुझे तलवार के घाव थोड़ी-थोड़ी देर तक दो । इनको ज्यों-ज्यों तलवार के घाव लगते गए, त्यों-त्यों ये ब्रज-रज में लोटते रहे और ऐसे देह त्याग दी ।

 

 

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